Monday, 29 June 2026
खड़गे राज्यसभा में फिर प्रतिपक्ष के नेता बने। कांग्रसे के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो रहेंगे ही।
अशोक गहलोत को सीखनी चाहिए वफादारी।
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29 जून को मल्लिाकर्जुन खडग़े ने राज्यसभा में कांग्रेस सांसद के तौर पर शपथ ली। शपथ लेने के साथ ही राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णान ने खडग़े को प्रतिपक्ष का नेता भी घोषित कर दिया। यानी सभापति को कांग्रेस की ओर से पहले ही सूचित कर दिया गया था कि खडग़े ही कांग्रेस सांसदों के नेता है और राज्यसभा में विपक्ष में कांग्रेस सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसलिए खडग़े ही प्रतिपक्ष के नेता होंगे। आमतौर पर कांग्रेस में एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत पर अमल किया जाता है, लेकिन खडग़े कांग्रेस के उरन चुनिंदा नेताओं में से एक है जिन पर कोई नियम लाू नहीं होता। खडग़े मौजूदा समय में भी कांग्रसे के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। यानी खरगे के पास दो महत्वपूर्ण पद है। राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता का पद होने के कारण खडग़े को केबिनेट मंत्री का दर्जा मिला हुआ है। कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व खासकर गांधी परिवार खडग़े पर कितना भरोसा करता है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2019 से पहले खडग़े लोकसभा में प्रतिपख के नेता थे। 2019 में खडग़े जब लोकसभा का चुनाव हार गए, तब गांधी परिवार ने खडग़े को कर्नाटक से राज्यसभा में भेज दिया। इतना ही नहीं तब गुलाम नबी आजाद जैसे नेता को राज्यसभा से विदा कर खडग़े को प्रतिपक्ष का नेता बना दिया। खडग़े को हाल ही में दुबारा से राज्यसभा का सांसद बनाया गया और उनहें एक बार फिर प्रतिपक्ष का नेता घोषित किया गया।यानी अब खडग़े के पास पूर्व की तरह दो पद रहेंगे। गांधी परिवा रने स्पष्ट कर दिया है कि खडग़े पर एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत लागू नहीं होगा।
गहलोत वफादारी की सीख लें:
सितंबर 2022 से पहले तक अशोक गहलोत भी कांग्रेस के वफादार नेताओं में शामिल थे, लेकिन गहलोत ने जिस तरह 25 सितंबर 2022 को राजस्थान के मुख्यमंत्री के पद के लालच में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से बगावत की उसी का परिणाम है कि आज गहलोत पर हाईकमान का भरोसा नहीं रहा। जहां खडग़े के पास दो-दो महत्वपूर्ण पद है, वहां गहलोत के पास कोई पद नहीं है। एक समय था, जब गहलोत गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद नेता थे, इसलिए वर्ष 2022 में श्रीमती सोनिया गांधी के स्थान पर अशोक गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला किया गया। तब गहलोत को अधिकृत तौर पर उम्मीदवार भी घोषित कर दिया गया था। लेकिन गहलोत ने राजस्थान के मुख्यमंत्री पद के लालच में कांग्रेस हाईकमान के समक्ष बगावत कर दी। गहलोत नहीं चाहते थे कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाए। जबकि गांधी परिवार पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का प्रयास कर रहा था, इसलिए तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मल्लिकार्जुन खडग़े और अजय माकन को पर्यवेक्षक बनाकर राजस्थान भेजा। लेकिन अशोक गहलोत ने तब खडग़े और माकन के साथ कांग्रेस विधायकों की बैठक ही नहीं होने दी। तब इन दोनों पर्यवेक्षकों को अपमानित होरक जयपुर से लौटना पड़ा। इधर गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए रखने की मांग पर कांग्रेस के 80 विधायकों ने अपना सामूहिक इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को दे दिया, तब गहलोत मुख्यमंत्र का पद बचाने में तो सफल रहे, लेकिन गांधी परिवार का भरोसा खो दिया। वफदारी कैसेी होती है यह अशोक गहलोत को खडग़े से सीखनी चाहिए।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 30-06-2026)
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