Thursday, 1 December 2022

राजस्थान में कांग्रेस के 91 विधायकों के इस्तीफे का मामला अब हाईकोर्ट पहुंचा।सवाल - क्या हाईकोर्ट, विधानसभा अध्यक्ष के काम में दखल दे सकता है?सचिन पायलट सहित 19 विधायकों को नोटिस देने के मामले में कोर्ट ने दखल दिया था।

विधानसभा में भाजपा विधायक दल के उपनेता राजेंद्र सिंह राठौड़ ने 1 दिसंबर को हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर कांग्रेस के 91 विधायकों के सामूहिक इस्तीफे के मामले में दखल देने की मांग की है। राठौड़ की इस याचिका से सत्तारूढ़ कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर गर्मी आ गई है। याचिका में राठौड़ ने बताया है कि गत 25 सितंबर को कांग्रेस के 91 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी के समक्ष उपस्थित होकर अपने इस्तीफे दे दिए। लेकिन इन इस्तीफों पर दो माह गुजर जाने के बाद भी विधानसभा अध्यक्ष ने कोई निर्णय नहीं लिया है। इससे संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है। 91 विधायकों में अधिकांश मंत्री भी शामिल हैं। इस्तीफा देने के बाद भी विधायक और मंत्री सरकार की सभी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। याचिका में बताया गया है कि भाजपा के विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने विधानसभा अध्यक्ष जोशी से मिलकर इस्तीफे स्वीकारने की मांग की थी। लेकिन इसके बाद भी जोशी की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया। याचिका में कहा गया कि 91 विधायकों के इस्तीफे से राजस्थान में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से गत 25 सितंबर को कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी। लेकिन इस बैठक में उपस्थित होने के बजाए कांग्रेस विधायक नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल के निवास पर एकत्रित हुए और फिर विधानसभा अध्यक्ष के घर जाकर इस्तीफा दे दिया। ये सभी विधायक सीएम अशोक गहलोत के समर्थक हैं। इन विधायकों को आशंका थी कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने जो बैठक बुलाई है उसमें अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाकर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया जाएगा।
 
क्या कोर्ट दखल दे सकता है:
राजेंद्र राठौड़ ने जो जनहित याचिका दायर की है उसके बाद सवाल उठता है कि क्या हाईकोर्ट विधानसभा अध्यक्ष के काम में दखल दे सकता है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 212 में विधानसभा अध्यक्ष को विशेषाधिकार है कि वे चाहे जब निर्णय ले। अध्यक्ष को निर्णय लेने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सकता है। समय समय पर ऐसे कई उदाहरण है जिनमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्षों को निर्देश दिए हैं। इसका ताजा उदाहरण राजस्थान में जुलाई 2020 में हुए राजनीतिक संकट के समय का है। तब कांग्रेस विधायक दल की बैठक में उपस्थित नहीं होने पर सचिन पायलट सहित कांग्रेस के 19 विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने नोटिस जारी किया था। यह नोटिस दल बदल विधेयक कानून के अंतर्गत दिया गया। इससे इन 19 विधायकों की विधानसभा की सदस्यता रद्द होने की आशंका हो गई थी। राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष सीपी जोशी कोई निर्णय लेते इससे पहले ही कोर्ट ने ऐसे नोटिसों रोक लगा दी। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों भाजपा का प्रतिनिधि मंडल जब डॉ. सीपी जोशी से मिला था, तब उन्होंने कहा था कि कांग्रेस विधायकों के मामले में वे ऐसा फैसला देंगे जो संसदीय इतिहास में मिसाल बनेगा। लेकिन इसके बाद भी विधायकों के इस्तीफे के मामले में डॉ. जोशी की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया। यदि 91 विधायकों का इस्तीफा स्वीकार हो जाता है तो राजस्थान में कांग्रेस सरकार पर संकट खड़ा हो जाएगा। भाजपा नेताओं का आरोप है कि विधानसभा अध्यक्ष इस्तीफे पर निर्णय न लेकर अशोक गहलोत को ही मुख्यमंत्री बनाए रखना चाहते हैं। जानकारों की मानें तो राठौड़ की जनहित याचिका के बाद सीएम अशोक गहलोत विधानसभा में विश्वास मत प्रस्ताव प्रस्तुत कर अपना बहुमत साबित कर सकते हैं। इसे इस्तीफे वाला विवाद अपने आप खत्म हो जाएगा। 

S.P.MITTAL BLOGGER (01-12-2022)
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Wednesday, 30 November 2022

अशोक गहलोत ने सचिन पायलट के साथ फिर उठाया अपना हाथ।इसे कहते हैं थूक कर चाटना।केसी वेणुगोपाल में हिम्मत है तो धारीवाल, महेश जोशी और धर्मेन्द्र राठौड़ पर कार्यवाही करके दिखाएं।

22 नवंबर को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने प्रतिद्वंदी नेता पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को भाजपा से 190 करोड़ रुपए लेने वाला गद्दार नेता घोषित किया। इसके लिए गहलोत ने एनडीटीवी को एक विशेष इंटरव्यू भी दिया। लेकिन मात्र 7 दिन बाद ही 29 नवंबर को सीएम गहलोत उन्हीं गद्दार सचिन पायलट के साथ खड़े हो गए और पायलट से दोस्ती दिखाने के लिए अपना हाथ भी उठाया। सवाल उठता है कि जब पायलट के साथ दोस्ती ही दिखानी थी तो फिर थूकने जैसा बयान क्यों दिया? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि गहलोत स्वयं को गांधी जी का अनुयायी और सिद्धांतवादी नेता होने का दावा करते हैं। वैसे भी गहलोत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है। ऐसे में गहलोत के कथन को गंभीरता से लिया जाता है। 22 नवंबर को जब गहलोत ने पायलट को भाजपा से 190 करोड़ रुपए लेने वाला गद्दार नेता बताया, तब यह माना गया कि गहलोत अब आर पार की लड़ाई करेंगे। लेकिन मात्र सा तदन बाद ही गहलोत, उन्हीं गद्दार पायलट के साथ आकर खड़े हो गए। 29 नवंबर को जयपुर में भारत जोड़ों यात्रा की तैयारी बैठक में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बीच में खड़े होकर गहलोत और पायलट का हाथ उठाया। इस फोटो के फ्रेम में पायलट का चेहरा तो दमक रहा था, क्योंकि उनकी स्थिति थूक कर चाटने जैसी नहीं थी, जबकि गहलोत की मुस्कान बता रही थी कि इस हाथ को उठाने में उन पर क्या बीत रही है। पायलट तो इस बात से खुश थे कि सीएम गहलोत को ही उनके साथ आना पड़ा है। गहलोत माने या नहीं लेकिन मात्र 7 दिन बाद ही पायलट के साथ हाथ उठाने से उनके बोलने का महत्व कम हुआ है। क्या गांधी जी के अनुयायी ऐसे ही होते हैं जो सात दिन में ही बदल जाएं या फिर यह सीएम की कुर्सी का मोह है जो छूट नहीं रहा है। ऐसे में गांधीवादी सिद्धांत भी पीछे रह गए हैं।
 
हिम्मत है तो कार्यवाही करके दिखाएं?:
भारत जोड़ों यात्रा की तैयारी बैठक में भी राजस्थान में कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी का मामला ही छाया रहा। नेताओं की बयानबाजी पर केसी वेणुगोपाल ने कहा कि अब यदि कोई नेता अथवा मंत्री पार्टी का अनुशासन तोड़ कर बयान देगा तो उसे चौबीस घंटे में पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। वेणुगोपाल अपने कथन की कितनी क्रियान्विति करते हैं, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन वेणुगोपाल में हिम्मत हो तो मंत्री शांति धारीवाल, महेश जोशी और धर्मेन्द्र राठौड़ पर कार्यवाही करके दिखाएं। इन मंत्रियों को पार्टी का अनुशासन तोड़ने के आरोप में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने नोटिस दे रखे हैं। सवाल उठता है कि जब नोटिस वाले मंत्रियों पर ही कोई कार्यवाही नहीं हो रही है तब बयान देने वालों को चौबीस घंटे में बाहर कैसे निकाला जाएगा?

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तो क्या टूलकिट गिरोह ने बनाया इजरायली फिल्मकार नदाव लपिड को भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की जूरी का प्रमुख?विदेश और गृह मंत्रालय को उच्च स्तरीय जांच करवानी चाहिए।

सोशल मीडिया पर सक्रिय टूल किट गिरोह इस बात से खुश है कि भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की जूरी के प्रमुख नदाव लपिड ने भारतीय फिल्म द कश्मीर फाइल्स को दुष्प्रचार वाली फिल्म बताया है। हालांकि फिल्म के निर्देशक और कलाकारों ने लपिड के कथन का खंडन किया है, लेकिन सवाल उठता है कि इजरायली फिल्मकार  नदाव  लपिड को भारतीय फिल्म महोत्सव की जूरी का प्रमुख किसने बनाया? यह फिल्म महोत्सव पूरी तरह केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दिशा निर्देशों पर हो रहा है, इसलिए महोत्सव का शुभारंभ भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने किया। गोवा में चल रहे इस फिल्म महोत्सव में विदेशी फिल्में भी प्रदर्शित की गई है। इजरायली फिल्मकार लपिड ने द कश्मीर फाइल्स पर जो टिप्पणी की है, उससे प्रतीत होता है कि भारतीय फिल्म महोत्सव में टूलकिट गिरोह सक्रिय है, जिसने सुनियोजित तरीके से पहले लपिड को जूरी का प्रमुख बनाया और फिर कश्मीर फाइल्स पर बयान दिलवाए और अब  नदाव  लपिड के बयान को आधार बना कर कश्मीर में हिन्दुओं पर हुए आतंकी हमलों को झुठलाया जा रहा है। सब जानते हैं कि द कश्मीर फाइल्स फिल्म कश्मीर में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों पर बनी है। इस फिल्में दिखाया गया है कि किस तरह धर्म का आधार बना कर चार लाख हिन्दुओं को कश्मीर घाटी छोड़ने को मजबूर किया गया। हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों को इस फिल्म में सबूतों के साथ फिल्माया गया है। यह फिल्म सुनी सुनाई कहानियों पर नहीं बनी है, बल्कि उन व्यक्तियों को भी दिखाया गया, जिन्हें कश्मीर में प्रताड़ित किया गया। द कश्मीर फाइल्स फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है, लेकिन फिर भी लपिड को यह फिल्म दुष्प्रचार वाली नजर आती है। जाहिर है कि ऐसे बयान के पीछे टूलकिट गिरोह ही सक्रिय है। आतंकवाद से तो आज सबसे ज्यादा इजरायल ही प्रभावित है। आतंकवाद के कारण इजरायल के प्रधानमंत्री तक मारे गए हैं। इजरायल सरकार को भी  लपिड जैसे फिल्मकारों से सावधान रहने की जरूरत है। ऐसे फिल्मकार विदेशों में इजरायल की छवि खराब कर रहे हैं। लपिड के बयान को इजराय सरकार ने भी गंभीरता से लिया है, इसलिए इजरायल के भारत में राजदूत नासोर गिलोन ने बयान जारी कर लपिड को फटकार लगाई है।
 
विदेश और गृह मंत्रालय जांच कराए:
इजरायली फिल्म कार लपिड के बयान पर अब विदेश और गृह मंत्रालय को उच्च स्तरीय जांच करवानी चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि भारतीय फिल्म महोत्सव की जूरी का प्रमुख लपिड को किन हालातों में बनाया गया। आखिर कौन लोग थे जिन्होंने लपिड को जूरी का प्रमुख बनाने की सिफारिश की। इसके साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि लपिड ने किन सूचनाओं के आधार पर द कश्मीर फाइल्स को दुष्प्रचार वाली फिल्म बताया। 

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कांग्रेस और भाजपा ने अजमेर में ग्रामीण क्षेत्रों में विकास नहीं होने का आरोप लगाया।जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा ने भी माना कि विकास कार्यों और मनरेगा की स्वीकृतियों में विलंब हो रहा है7ताजपुरा (सरवाड़) के सरपंच का मामला भी चर्चा में।लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्नेह भोज में अजमेर के भाजपाई भी शामिल हुए।

कांग्रेस के पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, वरिष्ठ नेता शक्ति प्रताप सिंह पिपरौली, जिला परिषद सदस्य और भाजपा नेता महेंद्र सिंह कड़ैल आदि ने आरोप लगाया है कि अजमेर के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य नहीं हो रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि मनरेगा की स्वीकृतियों में भी विलंब हो रहा है, जिससे ग्रामीण रोजगार नहीं मिल रहा। पिपली ने विकास कार्य नहीं होने के लिए जिला परिषद के सीईओ हेमंत स्वरूप माथुर को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा कि माथुर के रवैए से जिले भर के सरपंचों में भी नाराजगी है। इससे कांग्रेस सरकार की छवि खराब हो रही है। पिपरोली ने माथुर को तत्काल प्रभाव से हटाने की मांग की है। यदि माथुर को नहीं हटाया तो ग्रामीण जनप्रतिनिधियों के सहयोग से जन आंदोलन किया जाएगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मंशा शहरी क्षेत्र के युवाओं को भी रोजगार उपलब्ध करवाने की है, लेकिन जिला परिषद के सीईओ की वजह से ग्रामीणों को भी मनरेगा रोजगार नहीं मिल रहा है।
 
स्वीकृतियों में विलंब:
जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा ने भी माना है कि विकास कार्यों और मनरेगा में रोजगार देने की स्वीकृतियों में विलंब हो रहा है, जिसकी वजह से ग्रामीणों को परेशानी हो रही है। उन्होंने कहा कि स्वीकृतियां जारी करने का मामला जिला कलेक्टर और जिला परिषद के सीईओ के बीच है। इन दोनों अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है कि स्वीकृतियां समय पर जारी हों। जब राज्य सरकार ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध करवाना चाहती है, तब प्रशासनिक स्तर पर विलंब नहीं होना चाहिए। श्रीमती पलाड़ा ने कहा कि स्वीकृतियों में हो रहे विलंब को लेकर एक पत्र वे भी कलेक्टर और सीईओ को लिख रही हैं। जब वे स्वयं जनसुनवाई कर ग्रामीणों को राहत दे रही हैं तो अधिकारियों की भी जवाबदेही होनी चाहिए। जरुरत हुई तो लापरवाह अधिकारियों पर कार्यवाही के लिए राज्य सरकार को लिखा जाएगा।
 
सरपंच का मामला भी चर्चा में:
जिला परिषद के सीईओ हेमंत स्वरूप माथुर पर भाजपा और कांग्रेस के आरोपों के मद्देनजर ही सरवाड़ पंचायत समिति के  ताजपुरा के सरपंच का मामला भी चर्चा में है। ताजपुरा ग्राम पंचायत में सड़क निर्माण में हुए भ्रष्टाचार में सरपंच को भी जांच में दोषी माना गया है। जांच की कार्यवाही राज्य सरकार के निर्देश पर ही हुई। अब पंचायती राज विभाग ने भी सरपंच पर कानूनी कार्यवाही के आदेश दिए हैं। सीईओ माथुर सरकार के निर्देशों के अनुरूप ताजपुरा की फाइल को आगे बढ़ाया गया है। कुछ सरपंच सीईओ की इस कार्यवाही से भी नाराज है, लेकिन वहीं जिला प्रमुख पलाड़ा का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो दोषियों पर कार्यवाही होनी ही चाहिए।
 
बिरला का स्नेह भोज:
दिल्ली में चार दिसंबर को होने वाले एमसीडी के चुनाव में भाजपा का प्रचार करने के लिए राजस्थान से ही पूर्व मंत्री, विधायक और भाजपा कार्यकर्ता गए हैं। उनमें अजमेर दक्षिण की विधायक अनिता भदेल, डिप्टी मेयर नीरज जैन, पार्षद देवेंद्र सिंह शेखावत, मंडल अध्यक्ष सतीश बंसल आदि भी शामिल है। राजस्थान के भाजपा कार्यकर्ताओं के सम्मान में 29 नवंबर की रात को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने आवास पर एक स्नेह भोज का आयोजन किया गया। इस भोज में राजस्थान के करीब सौ भाजपा नेताओं ने भाग लिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि ओम बिरला राजस्थान के कोटा से लोकसभा सांसद हैं। स्नेह भोज में बिड़ला ने एक एक कार्यकर्ता के हाल चाल जाने। 

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Friday, 25 November 2022

अशोक गहलोत यदि असली गांधीवादी हैं तो बागी विधायकों द्वारा 10-10 करोड़ रुपए लेने के सबूत सार्वजनिक करने चाहिए।क्या राहुल गांधी अपनी यात्रा में अब गद्दार सचिन पायलट को अपने साथ रखेंगे? आखिर एनडीटीवी ने इंटरव्यू को दो दिन तक क्यों छिपाए रखा?

अशोक गहलोत कांग्रेस के कोई साधारण नेता नहीं है। गहलोत उस राजस्थान के मुख्यमंत्री हैं जो ऑस्ट्रेलिया के बराबर है। गहलोत ने मुख्यमंत्री के नेताओं ने सच बोलने और संविधान की रक्षा करने की भी शपथ ली है। ऐसे में अशोक गहलोत का झूठ बोलने का सवाल ही नहीं उठता। गहलोत से नैतिकता की भी उम्मीद की जाती है, क्योंकि वे स्वयं को महात्मा गांधी का अनुयायी मानते हैं। गहलोत यदि असली गांधीवादी हैं तो उन्हें कांग्रेस के बागी विधायकों द्वारा 10-10 करोड़ रुपए प्राप्त करने के सबूत सार्वजनिक करने चाहिए। एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में गहलोत ने कहा कि जुलाई 2020 में उनकी सरकार गिराने की साजिश करने वालों ने 10-10 करोड़ रुपए लिए। सब जानते हैं कि जुलाई 20 में सचिन पायलट के नेतृत्व में ही कांग्रेस के 18 विधायक दिल्ली गए थे। गहलोत के अनुसार पायलट सहित 19 विधायकों को 190 करोड़ रुपए प्राप्त किए। अब जब यह बात सीएम गहलोत खुद कह रहे हैं, तब राजनीति में यह बात बहुत गंभीर है। गंभीर बात इसलिए भी है कि दिल्ली जाने वाले 19 विधायकों में से पांच अब गहलोत मंत्रिमंडल में शामिल हैं। यानी गहलोत ने उन विधायकों को मंत्री बना रखा है, जिन्होंने उनकी सरकार गिराने के लिए 10-10 करोड़ रुपए लिए। गहलोत के आरोप के बाद पायलट सहित 19 बागी विधायकों का खून कितना गर्म होगा, यह तो आना वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना जरूरी है कि जब से 19 विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाएंगे तो मतदाता इन्हें संदेह की निगाह से देखेगा। बागी विधायकों की इससे ज्यादा मानहानि नहीं हो सकती है। यदि दिल्ली जाने वाले विधायक चुप रहते हैं तो यह मान लिया जाएगा कि गहलोत जो कह रहे हैं वह सही है। अशोक गहलोत के अनुसार तो सुदामा जैसी छवि वाले मसूदा (अजमेर) के विधायक राकेश पारीक ने भी 10 करोड़ रुपए ले लिए हैं।
 
क्या अब पायलट यात्रा में साथ रहेंगे?:
राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा तीन दिसंबर को  राजस्थान में प्रवेश कर रही है। राहुल की यात्रा 18 दिसंबर तक राजस्थान में ही रहेगी। अब सीएम गहलोत ने पायलट को गद्दार और भाजपा से पैसा लेने वाला बता दिया है, तब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी, पायलट को अपने साथ यात्रा में रखेंगे? गहलोत ने तो स्पष्ट कह दिया है कि वे पायलट की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करते हैं। जानकारों की मानें तो राहुल गांधी चाहते थे कि राजस्थान में गहलोत और पायलट दोनों साथ रहें। लेकिन राहुल की यात्रा के आने से पहले ही गहलोत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। गहलोत के रुख से गांधी परिवार खास कर राहुल गांधी के सामने संकट खड़ा हो गया है। राहुल गांधी भले ही पायलट को अपने साथ रो, लेकिन पायलट के मुद्दे पर गहलोत ने आर पार की लड़ाई लडऩे का मन बना लिया है। पायलट के मुद्दे पर गहलोत अब राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और गांधी परिवार से लडऩे के मूड में भी है। राजस्थान में अशोक गहलोत किसी भी स्थिति में पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे। अशोक गहलोत का इंटरव्यू प्रसारित हुए 24 घंटे गुजर गए, लेकिन अभी तक भी किसी केंद्रीय नेता ने गहलोत के बयान को गलत ठहराने की हिम्मत नहीं दिखाई है। जयराम नरेश का बयान तो गहलोत के पक्ष में ही है।

दो दिन तक इंटरव्यू को छिपाया?:
एनडीटीवी के संवाददाता ने सीएम गहलोत का इंटरव्यू 22 नवंबर को पाली में ही रिकॉर्ड कर लिया था। न्यूज चैनलों के बीच जो प्रतिस्पर्धा चल रही है उसमें तो गहलोत का इंटरव्यू 22 नवंबर को ही एनडीटीवी पर जारी हो जाना चाहिए था, लेकिन यह इंटरव्यू 24 नवंबर को प्रसारित हुआ। सवाल उठता है कि एनडीटीवी ने गहलोत के इंटरव्यू को 2 दिनों तक क्यों छिपाए रखा? क्या इंटरव्यू देने के बाद प्रसारण को रुकवाया गया? एनडीटीवी निष्पक्ष पत्रकारिता करने का दावा करता है, इसलिए अब एनडीटीवी को स्पष्ट करना चाहिए कि गहलोत के इंटरव्यू को 2 दिन तक क्यों छुपाया?

S.P.MITTAL BLOGGER (25-11-2022)
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