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Thursday, 9 July 2026
कांग्रेस की तरह भाजपा के शासन में भी शिक्षकों के तबादले हो रहे हैं।
यदि नेताओं की सिफारिशों से ही तबादले होने हैं तो फिर शिक्षकों को भी राजनीति में आने की छूट दी जाए-विजय सोनी शिक्षक नेता।
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राजस्थान में स्कूली शिक्षा के शिक्षकों के तबादले बड़ी संख्या में हुए है। ये तबादले किसी नीति के बगैर हुए है। तबादलों में भाजपा के नेताओं की सिफारिशों को प्राथमिकता दी गई है। यहां तक कि भाजपा के जयपुर स्थित मुख्यालय में शिक्षकों ने अपने तबादले का प्रार्थना पत्र जमा करवाया है। सरकार में बैठे मंत्रियों ने भी माना है कि हजारों शिक्षक डिजायर के लिए उनके पास आ रहे हैं। यानी शिक्षकों के तबादले जिस प्रकार कांग्रेस के शासन में होते थे, उसी प्रकार भाजपा के शासन में भी हो रहे हैं। कांग्रेस के शासन में भाजपा के नेता तबादले में राजनीतिक द्वेषता के आरोप लगाते थे। वही अब कांग्रेस के नेता राजनीतिक द्वेषता से तबादला करने के आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का तो कहना है कि संघ और भाजपा की विचारधारा वाले शिक्षकों को उनकी इच्छानुसार पोस्टिंग दी गई है। जबकि कांग्रेस विचारधारा वाले शिक्षकों का तबादला दूर कर दिया गया है। डोटासरा ने अपने निर्वाचन क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ (सीकर) के तबादलों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए हैं।
राजनीति में आने की छूट मिले:
राजस्थान शिक्षक संघ (राधाकृष्ण) के प्रदेश अध्यक्ष विजय सोनी ने कहा कि यदि नेताओं की सिफारिश से ही तबादले हो रहे हैं तो फिर शिक्षकों को भी राजनीति करने की छूट दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक ओर सेवा नियमों में उल्लेख है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेगा, लेकिन अब जब नेताओं की सिफारिशों से ही तबादले हो रहे हैं तो फिर शिक्षकों को भी राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की छूट मिलनी चाहिए। वैसे भी शिक्षक सभी प्रकार के कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार यूनिवर्सिटी के शिक्षकों को राजनीति में भाग लेने की छूट है, उसी प्रकार स्कूली शिक्षकों को भी छूट मिलनी चाहिए। विजय ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार ने भी बगैर कोई नीति बनाए शिक्षकों के तबादले किए और अब भाजपा के शासन में भी बगैर नीति के ही तबादले हो रहे है। एक ओर कहा जा रहा है कि तृतीय श्रेणी के शिक्षकों के तबादले पर रोक है, लेकिन वही इस श्रेणी के कंप्यूटर अनुदेशकों के तबादले धड़ल्ले से किए जा रहे है। तृतीय श्रेणी शिक्षकों के तबादला न करने के पीछे तर्क दिया जाता है कि इन शिक्षकों की वरिष्ठता जिला स्तर पर निर्धारित होती है। यदि एक जिले से दूर जिले में तबादला किया गया तो वरिष्ठता प्रभावित होगी, लेकिन इसके उलट वरिष्ठ अध्यापकों के तबादले किए गए है। जबकि वरिष्ठ अध्यापकों की वरिष्ठता संभाग स्तर पर निर्धारित होती है। वरिष्ठ अध्यापकों के तबादले एक संभाग से दूसरे संभाग में किए गए है। सोनी ने कहा कि चूंकि तबादला नीति नहीं है, इसलिए तबादलों में अनेक विसंगतियां हो रही है। विजय सोनी ने प्रदेश भर में शिक्षकों को राजनीति करने को लेकर अभियान चला रखा है। इस संबंध में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भी पत्र दिया गया है। मोबाइल नंबर 9829087912 पर इस अभियान की जानकारी विजय सोनी से ली जा सकती है।
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मोदी के नेतृत्व वाला एनडीए अब राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत से मात्र 13 सीट दूर, लेकिन साधारण बहुमत से 28 सीटें ज्यादा।
राज्यसभा से इस्तीफा देने वाले टीएमसी के तीनों सांसद अब पश्चिम बंगाल से भाजपा के उम्मीदवार।
ममता बनर्जी का सफाया।
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पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक ने इस्तीफा दे दिया था। लेकिन अब इन तीनों को भाजपा ने पश्चिम बंगाल से ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। बंगाल में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए 24 जुलाई को उप-चुनाव होना है। चूंकि विधानसभा में भाजपा के 208 विधायक है, इसलिए इन तीनों उम्मीदवारों की जीत तय है। यानी टीएमसी के इन नेताओं ने भाजपा के प्रति जो वफादारी दिखाई थी, उसका पुरस्कार अब इन तीनों को मिल गया है। राज्यसभा में मौजूदा समय में भाजपा के 113 सांसद हैं। इन तीनों की जीत के बाद संख्या 16 हो जाएगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए के राज्यसभा में सांसदों की संख्या 148 से बढ़कर 151 हो जाएगी। साधारण बहुमत के लिए 123 सदस्यों की जरूरत होती है यानी अब एनडीए के पास साधारण बहुमत से 28 सीटें ज्यादा है। राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 1645 सांसद चाहिए, जबकि एनडीए के पास 24 जुलाई के बाद 151 सांसद हो जाएंगे। यानी अब राज्यसभा में एनडीए दो तिहाई बहुमत से मात्र 13 सीट दूर है। कहा जा रहा है कि कई क्षेत्रीय दलों के सांसद एनडीए को समर्थन देने को तैयार है। जिस तरह एनडीए राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रहा है,उससे भाजपा बेहद उत्साहित है। लोकसभा में भी एनडीए दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रहे है। हाल ही में टीएमसी और आम आदमी पार्टी के सांसदों ने जिस तरह दल बदल किया है, उससे एनडीए की स्थिति और मजबूत हुई है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के लोकसभा के 27 सांसदों में से 20 ने अलग दल बना लिया है। अब ये सांसद लोकसभा में एनडीए को ही समर्थन दे रहे है। ममता बनर्जी को लोकसभा और राज्यसभा में ही झटका नहीं लगा है बल्कि विधानसभा में भी झटका लगा है। हाल ही में चुनाव में ममता बनर्जी के 80 विधायक बने, लेकिन इसमें से 60 विधायकों ने अलग दल बना लिया। यानी अब ममता बनर्जी के पास 20 विधायक रह गए है। देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का पूरा सफाया हो गया है। जो ममता बनर्जी मुख्यमंत्री रहते हुए देश की संवैधानिक संस्थाओं का मजाक उड़ा रही थी, वही ममता बनर्जी अब बेहद कमजोर हो गई है। एक तरह से ममता बनर्जी को टीएमसी का पश्चिम बंगाल में कोई वजूद ही नहीं रहा है।
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अजमेर की सबसे बड़ी समस्या सीवरेज और आनासागर के पानी की है।
अजमेर में 2050 के विजन को लेकर स्वामी न्यूज की सकारात्मक पहल।
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अजमेर के लोकप्रिय स्वामी न्यूज़ चैनल पर इन दिनों अजमेर 2050 के विजन को लेकर सकारात्मक पहल हो रही है। इसके अंतर्गत स्वामी न्यूज समूह के निदेशक कंवल प्रकाश किशनानी और जाने माने वरिष्ठ पत्रकार गिरधर तेजवानी अजमेर के प्रमुख व्यक्तियों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों से सवाल जवाब कर रहे हैं। इसी क्रम में पत्रकारों के भी इंटरव्यू लिए जा रहे हैं। किशनानी और तेजवानी ने 7 जुलाई को मुझसे भी संवाद किया। चूंकि तेजवानी पत्रकारिता के क्षेत्र में मुझसे वरिष्ठ है, इसलिए उन्होंने मेरी पत्रकारिता के संबंध में भी सवाल पूछे। मैंने बताया कि मैंने पत्रकारिता तब शुरू की जब शब्द के लिए शीशे का उपयोग किया जाता था। तब शीशे के शब्दों को जमा कर अखबार का पेज तैयार होता था और फिर मशीन पर अखबार छपता था। फोटो के लिए ब्लॉक बनवाना पड़ता था, लेकिन अब जिस तकनीक के साथ अखबार छप रहे है, वह एक चमत्कारही है। प्रिंट मीडिया के साथ जब इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया भी आ गया है। मैंने बताया कि मेरे पिता कृष्ण गोपाल जी गुप्ता (अब स्वर्गीय) ने किन विपरीत परिस्थितियों में भभक पाक्षिक का प्रकाश किया। आज भी मुझे उन संघर्षों का स्मरण है। अजमेर की समस्या पर पूछे गए सवाल के जवाब में मेरा कहना रहा कि आज सबसे बड़ी समस्या सीवरेज और आनासागर के पानी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट में भले ही अजमेर शहर को 2 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हो, लेकिन सीवरेज की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। इंजीनियरों ने मुख्य सड़कों के बीच में सीवरेज की लाइन डाल दी। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि अजमेर की मुख्य सड़कों के बीच में सीवरेज के मैनहोल है। जब कभी पाइपों में पानी जाम हो जाता है तो सीवरेज का गंदा पानी उफन कर सड़कों में आ जाता है। बरसात के दिनों में तो सीवरेज का पानी सड़कों पर आना आम बात हे। जिस शहर की सड़कों पर सीवरेज का गंदा पानी बहता हो उस शहर की स्मार्टनेस का अंदाजा लगाया जा सकता है। सड़कों पर सीवरेज के मैनहोल होने से आए दिन दुर्घटनाएं भी होती है। सीवरेज के साथ साथ अजमेर की प्रमुख समस्या आनासागर की भी है। एक समय था, जब यह झील प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगाती थी, लेकिन आज यह झील मल मूत्र के कुंड में तब्दील हो गई है। आनासागर झील के चारों तरफ बसी कॉलोनियों से जुड़े 13 नालों का गंदा पानी इसी झील में गिरता है। नालों के गंदे पानी को रोकने के लिए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में कोई ठोस उपाय नहीं किए गए। हालांकि आनासागर में ट्रीटमेंट प्लांट बनाया गया, लेकिन आमतौर पर यह प्लांट बंद रहता है। जिसकी वजह से पानी को शुरू किए बिना ही आनासागर में डाला जाता ाहै। चूंकि वर्ष भर गंदा पानी आनासागर में आता है, इसलिए थोड़ी सी ही बरसात में आनासागर ओवरफ्लो हो जाता है। ओवरफ्लो पानी से निलची बस्तियों के लोगों को कोई परेशानी न हो इसके लिए बरसात से पहले ही पानी की निकासी कर दी जाती है। अभी भी जलस्तर 10 फीट रखा हुआ है, जबकि भराव क्षमता 13 फीट की है।
सकारात्मक प्रयास:
विजन 2050 की शुरुआत कर स्वामी न्यूज चैनल ने सकारात्मक पहल की है। उम्मीद है कि इस पहल में जो सुझाव सामने आएंगे, उन्हें सरकार और प्रशासन गंभीरता से लेगा। समूह के निदेशक किशनानी ने बताया कि प्राप्त सुझावों को सरकार में उच्च स्तर तक भेजा जाएगा ताकि अजमेर का सही तरह से विकास हो सके। स्वामी न्यूज के इस प्रयास के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नंबर 9829070059 पर कंवल प्रकाश किशनानी से ली जा सकती है। मेरे इस इंटरव्यू को Facebook https://www.facebook.com/share/v/1DL4rKFnFR/ or YouTube :- https://youtube.com/live/o-9aTY1Aggs?feature=share पर देखा जा सकता है।
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Wednesday, 8 July 2026
क्या बाड़मेर रिफाइनरी से जुड़ा है, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के निजी स्टाफ को बदलने तथा बर्खास्त करने का मामला? 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद सत्र में हंगामे के आसार। राजस्थान के मुख्यमंत्री से लगातार मुलाकातें। अलवर में कराई एनटीसीए की कार्यशाला पर 20 लाख का खर्च।
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केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव का देश की राजनीति में जबरदस्त दखल है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में भाजपा को जो अभूतपूर्व सफलता मिली, उसके पीछे भी भूपेंद्र यादव की रणनीति रही। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने चुनाव से एक वर्ष पहले ही यादव को बंगाल का प्रभारी नियुक्त कर दिया था। गुजरात सहित कई राज्यों में भाजपा की सरकार रिपीट करवाने में यादव का विशेष योगदान रहा। भूपेंद्र यादव भाजपा के उन नेताओं में शामिल हैं जो मीडिया से दूर रहकर प्रभावी भूमिका निभाते हैं। स्वाभाविक है कि जब ऐसे ताकतवर केंद्रीय मंत्री के निजी स्टाफ के चार सदस्यों को एक ही दिन में हटाया जाएगा तो फिर देशव्यापी चर्चा तो होगी ही। 3 जुलाई को जिन चार सदस्यों को हटाया गया उनमें भूपेंद्र यादव के निजी सचिव और आईआरएस कैडर के अमर सिंह तथा अतिरिक्त निजी सचिव शैलेश सिंह को अपने मूल कैडर में भेजा गया, जबकि अतिरिक्त निजी सचिव आयुष शरण तथा सहायक निजी सचिव सिद्धार्थ यादव को तो बर्खास्त ही कर दिया गया। हालांकि निजी स्टाफ को बदलने और बर्खास्त करने की कार्यवाही भूपेंद्र यादव के निर्देश पर ही हुई, लेकिन इस तरह एक ही दिन में निजी स्टाफ के अधिकांश सदस्यों को हटाने से इन दिनों राजनीति का माहौल गर्म है। मीडिया में प्रसारित हो रही खबरों के अनुसार सिद्धार्थ यादव भले ही सहायक निजी सचिव हो, लेकिन सिद्धार्थ यादव ही भूपेंद्र यादव की ओर से प्रदेश के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के प्रभावशाली नेताओं से संवाद करते थे। यानी किसी नेता को मिलना है तो सिद्धार्थ यादव ही तारीख और समय तय करते थे। मंत्रालय में तैनात सीनियर आईएएस भी सिद्धार्थ यादव के निर्देशों का पालन करते थे। किसी भी आईएएस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे सिद्धार्थ यादव द्वारा दिए गए निर्देशों की पुष्टि केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से कर सके। चूंकि भूपेंद्र यादव का देश की राजनीति में दखल है, इसलिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी ट्वीट किया है। सिंघवी ने कहा है कि केंद्रीय मंत्री के निजी स्टाफ में इतना बड़ा बदलाव अनेक आशंकाएं प्रकट करता है ।माना जा रहा है कि भूपेंद्र यादव से जुड़े इस प्रकरण को 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद सत्र में भी उठाया जाएगा। विपक्ष यह मांग करेगा कि आखिर किन कारणों से भूपेंद्र यादव के पूरे निजी स्टाफ को हटाया गया है? बाड़मेर रिफाइनरी से जुड़े होने के कयास: बताया जा रहा है कि राजस्थान के बाड़मेर स्थित रिफाइनरी के निर्माण में पर्यावरण से जुड़ी स्वीकृतियों को लेकर जो विलंब और गड़बडिय़ां हुई। उन्हें देखते हुए भूपेंद्र यादव के निजी स्टाफ को हटाया और बर्खास्त किया गया। सूत्रों की माने तो रिफाइनरी का मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मादेी के संज्ञान में भी लाया गया और तब भूपेंद्र यादव से उच्च स्तर पर जवाब तलब किया गया। जो गड़बडिय़ां उजागर हुई उनकी जिम्मेदारी भूपेंद्र यादव ने अपने निजी स्टाफ पर डाल दी। यही वजह रही कि बाद में केंद्रीय मंत्री यादव को अपने निजी स्टाफ से एक साथ चार सदस्यों का हटाना पड़ा। हालांकि अभी निजी स्टाफ को हटाने को लेकर भूपेंद्र यादव की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस प्रकरण से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में खलबली मची हुई है। राजस्थान के सीएम से लगातार मुलाकात: निजी स्टाफ को बदलने का मामला रिफाइनरी से जुड़े होने की खबरों को इसलिए भी बल मिल रहा है कि भूपेंद्र यादव राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से लगातार मिल रहे हैं। हालांकि केंद्रीय मंत्री का किसी मुख्यमंत्री से मिलना सामान्य बात है, लेकिन जब एक पखवाड़े में चार-पांच मुलाकात हो तो फिर चर्चा तो होती ही है। भूपेंद्र यादव ने गत माह 26 जून को सीएम शर्मा से जयपुर में अनेक सरकारी निवास पर मुलाकात की। 7 जुलाई को भी भूपेंद्र यादव सीएम शर्मा से मिलने के लिए दिल्ली स्थित राजस्थान के बीकानेर हाउस में जाकर मिले। आमतौर पर मुख्यमंत्री ही भूपेंद्र यादव से मिलने जाते हैं, लेकिन राजस्थान के सीएम से मिलने के लिए भूपेंद्र यादव स्वयं जा रहे हैं।
अलवर से है लोकसभा के सांसद: भूपेंद्र यादव राजस्थान के अलवर से लोकसभा के सांसद हैं। कुछ मीडिया खबरों में यादव के निजी स्टाफ को हटाने के मामले को पश्चिम बंगाल की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। भले ही निजी स्टाफ को हटाने और बर्खास्त करने का मामला प्रशासनिक बताया जा रहा हो, लेकिन किसी मंत्री के एक साथ चार निजी स्टाफ को हटाना बेहद गंभीर है। चूंकि यह मामला भूपेंद्र यादव से जुड़ा है, इसलिए आने वाले समय में देश की राजनीति में और उछलेगा। अभी राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बना हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़ समूह इस मामले में जहां खोजबीन कर रहा है।
अलवर की सेमिनार पर 20 लाख खर्च: केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की कार्यशैली त माह तब भी चर्चा में आई थी, जब यादव ने अपने संसदीय क्षेत्र अलवर में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण एनटीसीए की एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला करवाई। पांच सितारा होटल में हुई इस एक दिवसीय कार्यशाला पर 20 लाख रुपए खर्च किए गए। इस कार्यशाला में भूपेंद्र यादव भी उपस्थित रहे। यह कार्यशाला 28 जून 2026 को आयोजित की गई। इसमें देशभर से आए वन विभाग के 40 अधिकारियों ने भाग लिया। राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबर में कहा गया कि इतनी महंगी कार्यशाला तब की गई है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका ईरान के युद्ध को देखते हुए ईंधन बचत और मितव्ययिता की अपील की है। यानी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के निर्देशों की भी धज्जियां उड़ाई। S.P.MITTAL BLOGGER ( 09-07-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511
एक ईरान है, जहां अपने दिवंगत नेता खामनेई के साथ सभी ईरानी खड़े हैं।
यही ताकत सुपुर्द-ए-खाक की रस्म के दौरान भी ईरान को अमेरिका से जंग लड़ने की ताकत देती है।
एक भारत है, जहां अपने ही लोग आराध्य देव राम के मंदिर को भी नहीं बख्श रहे।
जबकि 25 करोड़ की मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुबियांटो तो स्वयं में भारत का डीएनए बताते हैं।
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मुस्लिम देश ईरान में अपने दिवंगत नेता अयातुल्ला खामेनेई के सुपुर्द-ए-खाक की रस्म 9 जुलाई को संपन्न हो रही है। गत चार जुलाई से शुरू हुई जनाजे की रस्म में करोड़ों ईरान भाग ले रहे हैं। इसी बीच ईरान अपने दुश्मन अमेरिका के साथ जंग भी लड़ रहा है। यानी एक ओर ईरान अमेरिका की मिसाइलों का सामना कर रहा है। तो दूसरी ओर अपने दिवंगत नेता के साथ पूरी ताकत के साथ खड़ा है। ईरानियों की यह ताकत ही उन्हें अमेरिका के साथ लड़ने की शक्ति प्रदर्शन करता है। ये खामनेई वो ही नेता है, जिनकी कट्टरपंथी नीतियों के विरोध में गत वर्ष लाखों ईरानियों ने खासकर महिलाओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किया था। लेकिन जब अमेरिका ने हमला किया तो सारे ईरानी एकजुट हो गए। आज इसी एकता के कारण ईरान की सेना खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला कर रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही ईरान को तबाह करने की धमकी दे, लेकिन ईरान ने जता दिया है कि जो नीति दिवंगत नेता खामनेई ने निर्धारित की है, उस पर ही ईरान चलेगा। यानी ईरान अमेरिका के सामने झुकेगा नहीं। एक और दुनिया के सामने ईरानियों की एकता है, तो वहीं भारत में अपने ही लोग आराध्य देव राम के मंदिर की छवि खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है। जबकि अयोध्या में जन्म स्थल वाली भूमि पर राम का मंदिर बनवाने में पांच सौ वर्ष लगे और लाखों राम भक्तों ने अपना बलिदान दिया। लंबे संघर्ष के बाद अयोध्या में राम मंदिर बन पाया। लेकिन अब मंदिर के चढ़ावा चोरी की आड़ में संपूर्ण सनातन संस्कृति और भगवान राम पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन लोगों को भी कटघरे में खड़ा किया जा रहा है जिन्होंने मंदिर निर्माण में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। यह सही है कि जिन लोगों ने चढ़ावा चोरी किया उन्हें सजा मिलनी चाहिए। लेकिन चढ़ावा चोरी की आड़ में सनातन संस्कृति को बदनाम नहीं किया जा सकता। गंभीर बात तो यह है कि जिन लोगों ने मंदिर निर्माण में बाधाएं खड़ी की आज वे ही स्वयं को राम भक्त बताकर चढ़ावा चोरी के मामले में बयानबाजी कर रहे हैं। उन लोगों के बलिदान पर पानी फेरने की कोशिश की जा रही है जिन्होंने अयोध्या में मंदिर का निर्माण करवाया। अयोध्या का मंदिर कोई साधारण भवन नहीं है बल्कि यह सौ करोड़ से ज्यादा हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। जो चढ़ावा चोरी का मामला उजागर हुआ है, उसमें सभी सनातनियों को एकजुटता दिखानी चाहिए। लेकिन अपने ही लोग राजनीतिक स्वार्थों की खातिर सनातन संस्कृति को बदनाम कर रहे हैं। ऐसे लोगों को ईरानियों की एकता से सबक लेना चाहिए।
भारत का डीएनए:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 और 7 जुलाई को इंडोनेशिया का दौरा किया। इंडोनेशिया में मुस्लिम आबादी 25 करोड़ है। इंडोनेशिया को मुस्लिम देश ही माना जाता है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुबियांटो ने मोदी से मुलाकात के दौरान कहा, मुझ में भी भारत का डीएनए है। असल में भारत और इंडोनेशिया के बीच सभ्यता और संस्कृति जुड़ी हुई है। एक और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति है जो स्वयं में भारत का डीएनए बताते हैं, दूसरी ओर भारत में अपने ही लोग सनातन संस्कृति पर हमला करने से बाज नहीं आते।
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