Wednesday, 8 February 2023

सूफी संत ख्वाजा साहब की दरगाह पर पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की दस्तक।खादिम समुदाय ने चिंता जताई। दरगाह के तबर्रुक (प्रसाद) प्याज तक का उपयोग नहीं होता।

सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह को दुनिया भर में कौमी एकता की मिसाल माना जाता है। सुफिज्म से जुड़ी दरगाह की अपनी रिवायतें हैं, जिन का पिछले 800 सालों से पालन हो रहा है। दरगाह से जुड़े सभी पक्ष इस बात का प्रयास  करते हैं कि दरगाह की पहचान कौमी एकता की बनी रहे। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में सूफी संत की दरगाह पर भी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की दस्तक हो गई है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी नेता डॉ. मोहम्मद अशरफ आसिफ जलाली ने एक धार्मिक सभा में ख्वाजा साहब की दरगाह के खादिमों पर प्रतिकूल टिप्पणी की। डॉ. जलाली ने गत 27 जनवरी को सालाना उर्स के दौरान हुए विवाद पर भी दरगाह की परंपराओं के विपरीत अपनी बात रखी। दरगाह के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने डॉ. जलाली की टिप्पणियों पर सख्त एतराज जताया है। चिश्ती ने कहा कि डॉ. जलाली पाकिस्तान के एक कट्टरपंथी हैं और भारत और पाकिस्तान के मुसलमानों को गुमराह करते हैं। खुद पाकिस्तान की सरकार भी डॉ. जलाली के कट्टरपंथी विचारों से सहमत नहीं है, इसलिए उन पर कानूनी कार्यवाही भी की गई है। यहां तक कि डॉ. जलाली को जेल भी जाना पड़ा है। चिश्ती ने कहा कि ख्वाजा साहब की शिक्षाओं पर अमल कर खादिम समुदाय दरगाह में आने वाले जायरीन की खिदमत करते हैं। यहां सभी धर्मों के लोगों से समान रूप से व्यवहार किया जाता है। ख्वाजा साहब ने अपने जीवनकाल में सर्वधर्म समभाव की जो परंपराएं निर्धारित की उन्हीं का पालन आज तक हो रहा है। सूफिज्म की परंपराओं को निभाने में खादिम समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है। 1947 से देश के विभाजन के बाद जब अधिकांश मुसलमान पाकिस्तान चले गए, तब अधिकांश खादिम परिवारों ने दरगाह को नहीं छोड़ा। खादिम समुदाय पूरी अकीदत के साथ दरगाह में सूफिज्म की परंपराओं का निर्वाह कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के किसी कट्टरपंथी नेता की धमकियों से खादिम समुदाय डरने वाला नहीं है। चिश्ती ने कहा कि पाकिस्तान के कट्टरपंथी चाहें जैसी सोच रखें, लेकिन दरगाह के तबर्रुक (प्रसाद) में आज भी प्याज तक का उपयोग नहीं होता है। उन्होंने बताया कि दरगाह की विशालकाय देगों में प्रतिदिन चावल पकाए जाते हैं और फिर पके चावलों को तबर्रुक के तौर पर जायरीन को बांटा जाता है। चावल में काजू बादाम तक डाले जाते हैं, लेकिन तबर्रुक को मांस आदि से दूर रखा जाता है। चिश्ती ने कहा कि दरगाह की कौमी एकता की परंपराओं को पाकिस्तान के किसी कट्टरपंथी को तोड़ने नहीं दिया जाएगा। पाकिस्तान के कट्टरपंथी से मुकाबला करने के लिए खादिम समुदाय एकजुट हे। उन्होंने कहा कि डॉ. जलाली के वीडियो पर केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों को भी संज्ञान लेना चाहिए। इस बात के इंतजाम किए जाए कि कट्टरपंथी जमात के लोग दरगाह का माहौल खराब नहीं करें। खादिम समुदाय तो अपनी ओर से सतर्क है ही। मालूम हो कि गत 27 जनवरी को बरेलवी मकतब के कुछ लोगों ने अपनी विचारधारा के अनुरूप दरगाह में कलाम प्रस्तुत किए। इस खादिमों और दरगाह कमेटी ने एतराज जताया था। इस एतराज पर ही पाकिस्तान के कट्टरपंथी नेता डॉ. जलाली ने खादिमों पर अभद्र टिप्पणियां की। 

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मल्लिकार्जुन खडग़े 100 दिन बाद भी राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद पर कायम। तो फिर गत वर्ष सितंबर में अशोक गहलोत को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद से हटाने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?

मल्लिकार्जुन खडग़े को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने 100 दिन से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक भी राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल का नेता पद नहीं छोड़ा है। यानी अध्यक्ष बनने के बाद भी खडग़े संसदीय दल के नेता पद पर भी कायम है। यानी कांग्रेस में एक व्यक्ति के पास दो महत्वपूर्ण पद है। कांग्रेस संसदीय दल का नेता होने के काम खडग़े को केबिनेट मंत्री की सभी सुविधा मिली हुई है। खडग़े के पास दोनों पद होने पर ही अब कांग्रेस में सवाल उठने लगे हैं कि गत वर्ष सितंबर में अशोक गहलोत को राजस्थान के मुख्यमंत्री के पद से हटाने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत की दुहाई देकर ही अशोक गहलोत से मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए कहा गया था। उस समय गहलोत ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने वाले थे। गहलोत के नामांकन से पहले ही 25 सितंबर को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने जयपुर में कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुला ली। ताकि नए मुख्यमंत्री के चयन का अधिकार कांग्रेस हाईकमान को दिया जा सके। हाईकमान के रुख को देखते हुए ही स्वयं अशोक गहलोत को बगावत करनी पड़ी। गहलोत ने अपनी भरोसेमंद मंत्री शांति धारीवाल के घर पर कांग्रेस विधायकों की बैठक बुलाई और 91 विधायकों का सामूहिक इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को दिलवा दिया। इससे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा आयोजित बैठक धरी रह गई। अब गहलोत समर्थकों का सवाल है कि जब खडग़े को दो पदों पर रहने की छूट दी जा सकती है तो फिर ऐसी छूट गहलोत को क्यों नहीं दी गई? जबकि खडग़े के मुकाबले में गहलोत ज्यादा वफादार हैं। यदि सितंबर में जल्दबाजी नहीं दिखाई जाती तो अशोक गहलोत को बगावत भी नहीं करनी पड़ती। जानकारों की माने तो अशोक गहलोत ने भले ही मुख्यमंत्री का पद बरकरार रखा हो, लेकिन गांधी परिवार से पहले वाले संबंध नहीं रहे हैं। संबंधों में तल्खी के चलते ही राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा के समापन समारोह में भी अशोक गहलोत श्रीनगर नहीं पहुंचे। हालांकि समारोह में नहीं जाने का कारण गहलोत का स्वास्थ्य खराब होना बताया गया, लेकिन दो दिन बाद ही गहलोत ने विधानसभा की कार्यवाही में भाग लिया और राज्यपाल के अभिभाषण पर विस्तृत जवाब भी दिया। गहलोत का कहना रहा कि डॉक्टरों ने बोलने के लिए माना किया है, लेकिन राजस्थान के हित में मुझे बीमारी में भी बोलना पड़ रहा है। गहलोत के इस कथन से उनके खराब स्वास्थ्य का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

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आखिर आरटीडीसी के अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ ने पुष्कर में महामृत्युंजय यज्ञ और रुद्राभिषेक क्यों करवाया?क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं राठौड़?

8 फरवरी को अजमेर के पुष्कर स्थित ब्रह्मा सावित्री वेद विद्यालय के परिसर में स्थित शिव मंदिर में राजस्थान पर्यटन विकास निगम (आरटीडीसी) के अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ की ओर से महामृत्युंजय यज्ञ और रुद्राभिषेक कराया गया। इस धार्मिक अनुष्ठान में राठौड़ अपने परिवार के साथ उपस्थित रहे। राठौड़ के इस धार्मिक अनुष्ठान को लेकर राजनीतिक क्षेत्र में अनेक सवाल उठ रहे हैं। सब जानते हैं कि राठौड़ प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के भरोसेमंद नेता है। गत वर्ष 25 सितंबर को भी जब गहलोत का मुख्यमंत्री पद खतरे में पड़ा तब धर्मेन्द्र राठौड़ ने ही कांग्रेस विधायकों को एकत्रित कर बगावत करवाई। राठौड़ अभी तक भी अनुशासनहीनता के नोटिस की मार झेल रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से सीएम गहलोत की तबीयत नासाज चल रही है। तबीयत खराब होने का जिक्र स्वयं गहलोत ने  हाल ही में विधानसभा में भी किया है। तबीयत खराब होने के कारण ही पिछले कई दिनों से गहलोत सार्वजनिक समारोह में भाग नहीं ले पा रहे हैं, यहां तक कि गत 29 जनवरी को श्रीनगर में आयोजित भारत जोड़ों यात्रा के समापन समारोह में भी गहलोत ने भाग नहीं लिया। गहलोत के समर्थक भी उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। माना जा रहा है कि 8 फरवरी को सीएम गहलोत के स्वास्थ्य को लेकर ही  महामृत्युंजय  व रुद्राभिषेक करवाया है। हालांकि इस संबंध में राठौड़ ने तो कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, लेकिन जिस श्रद्धा और आस्था के साथ उन्होंने महामृत्युंजय यज्ञ में भाग लिया उससे प्रतीत हो रहा था कि इन दिनों में वे काफी चिंतित हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार धर्मेन्द्र राठौड़ की चिंता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा जारी अनुशासनहीनता के नोटिस की भी है। सूत्रों के अनुसार यदि अनुशासनहीनता के मामले में कार्यवाही होती है तो राठौड़ का आरटीडीसी के अध्यक्ष का पद छीन सकता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राठौड़ विधानसभा का अगला चुनाव पुष्कर से लड़ना चाहते हैं। इसके लिए राठौड़ लगातार पुष्कर क्षेत्र में सक्रिय हैं। पुष्कर के विकास के दावे भी किए जा रहे हैं। 

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Tuesday, 7 February 2023

जो मुस्लिम देश तुर्की कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ है, उसी तुर्की को मुसीबत के समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मदद भेजी।यह है भारत के सनातन धर्म की सोच।

मुस्लिम देश तुर्की और सीरिया में जो भूकंप आया है, उसमें अब तक पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। मृतकों की संख्या हर घंटे बढ़ रही है, क्योंकि जैसे जैसे मलबा हटाया जा रहा है, वैसे वैसे शव निकल रहे हैं। तुर्की में तो यह भी नहीं पता कि मकानों के मलबे में कितने लोग दबे हुए हैं। इस भयावह स्थिति को देखते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीआरएफ की दो टीमें तुर्की भेजी है। एक टीम में 100 सदस्य हैं। यानी 200 प्रशिक्षित व्यक्ति तुर्की पहुंचे हैं। दोनों टीमों के साथ डॉक्टर, चिकित्साकर्मी और जीवन रक्षक दवाइयां भी भेजी हैं। भारत का प्रयास है कि तुर्की में कम से कम मानवीय क्षति हो। तुर्की वही मुस्लिम देश है जो हमारे कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा है। वर्ष 2019 में जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त किया गया था, तब पाकिस्तान ने मुस्लिम देशों को एकजुट करने की मुहिम चलाई थी, तब मुस्लिम देशों में तुर्की अकेला देश था, जिसने अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया। आज भी तुर्की, पाकिस्तान के साथ है और भुखमरी के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान अभी भी कश्मीर राग अलाप रहा है। लेकिन यह भारत के सनातन धर्म की ही सोच है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुसीबत में फंसे तुर्की की मदद कर रहे हैं। अभी यह नहीं देखा जा रहा है कि तुर्की की सोच क्या रही है? कह सकते हैं कि अभी हम दुश्मन की भी मदद कर रहे हैं। जो तुर्की अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि खराब कर रहा है, उसी तुर्की को सबसे पहले भारत ने ही मदद भेजी है। 5 फरवरी की रात को भूकंप आया और 6 फरवरी को मदद की घोषणा कर राहत सामग्री भेज दी। इतनी जल्दी तो किसी मुस्लिम देश ने भी नहीं दिखाई। जहां तक तुर्की के मित्र देश पाकिस्तान का सवाल है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ खुद कटोरा लेकर दुनिया भर में भीख मांग रहे हैं। आज नहीं तो कल भारत की ओर से पाकिस्तान को भी मदद भेजी जाएगी। यह सनातन धर्म की सोच ही है कि मुसीबत के समय दुश्मन की भी मदद की जाए। अन्यथा ऐसे धर्म भी हैं जो मुसीबत में दुश्मन का वजूद ही खत्म कर देते हैं। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच सनातन धर्म वाली नहीं होती तो आज तुर्की को मदद नहीं भेजी जाती। कोई माने या नहीं, लेकिन सनातन धर्म ही सभी धर्मों का सम्मान करने वाला धर्म है। सनातन धर्म में पहले इंसानियत देखी जाती है। आज तुर्की को धर्म नहीं इंसानियत की जरूरत है। इसलिए दुश्मनी को पीछे छोड़ते हुए भारत की ओर से मदद भेजी गई। तुर्की को दी जाने वाली भारत की इस मदद से पाकिस्तान को भी सबक लेना चाहिए। अच्छा हो कि पाकिस्तान के राजनेता हमारे कश्मीर की चिंता करने के बजाए खुद के देश की समस्याओं का समाधान करें। 
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उर्स में हुए विवाद को लेकर अब बरेलवी मकतब के विद्वान मोहम्मद अशरफ आसिफ जलाली खतरनाक वीडियो सामने आया।अंजुमन सचिव सरवर चिश्ती और उनके समर्थकों को धमकी। आखिर ख्वाजा साहब की दरगाह को विवादों से कौन बचाएगा?राजस्थान सरकार और अजमेर प्रशासन तमाशबीन न रहे।

अजमेर में ख्वाजा साहब के सालाना उर्स में मुस्लिम माह रजब की पांच तारीख और अंग्रेजी कैलेंडर की 27 जनवरी को जो धार्मिक विवाद हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब बरेलवी मकतब (विचारधारा) के विद्वान डॉ. मोहम्मद अशरफ आसिफ जलाली का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जो विवाद को और बढ़ावा देगा। यह वीडियो एक धार्मिक जलसे का है। इस जलसे में डॉ. जलाली ने ख्वाजा साहब के उर्स पर हुए विवाद का उल्लेख करते हुए दरगाह के खादिमों की प्रतिनिधि संस्था अंजुमन सैयद जादगान के सचिव सरवर चिश्ती और उनके समर्थकों पर सख्त टिप्पणी की है। डॉ. जलाली ने धार्मिक जलसे में ऐलान किया कि ख्वाजा साहब की दरगाह को जल्द ही राक्षस प्रवृत्ति के लोगों से मुक्त करवा लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि 27 जनवरी को उर्स में जायरीन इबात के दौरान कलाम पेश कर रहे थे, तभी उन पर जुल्म किया गया। ऐसे कृत्य को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमने ख्वाजा साहब का भी सम्मान किया है। जब हम ख्वाजा साहब का सम्मान करते हैं, तब दरगाह में सरकार की शान में कलाम पेश करने से रोकना सही नहीं है। दरगाह पर कुछ ऐसे लोगों ने कब्जा कर रखा है जो आला हजरत का भी ख्याल नहीं रखते। ऐसे लोगों को सबक सिखाने की जरूरत है। वहीं डॉ. जलाली के बयान को अंजुमन सचिव सरवर चिश्ती ने दरगाह की परंपराओं के विपरीत माना है। चिश्ती ने भी डॉ. जलाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि दरगाह की कदीमी रिवायतों को हर कीमत पर बनाए रखा जाएगा। खादिम समुदाय हर चुनौती का सामना करने को तैयार है। ख्वाजा साहब की दरगाह की पहचान कौमी एकता की है। इस पहचान को बनाए रखा जाएगा। चिश्ती ने डॉ. जलाली का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पुलिस को भी उपलब्ध करवा दिया है। इससे पहले दरगाह कमेटी के सदस्य बाबर अशरफ के वीडियो पर भी सरवर चिश्ती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। बाबर ने भी अपने वीडियो में 27 जनवरी के विवाद के लिए सरवर चिश्ती को जिम्मेदार ठहराया था और अब बरेलवी मकतब के मुस्लिम विद्वान डॉ. मोहम्मद अशरफ आसीफ जलाली ने भी अपना गुस्सा सरवर चिश्ती पर उतारा है। सरवर चिश्ती ने दोनों ही वीडियो पर उचित कार्यवाही का आग्रह किया है। हालांकि यह विवाद मुस्लिम विचारधाराओं के बीच का है, लेकिन यदि डॉ. जलाली अपने ऐलान के अनुरूप दरगाह में कोई कार्यवाही करते हैं तो माहौल बिगड़ सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि दरगाह की पहचान कौमी एकता के तौर पर भी है। यहां हिन्दू समुदाय के लोग भी जियारत के लिए आते हैं। सामान्य दिनों में तो मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू जायरीन आते हैं। ऐसे में दरगाह से जुड़ी सभी संस्थाओं और ख्वाजा साहब के प्रति अकीदत रखने वाला का यह दायित्व है कि दरगाह की कौमी एकता की पहचान बनी रहे। मौजूदा समय में जो गतिविधियां हो रही है उससे माहौल बिगडऩे की आशंका हो गई है। ऐसे में माहौल में राजस्थान सरकार और अजमेर प्रशासन को तमाशबीन बने नहीं रहना चाहिए। संभवत: यह पहला अवसर होगा, जब किसी मुस्लिम धार्मिक जलसे में खादिमों की संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारी पर इतनी कठोर टिप्पणी की गई है। डॉ. जलाली एक मुस्लिम विद्वान और इस्लाम के जानकार है। उनकी धार्मिक सभाओं में हजारों मुसलमान उपस्थित रहते हैं तथा देश विदेश में उनके लाखों अनुयायी हैं। जिस सभा में खादिमों के पदाधिकारी कठोर टिप्पणियां की गई उस सभा में लोगों से हाथ उठवाकर संकल्प भी करवाया गया। डॉ. जलाली की सभा का पूरा माहौल धार्मिक उत्साह वाला रहा। प्रशासन की भी यह जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो को गंभीरता से ले। 

S.P.MITTAL BLOGGER (07-02-2023)
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