Sunday, 2 August 2026

 

शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का 6 वर्ष पुराना मामला उठाकर पूर्व सीएम गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डोटासरा को 30 जुलाई वाले बयान का जवाब दिया।

यह डोटासरा के जले पर नमक छिड़कना जैसा है।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर लोकप्रियता का प्रदर्शन। स्वयं गहलोत ने डाला वीडियो।
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2 अगस्त को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने अपने गृह क्षेत्र जोधपुर के दौरे पर रहे। गहलोत ने अपनी आदत के मुताबिक जमकर बयानबाजी की। गहलोत ने राजनीतिक चतुराई से गत 30 जुलाई को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बयान का भी जवाब दिया। मालूम हो कि 30 जुलाई को पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय आने से पहले जयपुर में गहलोत के सरकारी आवास पर चले गए थे तो डोटासरा ने नाराजगी जताई थी। डोटासरा की यह नाराजगी गहलोत के नागवार लगी। यही वजह रही कि गहलोत ने डोटासरा से जुड़े 6 वर्ष पुराने शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का मामला उठा दिया। गहलाते जब भी मीडिया से संवाद करते हैं तब मीडिया कर्मियों के रूप में अपने समर्थकों को भी सवाल पूछने का मौका देते हैं। चूंकि गहलोत को डोटासरा के 30 जुलाई वाले बयान का जवाब देना था, इसलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का सवाल उठाया गया। गहलोत चाहते तो अपना जवाब भाजपा के शासन तक सीमित रख सकते थे, लेकिन गहलोत ने 6 वर्ष पुराना जयपुर स्थित बिड़ला ऑडिटोरियम में आयोजित शिक्षक दिवस के समारोह की घटना का भी उल्लेख कर दिया। गहलोत का कहना रहा कि तब मैं मुख्यमंत्री था और मैंने सामान्य शिष्टाचार के नाते समारोह में उपस्थित शिक्षकों से पूछ लिया कि क्या तबादलों में रिश्वत देनी पड़ती है? तो अधिकांश शिक्षकों ने हां में जवाब दिया। उस समय मेरे साथ शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा भी उपस्थित थे, लेकिन बाद में किसी भी शिक्षक ने मुझे रिश्वत का कोई सबूत नहीं दिया। गहलोत ने कहा कि हर शासन में शिक्षकों के तबादले में रिश्वत के आरोप लगते है। गहलोत ने यह बात कहकर डोटासरा के जले पर नमक छिड़कने वाला काम किया है। भाजपा के नेता आज तक इस मुद्दे को लेकर डोटासरा को कटघरे में खड़ा करते हैं और अब गहलोत ने भी यह बता दिया कि 6 वर्ष पहले मेरी सरकार के शिक्षा मंत्री डोटासरा पर भी तबादलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। चूंकि गहलोत चतुर राजनीतिज्ञ है, इसलिए स्वयं की जुबान से डोटासरा को रिश्वतखोर नहीं कहा। लेकिन बड़ी चतुराई से यह दर्शा दिया कि शिक्षकों ने डोटासरा पर भी रिश्वत लेने के आरोप लगाए। मालूम हो कि वर्ष 2018 में जब गहलोत मुख्यमंत्री बने तब डोटासरा को स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया था, लेकिन 2020 में सचिन पायलट की बगावत के बाद डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। तब उन्हें शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। देखना होगा कि गहलोत ने 6 वर्ष पुराना मामला उठाकर डोटासरा पर जो हमला किया है, उसका जवाब आने वाले दिनों में डोटासरा किस प्रकार से देते हैं।
 
लोकप्रियता का प्रदर्शन
2 अगस्त को पूर्व सीएम गहलोत ने जयपुर से जोधपुर का सफर ट्रेन से किया। इस सफर के पीछे गहलोत को स्वयं की लोकप्रियता दिखाना था। गहलोत जब जयपुर के प्लेटफार्म पर पहुंचे तो उनके कैमरा मैन पहले से ही तैयार थे। गहलोत ने प्लेटफार्म पर खड़े यात्रियों से उनके हाल चाल पूछे। कई यात्रियों ने गहलोत को पहचाना उनसे आत्मीय मुलाकात भी की। गहलोत ने एक कुली से भी उसके हाल जाने। प्लेटफार्म के बा जब गहलोत ट्रेन के कोच में पहुंचे तो यहां भी एक एक यात्री से हाथ मिलाया। कोई डेढ़ दो मिनट के इस वीडियो को फिल्मी गाने के साथ गहलोत ने स्वयं सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। इस वीडियो के माध्यम से यह जताने का प्रयास किया गया है कि वे आज भी प्रदेश भर में लोकप्रिय हैं। 

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 पाकिस्तान की सीमा से सटे खाजूवाला से 50 करोड़ की हेरोइन और 11 विदेशी पिस्टल जब्त।  ड्रोन का इस्तेमाल।

इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में 50 किलोमीटर की परिधि में अतिक्रमणों को हटाया जा रहा है।

लेकिन कांग्रेस इसमें भी राजनीति कर रही है।
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राजस्थान के सीमावर्ती बीकानेर रेंज में आईजी ओम प्रकाश और एसपी मृदुल कच्छावा के निर्देशन में नार्को आर्म्स, सिडीकेट के खिलाफ जो अभियान चलाया जा रहा है, उसी का परिणाम रहा कि 2 अगस्त को खाजूवाला क्षेत्र से पचास करोड़ रुपए की कीमत वाली 10 किलो अफगानी हेरोइन और 11 विदेशी पिस्टल जब्त की गई। आईजी ओम प्रकाश का मानना है कि यह नशा और हथियार पाकिस्तान से आए हैं ड्रोन ने गिराया है। चूंकि पुलिस लगातार निगरानी कर रही थी, इसलिए हेरोइन और हथियार के बारे में जानकारी मिल गई। उन्होंने बताया कि इस सामग्री के साथ डिलीवरी मैन पाली के जैतारण निवासी वीरेंद्र सिंह राजपुरोहित को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। राजपुरोहित ने बताया कि यह सामग्री पंजाब जेल में बंद लक्खी नाम के व्यक्ति ने पाकिस्तान से मंगवाई थी। रेंज आईजी ओम प्रकाश का मानना है कि नशा और विदेशी हथियार पूरे देश में सप्लाई किए जाने थे। पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राजस्थान में पाकिस्तान सीमा पर लगे श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर,बाड़मेर, हनुमानगढ़ और जोधपुर क्षेत्र की समीक्षा की थी। केंद्रीय एजेंसियों ने बताया कि अब पाकिस्तान राजस्थान वाली सीमा से ड्रोन तकनीक से हथियार और नशीले पदार्थ भिजवा रहा है। केंद्रीय मंत्री शाह के निर्देशों के बाद राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी को और प्रभावी बनाया गया। बीएसएफ और राजस्थान पुलिस के बीच तालमेल को और बेहतर किया जा रहा है। बाड़मेर, जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में दोनों समुदायों के धार्मिक स्थलों को भी हटाया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नशीले पदार्थ और विदेशी हथियारों को छुपाने के लिए धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल हो सकता है। कई बार ऐसे अतिक्रमण प्रभावी निगरानी में बाधक   होते हैं। राजस्थान में सटी सीमा से पाकिस्तान नशीले पदार्थों और हथियारों को न भेज सके, इसलिए सीमा से पचास किलोमी की परिधि में आने वाले निर्माणों को भी हटाया जा हा है। सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए कानून बना है, उसमें सीमा से पचास किलोमीटर की परिधि में संदिग्ध निर्माण नहीं होने चाहिए। इसी कानून के तहत सुरक्षा एजेंसियों को 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी स्थानों की जांच करने का अधिकार भी है। बीकानेर के खाजूवाला में जब्त हेरोइन और विदेशी हथियार की घटना बताती है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। लेकिन कांग्रेस सीमा के इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति कर रही है। संबंधित जिला प्रशासनों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जो अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया है उसका कांग्रेस की ओर से विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि मुसलमानों को निशाना बनाकर कार्यवाही की जा री है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर पुरानी मस्जिदों को भी गिराया जा रहा है। वही प्रशासन का कहना है कि अतिक्रमण हटाओ अभियान में मंदिर भी शामिल है। इसलिए भेदभाव का आरोप पूरी तरह गलत है। मौजूदा हालातों में सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभावी निगरानी की सख्त जरूरत है। उल्लेखनीय है कि पहले जम्मू कश्मीर की सीमा से नशीले पदार्थ और हथियार भेजे जाते थे, लेकिन अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद पाकिस्तान के लिए कश्मीर की सीमा से नशा और हथियार भेजना मुश्किल हो गया है, इसलिए पाकिस्तान अब राजस्थान की सीमा का इस्तेमाल करने लगा है।


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Friday, 31 July 2026

 आरपीएससी के सचिव रामनिवास मेहता की सेवानिवृत्ति पर अनूठा प्रदर्शन।

लेकिन नौकरशाही की जीत को रस्सियों से खींचना कितना उचित।

यह कृत्य आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है।
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31 जुलाई को आईएएस रामनिवास मेहता राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्ति हुए। दावा किया गया कि आयोग के इतिहास में यह पहला अवसर है जब कोई सचिव सेवानिवृत्त हुआ है। यानी अभी कोई भी आईएएस आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्त नहीं हुआ। जो भी सचिव आए वे सेवानिवृत्ति से पहले ही तबादला करवाकर चले गए। मेहता ने सेवानिवृत्ति तक सचिव के पद पर काम किया। यह भी सही है कि सचिव के पद पर रहते हुए मेहता ने मन लगाकर काम किया। आयोग जब पेपर लीक के बुरे दौर से गुजर रहा था, तब मेहता ने अभ्यर्थी से सीधा संवाद कर भरोसा कायम करने का प्रयास किया। मेहता अपने कक्ष से उठकर आयोग के बाहर आ गए और अभ्यर्थियों की समस्याओं का समाधान किया। इसलिए अब जब 31 जुलाई को मेहता की सेवानिवृत्ति हुई तो आयोग के सदस्यों अधिकारियों और कर्मियों ने खुली जीप मंगवाई और मेहता को जीप पर खड़ा किया तथा सभी ने मिलकर रस्सियों से जीप को खींचा। रस्सियों से जीप को खींचने वालों में आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष कर्नल केसरी सिंह राठौड़, सदस्य हेमंत प्रियदर्शी, डॉ. सुशील बिस्सू भी शामिल रहे। लेकिन सवाल उठता है कि क्या किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर खुली जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचा जाना चाहिए? आयोग के अधिकारी और कार्मिक कुछ भी तर्क दे, लेकिन यह आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है। आयोग के सदस्य के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्यपाल द्वारा एक बार नियुक्ति आदेश करने के बाद सुप्रीम कोर्ट भी सदस्य को हटा नहीं सकता। इतनी मजबूत स्थिति वाले सदस्य यदि किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचे तो इसे किसी भी दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता। रामनिवास मेहता की सेवाएं अपनी जगह है। मेहता की सेवाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इस तरह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई उचित नहीं है। 31 जुलाई को आयोग के सदस्य डॉ. अशोक कुमार कलवार का कार्यकाल भी पूरा हो हुआ। इसलिए खुली जीप में मेहता के साथ डॉ. कलवार को भी खड़ा कर दिया गया। आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा प्रदर्शन हुआ, जब कार्यकाल पूरा होने के बाद किसी सदस्य को नौकरशाह के साथ खड़ा किया गया। आयोग के प्रशासनिक ढांचे में सदस्य और सचिव के बीच काफी अंतर है। सचिव आयोग के सदस्यों के निर्देश पर काम करता है। केसरी सिंह राठौड़ तो सेना में कर्नल के पद पर रह चुके हैं। क्या किसी सेन्य अधिकारी रहे व्यक्ति को किसी नौकरशाह की जीप को खींचना चाहिए? 


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अमित शाह से मुलाकात के बाद उत्साहित है, केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी।

सब्सिडी विवाद के बाद पहली मुलाकात।
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अजमेर के भाजपा सांसद और केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी ने 31 जुलाई को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। मुलाकात के बाद चौधरी ने कहा कि उन्हें अमित शाह का मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है जो उत्साहित करने वाला है। अमित शाह से मुलाकात के बाद चौधरी जिस तरह उत्साहित नजर आए उससे प्रतीत होता है कि एक करोड़ की सब्सिडी लेने और वापस लौटने का मामला खत्म हो गया है। विगत दिनों जब कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से एक करोड़ रुपए की सब्सिडी लेने का मामला मीडिया में वायरल हुआ तो भागीरथ चौधरी के केंद्रीय मंत्री पद को लेकर अटकलें लगने लगी थी। कहा गया कि चौधरी को मंत्री पद से हटाया जा सकता है। विवाद के बाद चौधरी ने एक करोड़ की सब्सिडी की राशि संबंधित बैंक में जमा करवा दी और बैंक से आग्रह किया कि इस राशि को वापस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के खाते में जमा करवा दिया जाए। चौधरी के निर्देश पर सब्सिडी की राशि बोर्ड के पास पहुंच भी गई। चूंकि सब्सिडी विवाद के बाद भागीरथ चौधरी की अमित शाह से पहली मुलाकात थी, इसलिए राजनीतिक क्षेत्रों में इस मुलाकात का महत्व है। चौधरी अब संतुष्ट है कि यह विवाद खत्म हो गया है। उल्लेखनीय है कि चौधरी ने कुचामन जिले के पीह गांव स्थित अपने कृषि फार्म हाउस पर व्यावसायिक खेती के लिए एक करोड़ की सब्सिडी प्राप्त की थी। मीडिया में चौधरी के सब्सिडी लेने की आलोचना हुई थी। 

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 जानकारी के अभाव में डोटासरा ने बयान दिया-अशोक गहलोत, पूर्व सीएम।

लेकिन चौथी बार गहलोत सरकार के नारों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

ऐरे-गैरे नत्थू गेरे कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं-संदीप चौधरी, प्रदेश उपाध्यक्ष व गहलोत समर्थक।
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30 जुलाई को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने महेंद्रजीत सिंह मालवीय और उनके साथ आए समर्थकों को लेकर जो नाराजगी प्रकट की उसके संदर्भ में 31 जुलाई को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सफाई दी। मालूम हो कि बांसवाड़ा डूंगरपुर से आए 300 कार्यकर्ताओं को मालवीय पहले गहलोत के सरकारी आवास पर ले गए। यहां गहलोत की उपस्थिति में समर्थकों ने चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। इसके बाद मालवीय के नेतृत्व में सभी समर्थकों ने जयपुर में कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय में डोटासरा से मुलाकात की। तभी डोटासरा ने नाराजगी जताते हुए कहा, मालवीय तो किसी नेता की ब्रांडिंग करने के लिए जयपुर आए हैं। डोटासरा की इस नाराजगी पर गहलोत ने कहा, ऐसा बयान जानकारी के अभाव में दिया गया। असल में जयपुर में कार्यकर्ताओं की जॉइनिंग का कोई कार्यक्रम नहीं था। मालवीय के नेतृत्व में कार्यकर्ता तो सिर्फ मिलने के लिए जयपुर आए थे। मैंने तो कार्यकर्ताओं से आग्रह किया था कि वे बांसवाड़ा डूंगरपुर से जयपुर नहीं आए। थोड़े दिनों में मैं स्वयं ही बांसवाड़ा आ जाऊंगा। लेकिन जब कार्यकर्ता आ ही गए तो मैं मिलने के बाद सभी कार्यकर्ता शिष्टाचार के नाते अध्यक्ष डोटासरा से भी मिलने के लिए चले गए। गहलोत ने कहा कि डोटासरा ने कोई नाराजगी नहीं जताई। मीडिया वाले बेवजह इस मामले को तूल दे रहे हैं। मेरे और डोटासरा के बीच कोई विवाद नहीं है।

 
नारों पर टिप्पणी नहीं:
असल में डोटासरा की सबसे ज्यादा नाराजगी गहलोत के निवास पर चौथी बार गहलोत सरकार के नारों को लेकर थी, लेकिन गहलोत ने इसे नारे को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। गहलोत की सफाई से प्रतीत होता है कि मालवीय के समर्थक तो सिर्फ अशोक गहलोत से मिलने के लिए ही जयपुर आए थे। मालवीय को तो सिर्फ गहलोत की ही ब्रांडिंग करनी थी। बाद में डोटासरा से मिलने का कार्यक्रम भी जोड़ा गया। इसलिए गहलोत ने कहा कि डोटासरा के पास जानकारी का अभाव रहा। असल में कांग्रेस की राजनीति में सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा चौथी बार गहलोत सरकार का नारा ही है। लेकिन अशोक गहलोत इस नारे पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे है। इससे जाहिर है कि गहलोत चौथी बार राजस्थान का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।
 
संदीप चौधरी की टिप्पणी से विवाद और बढ़ा:
गहलोत भले ही डोटासरा के साथ कोई विवाद होने से इंकार करे,लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष संदीप चौधरी के ताजा बयान से विवाद और गहरा गया है। कांग्रेस की राजनीति में गहलोत का समर्थक माने जाने वाले संदीप चौधरी ने 31 जुलाई को किसी नेता का नाम लिए बगैर कहा कि ऐरे गैरे नत्थू गेरे जब कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं। माना जा रहा है कि संदीप चौधरी की यह टिप्पणी डोटासरा को लेकर है। मालूम हो कि वर्ष 2020 में जब सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस के 18 विधायक दिल्ली चले गए थे, तब मुख्यमंत्री रहते हुए अशोक गहलोत ने पायलट के स्थान पर डोटासरा को ही प्रदेशाध्यक्ष बनवाया था। तब गहलोत के समर्थन के कारण अनेक वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए डोटासरा अध्यक्ष बने। चूंकि उस समय गहलोत को गांधी परिवार का पूरा संरक्षण था, इसलिए वे जूनियन होते हुए भी डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में सफल रहे, भले ही गहलोत ने डोटासरा को अध्यक्ष बनवाया हो, लेकिन गहलोत को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब डोटासरा भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं और उन्हें यह पसंद नहीं कि कांग्रेस का कार्यकर्ता चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। 

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