Wednesday, 1 December 2021

अजमेर में कृषि भूमि पर बने मकानों के पट्टे जारी होने में विसंगतियां। ग्रामीण परेशान। शिविर में लगे सचिन पायलट जिंदाबाद के नारे।

प्रशासन शहरों एवं गांवों के संग के शिविरों में कृषि भूमि पर बने मकानों के पट्टे जारी करने के निर्देश सरकार के हैं, लेकिन अजमेर में विकास प्राधिकरण की अड़चनों के चलते कृषि भूमि पर बने मकानों के पट्टे शिविरों में जारी नहीं हो रहे हैं। असल में जिला प्रशासन ने जिस क्षेत्र को आबादी घोषित कर दिया है, वहां तो 300 वर्गगज तक भूखंड का पट्टा मात्र 501 रुपए में दिया जा रहा है। लेकिन जो क्षेत्र आबादी घोषित नहीं है, वहां ग्राम पंचायतें 200 रुपए प्रति वर्ग गज के हिसाब से नियमन शुल्क वसूल रही हैं। शहरी  सीमा से लगी अजयसर और हाथीखेड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच सोहनी बानो और लाल सिंह रावत ने माना कि एक ही गांव में दो प्रकार का शुल्क निर्धारित किया गया है। आबादी वाले क्षेत्र में बने मकान का पट्टा 501 रुपए में दिया जा रहा है, लेकिन वहीं उसी गांव में यदि कोई खसरा आबादी घोषित नहीं है तो उस पर बने मकान पर 200 रुपए प्रति वर्ग गज शुल्क लिया जा रहा है। यानी एक ही गांव में पट्टा जारी करने का शुल्क अलग अलग है। इससे सरकार की मंशा के अनुरूप ग्रामीणों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। 30 नवंबर को सैकड़ों ग्रामीणों ने सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष काबरा के नेतृत्व में ग्राम हाथी खेड़ा में लगे शिविर में अजमेर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से भी मुलाकात की। काबरा ने अधिकारियों को बताया कि जिला कलेक्टर ने भी धारा 177 के तहत पट्टे जारी करने के आदेश जारी किए हैं, लेकिन फिर भी ग्रामीणों को 501 रुपए में पट्टा नहीं दिया जा रहा है। इसलिए हजारों ग्रामीण आवेदन ही नहीं कर पा रहे हैं। काबरा ने मांग की कि जिस प्रकार आबादी क्षेत्र में 501 रुपए में 300 वर्ग गज तक के भूखंड का पट्टा दिया जा रहा है, उसी प्रकार ग्राम पंचायतों के अधीन आने वाली कृषि भूमि पर बने मकानों के पट्टे भी जारी हों। प्रशासन को शुल्क की विसंगति को जल्द से जल्द दूर किया जाए। तभी प्रशासन शहरों और गांवों के संग अभियान के शिविर सफल होंगे। काबरा ने कहा कि जिन जिलों में विकास प्राधिकरण का दखल नहीं है वहां सभी कृषि भूमि को आबादी मानकर 501 रुपए में ही पट्टे जारी किए जा रहे हैं।
शिविरों को लेकर ग्रामीणों में उत्साह-रलावता:
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गत विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे महेंद्र सिंह रलावता ने कहा कि प्रशासन शहरों और गांवों के संग के शिविरों में ग्रामीणों को राहत मिल रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मंशा के अनुरूप पट्टे जारी हो रहे हैं। राज्य सरकार और जिला प्रशासन ग्राम पंचायतों के खसरों को आबादी क्षेत्र घोषित कर रहे हैं। रलावता ने कहा कि कुछ लोगों ने कृषि भूमि पर कॉलोनियां बसा दी है और अब ऐसे लोग 300 वर्ग गज के भूखंड का पट्टा मात्र 501 रुपये में चाहते हैं जो उचित नहीं है। इसके लिए लोगों को 200 रुपए प्रति वर्ग गज के हिसाब से शुल्क जमा करवाना चाहिए ताकि ग्राम पंचायतें विकास भी करवा सकें। हाथी खेड़ा के शिविर में रलावता की उपस्थिति में सचिन पायलट जिंदाबाद के नारे भी लगे। 
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दिल्ली जाने वाले 19 विधायकों में से पांच को मंत्री बनाने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कह रहे हैं कि सरकार बचाने वाले विधायकों का भी ख्याल रखा जाएगा।यदि इतनी ही हिम्मत है तो मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा के खिलाफ कार्यवाही करके दिखाएं।मंत्री न बनने वाले विधायकों को संतुष्ट रखने की चुनौती है गहलोत के सामने।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गत 21 नवंबर को नियमों के मुताबिक मंत्रिमंडल में सभी 30 पद भर लिए हैं। जो विधायक मंत्री नहीं बने हैं, उन्हें भी पता है कि अब मंत्रिमंडल में कोई पद खाली नहीं है। ऐसी स्थिति में कोई बगावत नहीं हो, इसलिए 30 नवंबर को सीएम गहलोत ने कहा कि अब मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हो सकता है। जो मंत्री अच्छा काम नहीं करेगा, उसे हटाया भी जा सकता है। कांग्रेस हाईकमान मंत्रियों की परर्फामेंस पर नजर रखते हुए हैं। गहलोत ने कहा कि गत वर्ष जब 19 विधायक दिल्ली चले गए थे, तब जिन विधायकों ने सरकार बचाई उनका ख्याल रखा जाएगा। गहलोत ने माना कि अभी ऐसे अनेक विधायक हैं जो मंत्री बनने की पूरी पात्रता रखते हैं। अब जब विधानसभा चुनाव में मात्र 22 माह रह गए हैं, तब गहलोत अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन कब और कैसे करेंगे, यह तो वही जाने लेकिन गहलोत ने यह बात कही है, जब सचिन पायलट सहित दिल्ली जाने वाले 19 विधायकों में से पांच को मंत्री बना दिया गया है। इनमें से तीन हेमाराम चौधरी, विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा कैबिनेट मंत्री हैं, जबकि मुरारी लाल मीणा और बृजेंद्र ओला को स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया गया है। सवाल उठता है कि सचिन पायलट के नेतृत्व में दिल्ली जाने वाले विधायकों को लेकर सीएम गहलोत के मन में इतना ही गुस्सा है तो फिर पांच विधायकों को मंत्री क्यों बनाया? गहलोत को पहले उन विधायकों को मंत्री बनाना चाहिए था, जिनकी वजह से सरकार बची। पांच विधायकों को मंत्री बनाने के बाद गहलोत ने पुनर्गठन वाले बयान का क्या मायने है? यदि अच्छा काम नहीं करने वाले मंत्रियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की हिम्मत है तो गहलोत को सबसे पहले सैनिक कल्याण होमगार्ड तथा सिविल डिफेंस विभाग के स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री राजेंद्र सिंह गुढा के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए। 21 नवंबर को मंत्री पद की शपथ लेने के बाद भी एक दिसंबर तक गुढा ने सचिवालय में अपने विभागों का काम काज नहीं संभाला है। गुढा ने सरकारी कार भी लौटा दी है। गुढा का खुले आम कहना है कि पहले उनके तीन-चार समर्थक विधायकों को निगम, बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर मंत्री पद का सम्मान दिया जाए। गुढा अब कांग्रेस के विधायक हैं और कांग्रेस के बारे में उनकी धारण कैसी है, यह गहलोत अच्छी तरह जानते हैं। असल में जिन राजनीतिक परिस्थितियों में गहलोत सरकार चला रहे हैं उनमें विधायकों को संतुष्ट रखना चुनौती पूर्ण काम है। सीएम गहलोत जिस प्रकार बार बार कांग्रेस हाईकमान का उल्लेख कर रहे हैं, उससे प्रतीत होता है कि गहलोत 21 नवंबर वाले मंत्रिमंडल के फेरबदल से भी खुश नहीं है। देखना होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस की राजनीति किधर जाती है। 
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Tuesday, 30 November 2021

अजमेर के विनोद चौहान अहमदाबाद में निभा रहे हैं सेवक की भूमिका।सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में जरूरतमंदों को चिकित्सा सुविधा निशुल्क उपलब्ध करवाते हैं।

राजस्थान के बहुत से लोग गुजरात के अहमदाबाद में जाकर अपना इलाज करवाते हैं। धनाढय़ लोग तो पैसे के दम पर अपना इलाज करवा लेते हैं, लेकिन जो लोग गरीब हैं और उनके पास कोई मेडिक्लेम पॉलिसी भी नहीं है, उन्हें अहमदाबाद जैसे महानगर में अने परेशानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन यदि आपके साथ विनोद चौहान खड़े हैं तो फिर आपको न डॉक्टर और न इलाज की चिंता करनी चाहिए। आप यदि महंगे प्राइवेट अस्पताल में भी भर्ती हैं तो अस्पताल का खर्च भी विनोद चौहान गुजरात सरकार से भरपाई करवाएंगे। आप यदि सरकारी अस्पताल में भर्ती हैं तो डॉक्टरकी उपलब्धता से लेकर दवाइयों तक का इंतजाम विनोद चौहान ही करेंगे। गुजरात के राजभवन से जुड़े होने के कारण विनोद का अहमदाबाद में खासा प्रभाव है। चूंकि वे सेवा की भावना से काम करते हैं, इसलिए सरकार में भी विनोद के सुझावों को गंभीरता से लिया जाता है। भले ही मन में हिन्दुत्व के प्रति गहरी आस्था है, लेकिन जब मानव सेवा की बात आती है तो धर्म कोई मायने नहीं रखता है। अहमदाबाद और गुजरात में ऐसे बहुत से मुस्लिम परिवार हैं, जिनके विनोद चौहान मददगार बने हैं। विनोद स्वाभिमान ग्रुप से ही जुड़े हैं, यह ग्रुप जरूरतमंद की मदद के लिए तत्पर रहता है। विनोद ने बताया कि कोरोना काल में लोगों को चिकित्सा सुविधा के अलावा राशन की सामग्री तक घर पर ही पहुंचाई गई। सेवा का ऐसा जज्बा है कि रात दिन सेवा की भावना से ही काम करते हैं। विनोद अजमेर के रहने वाले हैं। लेकिन पिछले 15 वर्ष से अहमदाबाद में ही रह रहे हैं। अजमरे नगर परिषद के सभापति रहे स्वर्गीय वीर कुमार को अपना आदर्श मानने वाले विनोद चौहान को तब और संतुष्टी मिलती है, जब वे अहमदाबाद में अजमेर के किसी नागरिक के मददगार बनते हैं। अजमेर के लोगों को तो अहमदाबाद में आवास की सुविधा भी नि:शुल्क उपलब्ध करवाई जाती है। ऐसे सेवाभावी विनोद चौहान से मोबाइल नम्बर 9537032500 पर संपर्क किया जा सकता है। 
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दिल्ली की सीमाओं को अब जाम रखने की जरुरत नहीं। एमएसपी के लिए किसानों को तपस्या करने की जरुरत-रामपाल जाट किसान नेता।एक अनाज की कई किस्म, एमएसपी की गारंटी कैसे संभव-अमित गोयलन्यूज 18 चैनल पर हुई सार्थक बहस।

29 नवंबर को रात 8 बजे न्यूज-18 (राजस्थान) न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम लाव डिबेट के प्रोग्राम में जर्नलिस्ट ब्लॉगर के तौर पर मैं भी शामिल हुआ। प्रोग्राम के एंकर वरिष्ठ पत्रकार जेपी शर्मा चाहते थे कि डिबेट में भाग लेने वाले वक्ता कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसान आंदोलन पर अपनी राय रखें। सबसे पहले राजस्थान के प्रमुख किसान नेता और किसान संयुक्त मोर्चा के प्रतिनिधि रामपाल जाट को बोलने का अवसर दिया। मुझे पता है कि जाट पिछले लंबे अर्से से किसानों की मांगों के लिए राजस्थान में संघर्ष कर रहे हैं। जाट ने भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की किसान विरोधी नीतियों की भी आलोचना की है। एक वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने कृषि सुधार कानून बनाए तो कानूनों का विरोध करने वालों में रामपाल जाट सबसे आगे थे। राजस्थान से जुड़ी दिल्ली की सीमा पर जाट ने जाम लगाया। जाट ने अपने किसान साथियों के साथ जो संघर्ष किया उसी का परिणाम रहा कि केंद्र सरकार को कानून वापस लेने पड़े। यही वजह रही कि जेपी शर्मा के प्रोग्राम में सभी की नजरें जाट की प्रतिक्रिया पर थी। जाट ने बेबाकी के साथ कहा कि जब कानून वापस हो गए हैं, तब दिल्ली की सीमाओं को जाम रखने की कोई जरूरत नहीं है। कानून वापसी को लेकर ही आंदोलन शुरू किया गया था और मांग पूरी हो गई है तो फिर आंदोलन जारी रखना उचित नहीं है। कोई किसान नहीं चाहता कि उसकी वजह से आम लोगों को परेशानी हो। मौजूदा समय में दिल्ली की सीमाओं पर जाम लगाए रखने से लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। जहां तक एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर गारंटी का सवाल है तो इसके लिए हम लंबे अर्से से संघर्ष कर रहे हैं। पिछले 11 वर्षों से तो मैं स्वयं ही मांग करता आ रहा हंू। यह मांग यूपीए सरकार के समय से ही हो रही है। यह मांग किसानों के हित से जुड़ी है, इसलिए किसानों को तपस्या करनी होगी। और किसान में इतना सामर्थ्य है कि वह अपनी तपस्या से सरकार को झुका सकता है। जाट ने कहा कि एमएसपी पर गारंटी के लिए हमें अलग तरीके से आंदोलन करना पड़ेगा। रामपाल जाट के इस कथन के बाद बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि जेपी शर्मा ने जो सवाल उठाया था उसका सही जवाब मिल गया। लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता आरआर तिवारी को तो पार्टी लाइन पर ही बोलना था, इसलिए उन्होंने अपनी ऊंची आवाज में वो ही कहा जो राहुल गांधी और अशोक गहलोत कह रहे हैं। यानी राकेश टिकैत के नेतृत्व में किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठा रहे। वही इस प्रोग्राम में भाजपा के तेज तर्रार प्रवक्ता अमित गोयल ने महत्त्वपूर्ण मुद्दा रखा। गोपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चाहते हैं कि किसानों को उनकी लागत से ज्यादा का भुगतान मिले। इसलिए मोदी सरकार ने 22 प्रकार के खाद्यानों पर एमएसपी को बढाया है। सरकार अपने स्तर पर खाद्यानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रक्रिया को अपने स्तर पर मजबूत कर रही है, लेकिन सवाल यह भी है कि एमएसपी पर गारंटी कैसे दी जा सकती है। गारंटी देने का मतलब है कि निर्धारित मूल्य से कम में खरीद नहीं होगी। सरकार अच्छी क्वालिटी पर एमएसपी निर्धारित करती है, लेकिन हम देखते हैं कि बाजार में गेहूं की कई किस्म होती है। खुले बाजार में गेहूं 15 रुपए किलो भी मिलता है तो एमएसपी से अधिक 25 रुपए किलो में भी मिल रहा है। अच्छी क्वालिटी वाले गेहूं का मूल्य जब 25 रुपए मिल रहा है तो वह एमएसपी पर सस्ती दर में क्यों बेचेगा? इसी प्रकार 15 रुपए वाला गेहूं 22 रुपए में क्यों खरीदा जाएगा? गोयल ने कहा कि एमएसपी पर गारंटी देने से पहले ऐसे मुद्दों पर विचार विमर्श की जरूरत है। इस प्रोग्राम में मैंने किसान नेता रामपाल जाट की बात को ही आगे बढ़ाया। किसान आंदोलन के पीछे अनेक राजनीतिक दल हैं जो किसानों के कंधे पर बंदूक रख कर अपने स्वार्थ पूरे करने में लगे हुए हैं। 
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छह महिला सांसदों की फोटो ट्विटर पर पोस्ट कर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा को बताया आकर्षक जगह।इसमें एनसीपी के प्रमुख शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी शामिल।65 वर्ष की उम्र में भी आदत से मजबूर है शशि थरूर।

कहा तो यही जाता है कि उम्र के हिसाब से व्यक्ति सीखता भी है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि 65 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी कांग्रेस सांसद शशि थरूर अपनी आदतों से मजबूर हैं। 29 नवंबर को शशि थरूर ने 6 महिला सांसदों के साथ स्वयं का सेल्फी नुमा फोटो ट्विटर पर पोस्ट किया है। इसका फोटो कैप्शन है-कौन कहता है कि लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है? शशि थरूर ने किस मानसिकता से इस फोटो को पोस्ट किया है, यह तो वे ही जाने, लेकिन इन 6 महिला सांसदों में राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी शामिल हैं। इसके अलावा परनीत कौर, थमीजाची थंगापंडियन, मिमी चक्रवर्ती, नुसरत जहां और ज्योतिमणि भी हैं। हालांकि अभी शरद पवार से लेकर सभी 6 महिलाओं की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद शशि थरूर ने यह फोटो हटा लिया है। थरूर ने भले ही यह फोटो हटा लिया हो, लेकिन फोटो को पोस्ट करने से थरूर की मानसिकता तो जाहिर होती ही है। सब जानते हैं कि थरूर पर अपनी तीसरी पत्नी सुनंदा पुष्कर की हत्या का आरोप भी लग चुका है। शशि थरूर की रंगीन मिजाजी के किस्से आम हैं, लेकिन इसके बावजूद भी 6 महिला सांसदों ने सेल्फी वाली फोटो खिंचवाने की हिम्मत दिखाई। संभवत: महिला सांसदों की हिम्मत को देखते हुए ही शशि थरूर ने लोकसभा को आकर्षक जगह बता दिया। जबकि संसद को तो लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है। शशि थरूर की सोच लोकतंत्र के मंदिर को लेकर कैसी है, इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है। एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं जो लोकतंत्र के मंदिर की सीढिय़ों पर सिर झुकाते हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सांसद शशि थरूर है जो लोकसभा को काम करने के लिए आकर्षक जगह मानते हैं। यदि शशि थरूर कांग्रेस के सांसद नहीं होते तो ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले राहुल गांधी अब तक तीखी प्रतिक्रिया दे देते। राहुल गांधी प्रतिक्रिया दे या नहीं, लेकिन शशि थरूर को अपनी आदतों में सुधार करने की जरूरत है। यह माना कि थरूर शुरू से ही पश्चिमी संस्कृति में पले बढ़े हैं, लेकिन अब थरूर भारत की राजनीति में सक्रिय हैं। थरूर की बुद्धिमता में कोई कमी नहीं है, इस लिए तिरुवनंतपुरम संसदीय क्षेत्र की जनता दो बार से थरूर को ही अपना सांसद चुन रही है। सवाल यह भी ऐसी मानसिकता का प्रदर्शन कर थरूर तिरुवनंतपुरम की जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहे हैं?
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