Friday, 23 October 2026

ओम माथुर जब खुद शुद्ध शाकाहारी है तो केरलम् के लोकभवन में मेहमानों को मांसाहारी भोजन कैसे करवा सकते हैं? मांसाहार को लेकर कांग्रेस का ऐतराज बेमानी। अजमेर में पुखराज पहाडिय़ा के निवास पर माथुर के साथ भोजन करने का अवसर मिला। ================ 23 अक्टूबर को ओम माथुर ने केरलम् के राज्यपाल पद की शपथ ले ली। माथुर सिक्किम से स्थानांतरित होकर केरलम् के लोकभवन में आए हैं। राज्यपाल की शपथ लेते ही माथुर ने घोषणा की कि लोकभवन में अब शुद्ध शाकाहार भोजन का ही उपयोग होगा। यानी लोकभवन की रसोई में मांसाहार भोजन नहीं बन सकेगा। मैं यहां खासतौर से उल्लेख करना चाहता हंू कि क ुछ वर्ष पहले जब ओम माथुर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और गुजरात के प्रभारी थे, तब अजमेर में भाजपा के वरिष्ठ नेता पुखराज पहाडिय़ा के वैशाली नगर स्थित निवास पर आए थे। उस समय पहाडिय़ा ने दोपहर के भोजन के समय मुझे भी आमंत्रित किया। मुझे माथुर के साथ भोजन करने का अवसर मिला। तब मैंने देखा कि ओम माथुर शुद्ध शाहाकारी है। सवाल उठता है कि जब ओम माथुर खुद शुद्ध शाकाहारी है तो फिर केरलम् के लोकभवन में मांसाहार भोजन की अनुमति कैसे दे सकते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि ओम माथुर स्वयं तो शाकाहारी भोजन करें, और लोकभवन में आने वाले अतिथियों को मांसाहार वाला भोजन करवाए? लेकिन कांग्रेस को माथुर के इस फैसले पर ऐतराज है। हालांकि कांग्रेस शासित केरलम के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने राज्यपाल माथुर के शाहाकार वाले भोजन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन केरलम से सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के.सी.वेणुगोपाल ने माथुर की घोषणा पर ऐतराज जताया है। वेणुगोपाल का कहना है कि केरलम में मांसाहार खाने वालों की संख्या ज्यादा इसलिए राज्यपला को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए। मालूम हो कि प्रियंका गांधी भी केरलम् के वायनाड से सांसद हैं और पूर्व में राहुल गांधी भी वायनाड के सांसद रह चुके हैं, राज्यपाल ओम माथुर के शाकाहार वाले बयान पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है, लेकिन लोकभवन की रसोई को लेकर कांग्रेस का बयान बेमानी है। S.P.MITTAL BLOGGER ( 24-10-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511
33 वर्ष पहले दिवंगत हुए स्वामी चिन्मयानंद जी ने होलोबोट तकनीक से पीएम मोदी आशीर्वाद दिया। मोदी के सवालों के जवाब भी दिए। यह तकनीक का कमाल है। ================ 23 अक्टूबर को दिल्ली के भारत मंडपम में चिनमय मिशन की ओर से वैश्विक अमृत महोत्सव आयोजित किया गया। इस मिशन का उद्देश्य दुनिया में गीता और वेदांत का ज्ञान फैलाना है। मिशन की स्थापना 1951 में की गई थी। इस वैश्विक महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाग लिया, लेकिन महोत्सव में चमत्कार तब हुआ, जब लोगों ने अपनी आंखों से 33 वर्ष पूर्व दिवंगत हुए स्वामी चिन्मयानंद ने पीएम मोदी को आशीर्वाद देते देखा। असल में मंच पर होलोबोट तकनीक से दिवंगत स्वामी चिन्मयानंदजी की छवि बनाई गइ। यह छवि ऐसी थी कि लोगों ने स्वामी चिन्मयानंद जी को साक्षात रूप में महसूस किया। स्वामी चिमन्यानंद ने कहा कि मुझे आज भी स्मरण है कि आप (नरेंद्र मोदी) 1993 में गुजरात के बड़ौदा में मुझसे मिलने आए थे। तब आपने मुझे शिकॉगो में होने वाले सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण दिया था। मैंने तब भी कहा था कि एक दिन कोई युवा आएगा और भारत में सनातन संस्कृति का झंडा बुलंद करेगा। आज मैं देख रहा हू कि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री है और वे सनातन संस्कृति को मजबूत करने और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही स्वामी जी ने मोदी को अपना आशीर्वाद भी दिया। दिवंगत स्वामी जी से संवाद करने के बाद पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि जब मैं 1993 में स्वामी चिन्मयानंद जी से मिला, तब राजनीति में आने की कोई संभावना नहीं थी, लेकिन स्वामी जी के आशीर्वाद से मुझे राजनीति में आकर देश सेवा करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि मैं चाहता था कि स्वामी चिन्मयानंद शिकागो में विश्व स्तरीय सम्मेलन में भारत का पक्ष रखे, लेकिन सम्मेलन से पूर्व ही स्वामी जी का दुखद निधन हो गया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक का ही कमाल है कि लोगों को स्वामी जी के साक्षात दर्शन हो रहे है। मालूम हो कि होलोग्राफिक तकनीक से किसी भी व्यक्ति की थ्री डी छवि बनाई जा सकती है। यह छवि वास्तविक नजर आती है। छवि में ही एआई तकनीक का इस्तेमाल कर संबंधित व्यक्ति की आवाज भी सुनाई जा सकती है। इसी थ्रीडी और एआई तकनीक इस्तेमाल 23 अक्टूबर के समक्ष किया गया। S.P.MITTAL BLOGGER ( 24-10-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511
चीनी सेना का सामना करने वाली भारत-तिब्बत सेना के पास आज भी पचास वर्ष पुराने हथियार। महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने कांग्रेस को मोदी सरकार पर हमला करने का हथियार दे दिया। 31 अक्टूबर को रिटायरमेंट। ================ 23 अक्टूबर को राजस्थान के अलवर में एक समारोह में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने स्वीकार किया कि अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भारत और चीन के सैनिक आमने सामने हैं। उन्होंने माना कि कई बार टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई है। ऐसी स्थितियां अब भी जारी है, इसके साथ ही कपूर ने यह भी कहा कि आईटीबीपी के पास कई हथियार पचास साल पुराने हैं, जबकि चीन ने अपने हथियारों और सेन्य ढांचे के आधुनिकीकरण में भारी निवेश किया है। इसलिए पारंपरिक तरीकों से चीन के सैनिकों का मुकाबला करना मुश्किल होगा। कपूर ने यह बात तब कही है जब विपक्ष के नेता खास कर कांग्रेस के राहुल गांधी आए दिन चीन सीमा पर हो रहे विवाद को लेकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हैं। राहुल गांधी पहले भी चीन की घुसपैठ के आरोप लगा चुके हैं। लेकिन अब आईटीबीपी के महानिदेशक कपूर ने पचास वर्ष पुराने हथियारों से मुकाबले की जो बात कही है, उससे कांग्रेस को मोदी सरकार पर हमला करने का हथियार मिल गया है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से बार बार दावा किया जाता है कि भारत की सेना को भी आधुनिक हथियार उपलब्ध करवाए गए हैं। आईटीबीपी के महानिदेशक कह रहे हैं कि हमारे सैनिकों के पास आज भी पचास वर्ष पुराने हथियार हैं। स्वभाविक है कि कपूर के बयान को आधार बनाकर कांग्रेस अब मोदी सरकार पर हमलावर होगी। यहां यह खास तौर से उल्लेखनीय है कि शत्रुजीत कपूर आगामी 31 अक्टूबर को महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सितंबर माह में पीएम मोदी और शी जीनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई उसमें सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव को काम करने पर सहमति बनी थी। जिनपिंग ने भी सीमा क्षेत्रों से सैनिकों की संख्या घटाने पर सहमति दी थी। लेकिन आईटीबीपी के महानिदेशक कपूर का ताजा बयान दर्शाता है कि देश की जो सीमा चीन से सटी हुई है, उस पर तनाव बरकरार है। S.P.MITTAL BLOGGER ( 24-10-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511
दशहरे से दीपावली तक प्रकृति, परिवर्तन और नवसृजन का प्रकाश पर्व अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल के सारगर्भित और प्रेरणादायक विचार। ================ अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने दशहरे से लेकर दीपावली पर्व तक के समय को लेकर सारगर्भित और प्रेरणादायक विचार प्रकट किए है। उन्होंने कहा, दशहरा हमें अनावश्यक को त्यागने का साहस देता है और दीपावली नवीन संभावनाओं को प्रकाशित करने की प्रेरणा। इन दोनों पर्वों के मध्य का समय प्रकृति के सृजन-दर्शन को समझने, स्वयं में परिवर्तन लाने और भविष्य की नई संभावनाओं का सृजन करने का अनूठा अवसर है।भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव मनाने की परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन को समझने और उसे बेहतर बनाने के अवसर भी हैं। दशहरा और दीपावली के मध्य का समय इसी दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय, अहंकार के पराभव और मर्यादा की प्रतिष्ठा का प्रतीक है, जबकि दीपावली प्रकाश, उल्लास, समृद्धि और नवीन आरंभ का संदेश देती है। इन दोनों पर्वों के बीच एक गहरा जीवन-दर्शन छिपा है—पुराने और अनुपयोगी को छोड़कर नए, सुंदर और सार्थक के लिए स्थान बनाना। प्रकृति भी इसी सिद्धांत पर गतिशील है। वह निरंतर परिवर्तन करती है, पुराने रूपों को नए रूपों में ढालती है और जीवन की संभावनाओं का विस्तार करती है। इस दृष्टि से दशहरे से दीपावली तक की अवधि केवल त्योहारों के बीच का अंतराल नहीं, बल्कि अंत से आरंभ तक, आत्मचिंतन से सृजन तक और संकल्प से कर्म तक की यात्रा है।प्रकृति परिवर्तन की पहली गुरु है। प्रकृति हमें सिखाती है कि प्रत्येक अंत अपने भीतर किसी नए आरंभ की संभावना छिपाए रखता है। वृक्षों से झड़ने वाली पत्तियाँ मिट्टी में मिलकर उसकी उर्वरता बढ़ाती हैं। बीज अपना पूर्वरूप खोकर अंकुर बनता है। वर्षा के बाद धरती नई हरियाली से भर उठती है। प्रकृति में परिवर्तन विनाश की अंतिम घोषणा नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रो. अग्रवाल ने कहा, मनुष्य के जीवन में भी यही नियम लागू होता है। जब हम अपनी जड़ हो चुकी धारणाओं, अनुपयोगी आदतों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हैं, तभी नए विचारों के लिए स्थान बनता है। दशहरा हमें अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और असंवेदनशीलता को पहचानने की प्रेरणा देता है। किंतु इन प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक दहन तभी सार्थक है, जब उनके स्थान पर विनम्रता, संयम, संवाद और करुणा विकसित हों। दीपावली इसी परिवर्तन को प्रकाश देने का पर्व है। दीप जलाना केवल अंधकार दूर करने की क्रिया नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, आशा और सृजनात्मकता को जागृत करने का प्रतीक भी है। दशहरा हमें बताता है कि क्या छोड़ना है और दीपावली प्रेरित करती है कि उसके स्थान पर क्या रचना है। परिवर्तन से सर्जनात्मकता जन्म लेती है। सृजनात्मकता का अर्थ केवल साहित्य, संगीत या कला की रचना करना नहीं है। किसी समस्या का नया समाधान खोजना, किसी व्यवस्था को बेहतर बनाना, सीमित संसाधनों में अधिक उपयोगी परिणाम प्राप्त करना और समाज के सामने उपस्थित चुनौतियों के वैकल्पिक उपाय विकसित करना भी सृजन है। प्रकृति इस सृजनात्मकता की महान प्रेरक है। पक्षियों के घोंसले, पौधों की अनुकूलन क्षमता और पारिस्थितिक तंत्रों का संतुलन हमें बताते हैं कि जीवन की समस्याओं के समाधान अनेक रूपों में संभव हैं। आधुनिक विज्ञान में प्रकृति की संरचनाओं और प्रक्रियाओं से प्रेरणा लेकर नए समाधान खोजने की प्रवृत्ति को बायोमिमिक्री कहा जाता है। वास्तुकला से लेकर ऊर्जा और तकनीक तक अनेक क्षेत्रों में प्रकृति का अवलोकन नई कल्पनाओं को जन्म देता है। मनुष्य की सर्जनात्मकता भी तब विकसित होती है, जब वह वर्तमान स्थिति को अपरिवर्तनीय मानने से इनकार करता है। वह प्रश्न करता है, प्रयोग करता है और बेहतर विकल्प तलाशता है। दशहरे से दीपावली तक का समय इसी दृष्टि को जीवन में उतारने का अवसर बन सकता है—हम अपनी समस्याओं को नए दृष्टिकोण से देखें, रूढ़ियों से आगे बढ़ें और उन संभावनाओं को पहचानें जिन्हें अब तक अनदेखा किया गया है। यह‌ समय प्रकृति के साथ संतुलन: कर विकास का नया सूत्र प्रदान करता है।‌आज विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अनेक सुविधाएँ प्रदान की हैं, लेकिन जल प्रदूषण, वनों का क्षरण, जैव विविधता में कमी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ यह भी बताती हैं कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन आवश्यक है। जब प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु माना जाता है, तब प्रगति की प्रक्रिया असंतुलित होने लगती है। उन्होंने कहा, दशहरे के रावण-दहन को इस संदर्भ में एक समकालीन अर्थ दिया जा सकता है। हमें उस मानसिकता का दहन करना होगा, जो असीमित उपभोग को सफलता और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन को विकास का पर्याय मानती है। दीपावली का प्रकाश हमें ऐसे भविष्य की कल्पना करने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिसमें जल संरक्षण, वृक्षों की देखभाल, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग और अपशिष्ट का पुनः उपयोग हमारी जीवनशैली का हिस्सा हों। राजस्थान जैसे अपेक्षाकृत शुष्क प्रदेश में खेजड़ी जैसे वृक्ष और पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियाँ प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का महत्त्वपूर्ण संदेश देती हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि सीमित संसाधनों के बीच भी मानवीय बुद्धिमत्ता, स्थानीय ज्ञान और सामूहिक प्रयास से स्थायी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। यदि हम इन पर्वों के मध्य किसी जलस्रोत के संरक्षण, वृक्षों की देखभाल या पर्यावरणीय जागरूकता का संकल्प लें, तो सांस्कृतिक उत्सव व्यावहारिक परिवर्तन का माध्यम बन सकते हैं। यह समय शिक्षा, संस्कृति और नवाचार का सेतु भी है प्रो. अग्रवाल ने कहा, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में दशहरे से दीपावली तक की अवधि को सृजनात्मक गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है। विद्यार्थी स्थानीय वनस्पतियों का अध्ययन करें, पारंपरिक जलस्रोतों का दस्तावेजीकरण करें, अपशिष्ट के पुनः उपयोग के मॉडल बनाएँ और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान खोजें। इससे ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर अनुभव, प्रयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ता है। इसी प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद स्थापित करना भी नवसृजन की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। परंपरा का अर्थ अतीत को ज्यों का त्यों दोहराना नहीं, बल्कि उसके उपयोगी मूल्यों को नए समय की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना है। जब परंपरा और नवीनता के बीच रचनात्मक संवाद होता है, तब संस्कृति स्थिर नहीं रहती, बल्कि जीवंत और गतिशील बनती है। अपने भीतर का दीप जलाएँ प्रो. अग्रवाल ने कहा, बाहरी संसार को बदलने से पहले अपने भीतर परिवर्तन लाना आवश्यक है। अहंकार के स्थान पर विनम्रता, उदासीनता के स्थान पर संवेदनशीलता और स्वार्थ के स्थान पर सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करना ही वास्तविक आत्मपरिवर्तन है। यह परिवर्तन किसी एक दिन में नहीं आता; वह छोटे-छोटे संकल्पों, निरंतर प्रयासों और विवेकपूर्ण निर्णयों से आकार लेता है दशहरे से दीपावली तक का समय हमें इसी आंतरिक यात्रा की प्रेरणा देता है। हम अपने जीवन में एक सकारात्मक आदत विकसित करें, प्रकृति के संरक्षण के लिए एक ठोस कदम उठाएँ और अपनी सर्जनात्मक क्षमता को समाज के कल्याण से जोड़ें। यही पर्वों के संदेश को व्यवहार में उतारने का सार्थक मार्ग है। अंततः प्रकृति हमें सिखाती है कि जीवन की निरंतरता परिवर्तन और सृजन पर निर्भर करती है। दशहरा हमें अवांछित प्रवृत्तियों से मुक्त होने का साहस देता है, दीपावली नई संभावनाओं को प्रकाशित करने की प्रेरणा और इनके मध्य का समय संकल्प को कर्म में बदलने का अवसर प्रदान करता है। दशहरा हमें बताता है कि क्या समाप्त होना चाहिए, दीपावली प्रेरित करती है कि क्या आरंभ होना चाहिए; और इनके बीच की यात्रा हमें सिखाती है कि बेहतर भविष्य का निर्माण केवल संकल्प से नहीं, बल्कि सतत सृजनात्मक प्रयास से होता है। जब हम प्रकृति से जुड़कर परिवर्तन को समझते हैं, अपनी सर्जनात्मकता को उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं और पर्वों के मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारते हैं, तब दीपावली का प्रकाश केवल घरों में नहीं, हमारी चेतना, हमारी संस्कृति और हमारे सामूहिक भविष्य में भी फैलता है। यही दशहरे से दीपावली तक की अवधि का सबसे सुंदर संदेश है—अंधकार को मिटाने के साथ ऐसा प्रकाश रचें, जो जीवन को नई दिशा दे। S.P.MITTAL BLOGGER ( 23-10-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511
होटल मेरवाड़ा एस्टेट पर सोगानी परिवार का ही नियंत्रण। परिवार के सदस्यों का ही मालिकाना हक। ================ अजमेर के आनासागर के किनारे करीब 2 सौ करोड़ रुपए कीमत वाली होटल मेरवाड़ा एस्टेट पर सोगानी परिवार का ही नियंत्रण है। परिवार के सदस्य विजय सोगानी और विनय सोगानी ने बताया कि कुछ वर्ष पहले सतीश अरोड़ा नाम के व्यक्ति को होटल का मैनेजर नियुक्ति किया था। लेकिन हाल ही में अरोड़ा को मैनेजर के पद से बर्खास्त कर दिया गया है। अब होटल प्रबंधन में अरोड़ा का कोई दखल नहीं है। सोगानी बंधुओं ने कहा, होटल की बुकिंग से लेकर सभी प्रबंधकीय कार्य उन्हीं की देखरेख में हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि होटल की जो अधिकृत वेबसाइट है उसी से जानकारी ली जा सकती है। उन्होंने कहा कि परिवार के किसी भी सदस्य ने होटल के बेचान को लेकर किसी भी समूह से संवाद नहीं किया है। यह होटल उनके परिवार की पुश्तैनी धरोहर है। चूंकि डेढ़ सौ वर्ष पुरानी इस होटल का ऐतिहासिक महत्व है, इसलिए परिवार के सदस्य ही भविष्य में भी होटल का संचालन करते रहेंगे। होटल को उनके पूर्वजों ने अंग्रेजों के शासन काल में बनवाया था और तब यह उनके पूर्वजों का निवास स्थान रहा। समय के बदलाव के साथ सेठ भागचंद की कोठी को होटल का स्वरूप दिया गया और आज अजमेर के प्रमुख समारोह इसी होटल में संपन्न होते हैं। 12 हजार वर्गगज में स्थापित इस होटल में विभिन्न धर्मों के धार्मिक आयोजन भी समय समय पर होते रहते हैं। राजनीतिक समारोह के कारण बड़े नेताओं का भी होटल में आवागमन रहता है। उन्होंने कहा कि होटल के मालिकाना हक को लेकर कोई विवाद नहीं है। किसी के पास भी ऐसा प्रमाणिक दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित होता हो कि एक रुपए का निवेश भी किसी बाहरी व्यक्ति ने होटल में किया है। पूर्व में शादी समारोह को लेकर जो कंपनी बनाई गई थी, उसे भी रद्द कर दिया गया है। अब शादी समारोह के कार्य भी सोगानी परिवार के द्वारा ही निर्धारित होते हैं। होटल के प्रबंधन के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नंबर 9829065061 पर विनय सोगानी से ली जा सकती है। S.P.MITTAL BLOGGER ( 23-10-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511