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Sunday, 5 July 2026
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई के जनाजे और सुपुर्दे-ए-खाक की रस्म को अभूतपूर्व बनाने की योजना।
शिया समुदाय में जनाजा अंतिम सफर नहीं, बल्कि इबादत माना जाता है।
पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी के जनाजे में भगदड़ मचने से 10 ईरानियों की मौत हो गई थी।
जनाजे में शामिल होने ईरान पहुंची जम्मू कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने तेहरान में रील बनाई।
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सब जानते हैं कि गत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर जो हमला किया उसमें ईरान के सर्वोच्च धार्मिक लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके परिवार के 10 सदस्यों की मौत हो गई। तभी से खामेनेई के शव को सुरक्षित रखा गया और अब खामनेई के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया ईरान में बड़े पैमाने पर शुरू हो गई है। हालांकि खामनेई को 9 जुलाई को उनके पैतृक शहर मशहद में सुपुर्दे-ए-खाक किया जाएगा, लेकिन इससे पहले 4 जुलाई से ही खामेनेई को श्रद्धांजलि देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके अंतर्गत 6 जुलाई को ख़ामेनई का जनाजा तेहरान से निकलेगा और 7 जुलाई को शिया समुदाय के धार्मिक स्थल कौम पहुंचेगा। इसके बाद नजफ शहर और कर्बला होते हुए जनाजे का जुलूस मशहद पहुंचेगा। जिस भी शहर से खामेनेई का जनाजा निकल रहा है, वहां लाखों शिया मुसलमानों की भीड़ है। हर ईरान एक बार अपने नेता के दर्शन करना चाहता है, इसके लिए होड़ मची हुई है। असल में शिया समुदाय में जनाजा अंतिम सफर नहीं बल्कि इबादत है। चूंकि जनाजा भी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक भाग ले रहे हैं। मौजूदा समय में दिवंगत खामनेई के पुत्र मुस्तबा खामनेई ईरान के सुप्रीम लीडर है, इसलिए दुनिया के 100 से भी ज्यादा प्रतिनिधि जनाजे की रस्म में भाग लेने पहुंचे हैं। भले ही अभी भी अमेरिका और इजरायल की नजरे ईरान पर टेड़ी हो, लेकिन जनाजे और सुपुर्दे-ए-खाक को ईरान में अभूतपूर्व मनाने की योजना है। माना जा रहा है कि जनाजे के जुलूस और सुपुर्दे-ए-खाक की रस्म तक दो करोड़ लोग शामिल होंगे। यही वजह है कि ईरान के सुरक्षा बल भी सतर्कता बरत रहे हैं। कड़ी सुरक्षा के बाद भी ईरान के अधिकारियों को आशंका है कि जनाजे और सुपुर्दे-ए-खा के अवसरों पर अप्रिय घटना हो सकती है। इसमें अनेक लोग मारे भी जा सकते हैं। असल में 1998 में जब ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी के जनाजे के समय भी भगदड़ मच गई थी। लोग खुमैनी के दर्शन के लिए इतने उतावले थे कि कफन बॉक्स ही क्षतिग्रस्त हो गया। पुलिस को हालातों को नियंत्रण में करने के लिए गोली चलानी पड़ी, जिसमें 10 ईरानी मारे गए। बाद में खुमैनी के शव को हेलीकॉप्टर से ले जाना पड़ा। खुमैनी के समय के हालातों को देखते हुए ही खामनेई के अंतिम संस्कार को लेकर विशेष सुरक्षा बरती जा रही है। ईरान जब युद्ध की वजह से लहूलुहान है, तब अपने नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए शिया समुदाय के दो करोड़ लोगों का जुटना यह बताता है कि दिवंगत खामनेई कितने लोकप्रिय थे। असल में खामनेई के जनाजे को अभूतपूर्व बनाने के पीछे अमेरिका और इजरायल को यह दिखाना है कि भले ही खामनेई को मार डाला हो, लेकिन ईरान में उनका विचार जिंदा है। ईरान के नेताओं ने कहा कि भी है कि खामनेई की मौत का बदला तो अमेरिका और इजरायल से लिया ही जाएगा।
महबूबा ने रील बनाई:
खामनेई के अंतिम संस्कार की रस्म में भाग लेने के लिए भारत की ओर से जो प्रतिनिधिमंडल ईरान पहुंचा है, उसमें जम्मू कश्मीर की पूर्व सीएम और पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं। तेहरान पहुंचने के बाद महबूबा उस स्थान पर गई जहां 28 फरवरी को खामनेई और उनके परिवार के सदस्यों की मौत हुई थी। महबूबा ने इस परिसर में घूमते हुए अपना एक वीडियो (रील) भी बनाया। महबूबा का यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
61 वर्षीय अभिनेता आमिर खान भले ही तीसरी शादी करे, लेकिन कम से कम सामाजिक मर्यादाओं का तो पालन करें।
तीसरी शादी के रजिस्ट्रेशन के समय पहली और दूसरी पत्नियों तथा उनके बच्चों को उपस्थित रखने का क्या तुक है?
जो लोग आमिर को अपना हीरो मानते हैं उन्हें आमिर खान की इस बेहयाई को भी समझना चाहिए।
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मुंबइया हिन्दी फिल्मों के अभिनेता 61 वर्षीय आमिर खान ने 5 जुलाई को 47 वर्षीय गौरी स्प्रैट से तीसरी शादी कर ली। आमिर खान गौरी के साथ पिछले कुछ वर्षों से लिवइन में रह रहे थे। आमिर और गौरी ने जब भारतीय विवाह कानून के अंतर्गत अपने विवाह का रजिस्ट्रेशन करवाया तब आमिर की पहली पत्नी रीना दत्त और दूसरी पत्नी किरण राव के साथ साथ उनके बच्चे भी उपस्थित रहे। तीसरी पत्नी गौरी के पहले विवाह से उत्पन्न बेटा भी उपस्थित रहा। आमिर खान तीसरी के बाद भले ही चौथी शादी भी करें, लेकिन उन्हें सामाजिक मर्यादाओं का तो ख्याल रखना ही चाहिए। तीसरी शादी के रजिस्ट्रेशन के समय उपस्थित पहली और दूसरी पत्नी और उनके बच्चों के फोटो और वीडियो न्यूज़ चैनलों और अखबारों में प्रसारित हो रहे हैं। सवाल उठता है कि तीसरी शादी के समय पहली और दूसरी पत्नी को उपस्थित रख आमिर खान भारत के सभ्य समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं? भारत सनातन संस्कृति वाला देश है, जहां भगवान राम को मर्यादा पुरुष माना जाता है जो लोग आमिर खान को अपना हीरो मानते हैं, उन्हें आमिर खान की इस बेहयाई को भी समझना चाहिए। क्या भारत के सभ्य समाज में यह संभव है कि एक व्यक्ति जब तीसरी शादी करे तो उसकी पहली व दूसरी पत्नी व बच्चे भी उपस्थित रहे? समझ में नहीं आता कि पहली पत्नी रीना दत्त और दूसरी पत्नी किरण राव आमिर की तीसरी शादी के समय क्यों उपस्थित रही? यहां अभिनेता सलमान खान का हाल ही में दिए गए बयान का उल्लेख करना जरूरी है। सलमान खान की उम्र भी 60 वर्ष हो गई है, लेकिन उन्होंने कहा कि वे विवाह इसलिए नहीं कर रहे हैं उन्हें तलाक से डर लगता है, बीवी जब तलाक लेती है तो बड़ी मात्रा में पैसा भी ले जाती है, एक और सलमान खान तलाक के डर से विवाह नहीं कर रहे तो दूसरी ओर आमिर खान तीसरे विवाह के अवसर पर पहली और दूसरी बीवी को उपस्थित रख रहे हैँ।
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कम से कम साधु संतों को तो ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद गिरि पर हमला करने से बचना चाहिए।
अखिलेश यादव पहले मंदिर जाकर भगवान राम के प्रति आस्था तो दिखाएं।
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अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावे के प्रकरण में अब श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष और राष्ट्रीय संत स्वामी गोविंद गिरि पर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। जगतगुरु परमहंस आचार्य ने कहा है कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष होने के नाते गोविंद गिरि को चढ़ावा चोरी की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि गोविंद गिरि अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते है। वही अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी मंदिर के पुजारी डॉ. विदेशाचार्य महाराज ने कहा कि कोषाध्यक्ष होने के नाते गोविंद गिरी को चढ़ावा चोरी की जांच के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय से पूछताछ हो सकती है तब जांच एजेंसियां गोविंद गिरि से पूछताछ क्यों नहीं कर रही। अब तो चढ़ावा चोरी के प्रकरण में एफआईआर भी दर्ज हो गई है। मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गणना और फिर उसे सुरक्षित रखने की प्रमुख जिम्मेदारी कोषाध्यक्ष की ही है। डॉ. विदेशाचार्य महाराज ने कहा कि इस बात का भी पता लगाया जाना चाहिए कि स्वामी गोविंद गिरी किन के पैसों से चार्टर प्लेन से भ्रमण करते हैं। उन्होंने स्वामी गोविंद गिरि की देश भर में संपत्तियों की भी जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि गोविंद गिरि अयोध में राम मंदिर में तभी नजर आते हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आते हैं। क्या ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष को मंदिर के चढ़ावे की निगरानी नहीं करनी चाहिए? जांच एजेंसियों ने जिस प्रकार महामंत्री चंपत राय से घंटों पूछताछ की है, उसी प्रकार गोविंद गिरि से भी की जानी चाहिए।
हमला करने से साधु संत तो बचे:
अयोध्या में मंदिर निर्माण में स्वामी गोविंद गिरि महाराज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। गोविंद गिरि महाराज के सानिध्य में ही देश के विभिन्न शहरों में वेद विद्यालय संचालित है। इनमें पुष्कर का सावित्री विद्यापीठ भी शामिल हें। स्वामी गोविंद गिरी को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। हो सकता है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष के रूप में वे प्रभावी भूमिका न निभा सके हो, लेकिन कम से कम साधु संतों को तो गोविंद गिरि महाराज पर हमला करने से बचना चाहिए। खुद गोविंद गिरि ने भी कहा है कि राम मंदिर के चढ़ावे की गणना और फिर बैंकों तक नगद राशि जमा करवाने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। न ही कोषाध्यक्ष के तौर पर बैंक के किसी अकाउंट पर हस्ताक्षर हें। इतना ही नहीं उनके हस्ताक्षरों से बैंक से कोई राशि भी नहीं निकाली जाती। गोविंद गिरि ने माना कि चढ़ावा चोरी के प्रकरण से वह न केवल आहत है, बल्कि लज्जित भी है।
अखिलेश पहले मंदिर जाएं:
उत्तर प्रदेश में सपा के नेता और पूर्व सीएम अखिलेश यादव बार बार कह रहे है कि राम मंदिर के चढ़ावे के चोरी होने से हिंदुओं की आस्था को क्षति पहुंची है। हिंदुओं की आस्था की दुहाई देकर अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी आरोप लगा रहे हैं। यह सही है कि चढ़ावा चोरी की खबरों से हिंदुओं की आस्था को धक्का लगा है, लेकिन सवाल उठता है कि अखिलेश यादव को हिंदुओं की आस्था की चिंता कब से हो गई? अखिलेश याव तो उन नेताओं में शामिल हैं जो अपने राजनीतिक स्वार्थों के खातिर अभी तक भी अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने नहीं गए हैं। जो व्यक्ति मंदिर जाने से डरता हो वो हिंदुओं की आस्था की चिंता कर रहा है। यदि अखिलेश यादव को हिंदुओं की आस्था की इतनी ही चिंता है तो पहले अयोध्या जाकर मंदिर में दर्शन तो करने चाहिए।
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Friday, 3 July 2026
आखिर अशोक गहलोत को किसने बताया कि सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस से बगावत कर रहे हैं?
क्या ऐसा बयान राजस्थान की राजनीति कमेटी को लेकर दबाव बनाने के लिए दिया गया?
पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ से भले ही भाजपा के नेता न मिले, लेकिन पूर्व सीएम गहलोत मिलते हैं।
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3 जुलाई को राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी और पंजाब से लोकसभा के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद रंधावा ने कहा कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर उन्होंने अमित शाह से मुलाकात की। इस मुलाकात में पंजाब के बिगड़ते हालातों की जानकारी दी। लेकिन इस मुलाकात को तब तूल मिला, जब राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पर बयान जारी किया। गहलोत ने लिखा कि अमित शाह और रंधावा की मुलाकात के कोई सियासी मायने नहीं निकाले जाने चाहिए। रंधावा कांग्रेस के वफादार नेता है। वे कोई गलत कदम नहीं उठाएंगे। गहलोत का आशय रहा कि रंधावा कांग्रेस से बगावत नहीं कर रहे हैं। सवाल उठता है कि आखिर गहलोत को किसने कहा कि रंधावा कांग्रेस से बगावत नहीं कर रहे हैं? किसी भी बड़े नेता अथवा मीडिया घराने ने अमित शाह और रंधावा की मुलाकात के सियासी मायने नहीं निकाले, लेकिन फिर भ गहलोत ने रंधावा को कटघरे में खड़ा करने के लिए अपना बयान जारी कर दिया। जबकि सच्चाई यह है कि रंधावा दिल्ली में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ मिलकर प्रदेश की राजनैतिक कमेटी बनाने में व्यस्त हैं। डोटासरा दो दिन से दिल्ली में रंधावा के साथ ही कमेटी के सदस्यों के नाम पर विचार कर रहे हैं। राहुल गांधी के निर्देश पर बनने वाली इस राजनैतिक कमेटी की देखरेख में ही ढाई वर्ष बाद होने वाले विधानसभा के चुनाव कराए जाएंगे। उम्मीदवारों के चयन में भी इस कमेटी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। जो रंधावा प्रदेश प्रभारी की हैसियत से राजनैतिक कमेटी बनाने में व्यस्त है वो रंधावा कांग्रेस के साथ कैसे बगावत कर सकते हैं? लेकिन गहलोत बिना किसी आधार के बयान जारी कर रंधावा की विश्वसनीयता और वफादारी पर सवाल खड़े कर दिए। जानकार सूत्रों की माने तो राजनैतिक कमेटी में स्वयं और अपने समर्थकों को शामिल करने को लेकर ही गहलोत ने बयान जारी किया। देखना होगा कि गहलोत के इस दबाव वाले बयान का रंधावा पर कितना असर पड़ता है। कांग्रेस की राजनीति में रंधावा को सख्त मिजाज का नेता माना जाता है।
धनखड़ से गहलोत ही मिले:
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ इन दिनों जयपुर में एक निजी अस्पताल में भर्ती है। 2 जुलाई को धनखड़ की एंजियोप्लास्टी हुई। धनखड़ के स्वास्थ्य को देखते हुए किसी भी व्यक्ति को मिलने नहीं दिया जा रहा। यहां तक की भाजपा के बड़े नेता भी धनखड़ से नहीं मिल पा रहे हैं? लेकिन 3 जुलाई को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने धनखड़ से मुलाकात कर उनकी कुशलक्षेम पूछी। गहलोत को प्रदेश प्रभारी रंधावा के केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलने पर तो सियासत नजर आती है, लेकिन जब स्वयं पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ से मिलते हैं तो सियासत नहीं होती। मालूम हो कि धनखड़ को उपराष्ट्रपति के पद से अचानक इस्तीफा देना पड़ा था, जबकि उनका दो वर्ष का कार्यकाल शेष था। राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहे धनखड़ जब भी दिल्ली से जयपुर आते हैं, तब अशोक गहलोत मुलाकात करते हैं। गत बार तो धनखड़ ने मुलाकात के लिए गहलोत को राजभवन में आमंत्रित किया। स्वाभाविक है कि एंजियोप्लास्टी के बाद अनेक भाजपा नेताओं ने भी धनखड़ से मुलाकात की अनुमति मांगी, लेकिन धनखड़ ने 3 जुलाई को अशोक गहलोत को ही मिलने की अनुमति दी। धनखड़ के अचानक इस्तीफे के बाद गहलोत ने कहा था कि धनखड़ के पास अनेक राज हैं।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 04-07-2026)
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अशोक गहलोत ने तो रिफाइनरी का शिलान्यास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से नहीं, बल्कि सोनिया गांधी से करवाया था।
लेकिन गहलोत को अब युवाओं को नियुक्ति पत्र देने पर ही ऐतराज है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 जुलाई को बाड़मेर के पचपदरा में स्थापित एचपीसीएल की रिफाइनरी का उद्घाटन किया। तय कार्यक्रम के अनुसार पीएम मोदी करीब 50 हजार युवाओं को सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र भी देंगे। चूंकि एक साथ इतने युवाओं को एक ही स्थान पर नियुक्ति पत्र नहीं दिए जा सकते हैं, इसलिए सरकार की ओर से जिला मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। यानी जिला मुख्यालय पर भी नियुक्ति पत्र लेने के लिए युवा उपस्थित रहेंगे। यह एक सामान्य प्रक्रिया हैं, लेकिन इस पर भी कांग्रेस के नेता पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ऐतराज है। गहलोत का कहना है कि पीएम की सभा और जिला मुख्यालयों पर भीड़ जुटाने के लिए नियुक्ति पत्र के बहाने युवाओं को बुलाया जा रहा है। गहलोत इसे युवाओं के साथ भद्दा मजाक मानते हैं। आज जिन अशोक गहलोत को युवाओं को प्रधानमंत्री के द्वारा नियुक्ति पत्र देने पर ऐतराज है, उन्हीं अशोक गहलोत ने वर्ष 2013 में पचपदरा में एचपीसीएल की रिफाइनरी का शिलान्यास कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से करवाया था। हालांकि तब देश के प्रधानमंत्री की भूमिका में डॉ. मनमोहन सिंह थे, लेकिन प्रधानमंत्री को दरकिनार कर गहलोत ने रिफाइनरी का शिलान्यास अपने राजनीतिक स्वार्थों के खातिर सोनिया गांधी से करवाया। तब गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। गहलोत बताएं कि तब रिफाइनरी का शिलान्यास प्रधानमंत्री से क्यों नहीं करवाया गया। आज गहलोत को रिफाइनरी के शुरू होने पर भी अनेक आशंकाएं हैं, लेकिन सब जानते हैं कि वर्ष 2013 में जब कांग्रेस सरकार का कार्यकाल पूरा हो रहा था, तब आनन-फानन में गहलोत ने रिफाइनरी का शिलान्यास करवा दिया। चूंकि इस अनुबंध से कई खामियां थी, इसलिए प्रदेश में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने पर सोनिया गांधी और अशोक गहलोत वाले अनुबंध और शिलान्यास को रद्द कर दिया गया। यह सही है कि जिस रिफाइनरी का शिलान्यास सोनिया गांधी ने किया उस रिफाइनरी का काम वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते हुए कुछ भी नहीं हुआ। राजे ने भी अपनी सरकार के एक वर्ष शेष रहने पर 17 जनवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रिफाइनरी का शिलान्यास करवाया। यह बात अलग है कि दिसंबर 2018 में ही राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में फिर से कांग्रेस की सरकार बन गई। अब 4 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही इस रिफाइनरी का उद्घाटन कर रहे हैं। अशोक गहलोत माने या नहीं, लेकिन राजस्थान के विकास में यह रिफाइनरी मील का पत्थर साबित होगी। आज राजस्थान पर 7 लाख 25 हजार करोड़ रुपए का कर्जा है। अर्थशज्ञसत्री मानते हैं कि अकेले इस रिफाइनरी से राजस्थान को प्रति वर्ष 6 हजार करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होगा। इस रिफाइनरी का महत्व इसी से पता चलता है कि इसमें प्रतिवर्ष 9 मिलियन टन क्रूड ऑयल रिफाइंड होगा। करीब 2 मिलियन टन ऑयल स्वदेशी जबकि 7 मिलियन टन क्रूड ऑयल खाड़ी देशों से आएगा। रिफाइंड ऑयल को यूरोप के देशों में बेचा जाएगा। रिफाइनरी की वजह से ही पेंट, फाइबर, केमिकल, प्लास्टिक, पैकेजिंग, फार्मा जैसे पांच सहायक उद्योग भी लगेंगे। करीब एक लाख लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिलेगा।
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