Sunday, 9 August 2026

 

आखिर राहुल गांधी झारखंड के आंदोलन को समर्थन क्यों नहीं देते?

अरविंद केजरीवाल के इशारे पर नाचने वाली कॉकरोच जनता पार्टी भी चुप।

सीबीआई जांच की मांग पर ऐतराज क्यों?
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झारखंड में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होने के विरोध में प्रदेश भर के छात्र गत एक पखवाड़े से राजधानी में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। कई छात्र आमरण अनशन पर भी है। छात्रों ने पेपर लीक के मामलों की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों की इस मांग को मानने से इंकार कर दिया है। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा वाली सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है। इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी झारखंड के छात्रों के आंदोलन को समर्थन क्यों नहीं दे रहे है? राहुल गांधी के इशारे पर ही नीट पेपर लीक को लेकर संसद की कार्यवाही ठप है। पेपर लीक के मुद्दे को लेकर ही राहुल गांधी ने 8 अगस्त को देहरादून में छात्रों से संवाद किया और कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों की वजह से देश के युवाओं का भविष्य बर्बाद हो रहा है। सवाल उठता है कि जब राहुल गांधी देहरादून जाकर केंद्र सरकार की आलोचना कर सकते हैं, तो रांची आकर छात्र आंदोलन का समर्थन क्यों नहीं करते? झारखंड के छात्र आंदोलन का समर्थन न करने से राहुल गांधी और कांग्रेस का दोहरा चरित्र उजागर होता है। इससे यह भ प्रदर्शित होता है कि राहुल गांधी की नजर में झारखंड के छात्रों का आंदोलन कोई मायने नहीं रखता।

कॉकरोच पार्टी भी चुप:
नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने गत जुलाई माह में दिल्ली में बड़ा धरना प्रदर्शन किया। कॉकरोचों के दबाव के चलते ही धर्मेन्द्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन अब झारखंड के मुद्दे पर वही कॉकरोच पार्टी चुप है। कॉकरोच पार्टी पर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का दबाव है। असल में केजरीवाल की रणनीति से ही कॉकरोच पार्टी का जन्म हुआ। दिल्ली के जंतर मंतर के छात्र आंदोलन में भी परदे के पीछे से केजरीवाल की भूमिका थी। चूंकि झारखंड में कांग्रेस के समर्थन से जेएमएम की सरकार चल रही है, इसलिए केजरीवाल नहीं चाहते कि कॉकरोच पार्टी झारखंड के आंदोलन का समर्थन करें।
 
सीबीआई जांच पर ऐतराज क्यों?
झारखंड में शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास है, इसलिए प्रदर्शनकारी छात्रों को भी पता है कि हेमंत सोरेन इस्तीफा नहीं देेंगे। यही वजह है कि प्रदर्शनकारी छात्र पेपर लीक के मामलों की जांच सीबीआई से करवाने की मांग कर रहे हैं। हालांकि छात्रों के दबाव के चलते सरकार ने झारखंड प्रशासनिक सेवा की परीक्षा को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही झारखंड लोकसेवा आयोग के तीन सदस्यों का इस्तीफा भी ले लिया है, लेकिन सीएम सोरेन सीबीआई जांच की मांग स्वीकार नहीं कर रहे। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 10-08-2026)

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 गहलोत और पायलट गुट की लड़ाई अब डोटासरा के पास पहुंची।

महेंद्र सिंह रलावता ने राजनीति का पाला बदला।

अजमेर में कांग्रेस की फूट चौराहे पर।
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अजमेर शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को एक पत्र लिखकर पूर्व शहर अध्यक्ष विजय जैन और गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया है। डॉ. जयपाल ने पत्र में कहा कि जैन और भाटी की गतिविधियों से कांग्रेस को नुकसान हो रहा है। जिसका असर नगर निगम के चुनाव पर पड़ेगा। इस पत्र पर पूर्व सीएम अशोक गहलोत के समर्थक पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी, नगर निगम में प्रतिपक्ष की पूर्व नेता द्रौपदी कोली के भी हस्ताक्षर हैं। कांग्रेस की राजनीति में पूर्व अध्यक्ष विजय जैन और हेमंत भाटी को कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट का समर्थक माना जाता है। अजमेर में लंबे समय से गहलोत और पायलट के समर्थक आमने सामने है। डॉ. जयपाल द्वारा पत्र लिखे जाने से अब गहलोत और पायलट गुट की लड़ाई प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के पास पहुंच गई है। डॉ. जयपाल का कहना है कि जैन ओर भाटी लगातार पार्टी का अनुशासन तोड़ रहे हैं, इसलिए प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखा गया है। वहीं जैन और भाटी का आरोप है कि डॉ. जयपाल आरटीडीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ के इशोर पर काम कर रहे है। राठौड़ की भूमिका शुरू से ही विभाजनकारी रही है।यही वजह है कि अजमेर में कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने हाल ही में कार्यकर्ताओं की जो बैठक बुलाई उसमें कांग्रेस के निष्ठावान और जिम्मेदार कार्यकर्ता मौजूद थे। कार्यकर्ताओं की इस बैठक को अनुशासनहीनता नहीं माना जा सकता क्योंकि इस बैठक में नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस को मजबूत करने की रणनीति बनी। अनुशानहीनता तो जयपाल और धर्मेन्द्र राठौड़ कर रहे हैं। निष्ठावान कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा की जा रही है। जैन ने कहा कि हम भी प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे। जैन और भाटी ने अजमेर कांग्रेस में असली विवाद की जड़ धर्मेन्द्र राठौड़ को बताया है। मालूम हो कि धर्मेन्द्र राठौड़ पूर्व सीएम अशोक गहलोत के कट्टर समर्थक हैं।

रलावता ने पाला बदला:
अजमेर कांग्रेस के ताजा विवाद में वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह रलावता की बदली हुई भूमिका सामने आई है। रलावता अभी तक सचिन पायलट के समर्थक रहे। पायलट की वजह से ही रलावता को दो बार अजमेर उत्तर क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार बने। यह बात अलग है कि रलावता को दोनों बार हार का सामना करना पड़ा। पायलट जब भी अजमेर आए तब स्वागत करने वालों में रलावता सबसे आगे रहे लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि रलावता ने पायलट का साथ छोड़ दिया है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ. जयपाल के पायलट समर्थक विजय जैन और हेमंत भाटी के खिलाफ जो पत्र लिखा है उस पर रलावता ने भी हस्ताक्षर किए है। इससे जाहिर होता है कि रलावता ने अब गहलोत गुट का दामन थाम लिया है। मालूम हो कि डॉ. जयपाल ने अपनी कार्यकारिणी में रलावता के छोटे भाई पूर्व पार्षद गजेंद्र सिंह रलावता को शामिल किया है। 


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Friday, 7 August 2026

 ममता बनर्जी की टीएमसी वाले सांसद, यूसुफ पठान, खलीलुर्रहमान और अबु ताहिर ने पीएम मोदी का आतिथ्य स्वीकारा।

सवाल-फिर पीएम मोदी मुस्लिम विरोधी कैसे।
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7 अगस्त को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के उन 26 सांसदों को सुबह के नाश्ते पर आमंत्रित किया, जो हाल ही में केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए में शामिल हुए हैं। इन सांसदों में टीएमसी के चुनाव चिह्न पर लोकसभा का सांसद बनने वाले यूसुफ पठान, खलीलुर्रहमान और अबु ताहिर भी शामिल रहे। इन तीनों मुस्लिम सांसदों ने पीएम मोदी के पास खड़े होकर गर्व से फोटो भी खिंचवाया। तीनों ने पीएम मोदी की कार्यशैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि मोदी की नीतियों से देश का विकास हो रहा है। मोदी के 12 वर्ष के कार्यकाल में मुसलमान स्वयं को ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। यहां यह खासतौर से उल्लेखनीय है कि तीनों मुस्लिम सांसदों के संसदीय क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य रहे यूसुफ पठान ने तो अपने गृह प्रदेश गुजरात को छोड़कर पश्चिम बंगाल की बहरामपुर सीट से चुनाव लड़ा था। पठान ने वर्ष 2024 में इस सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार अधीर रंजन चौधरी को इसलिए हराया कि यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ज्यादा थी। आमतौर पर यह आरोप लगता है कि पीएम मोदी मुस्लिम विरोधी है। ऐसा आरोप ममता बनर्जी के साथ साथ कांग्रेस के राहुल गांधी, सपा के अखिलेश यादव आदि भी लगाते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि जब मुस्लिम वोटों के दम पर चुनाव जीते मुस्लिम सांसद ही पीएम मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं, तब मोदी मुस्लिम विरोधी कैसे हो सकते हैं? तीनों मुस्लिम सांसदों ने पीएम मोदी के नेतृत्व में आस्था प्रकट की जो यह दर्शाता है कि पीएम मोदी सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास के तहत मुसलमानों का भी पूरा ख्याल रखते हैं। यदि पीएम मोदी मुस्लिम विरोधी होते तो यूसुफ पठान, खलीलुर्रहमान और अबु ताहिर भी भी मोदी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करते। ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव जैसे नेता मोदी के बारे में कुछ भी कहे, लेकिन मुस्लिम सांसदों ने यह प्रदर्शित किया है कि पीएम मोदी मुस्लिम विरोधी नहीं है। 7 अगस्त की मुलाकात में पीएम मोदी ने टीएमसी और शिवसेना से आए सांसदों को भरोसा दिलाया कि उनके राजनीतिक हितों की रक्षा की जाएगी। यानी वर्ष 2029 में होने वाले लोकसभा के चुनाव में यह सभी सांसद भाजपा के उम्मीदवार होंगे। 


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 तो क्या जेलर सद्दाम हुसैन की वजह से अजमेर सेंट्रल जेल में बंद मुस्लिम कैदियों की मौज हो रही है?

जेल में बंद मुस्लिम कैदियों का रिश्तेदारों से संवाद वाला वीडियो उजागर।

यह जेल की सुरक्षा के लिए खतरनाक स्थिति है।
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भास्कर अखबार ने यह दावा किया कि उसके पास अजमेर सेंट्रल जेल का एक ऐसा एक्सक्लूसिव वीडियो है जो यह दर्शाता है कि जेल में बंद मुस्लिम कैदी अपने रिश्तेदारों से वीडियो कॉलिंग पर संवाद कर रहे हैं। गंभीर और चिंता का विषय यह है कि इस मामले में जेलर सद्दाम हुसैन की भूमिका है। जेलर सद्दाम हुसैन मुस्लिम कैदियों को अपने कक्ष में बुलाता है और फिर अपने मोबाइल से उनके रिश्तेदारों से संवाद करवाता है। अब एक ऐसा वीडियो उजागर हुआ है, जिसमें जेल में बंद ताहिर चिश्ती, उसका बेटा तौफीक चिश्ती और भांजा फखर चिश्ती जेलर सद्दाम हुसैन के कक्ष में बैठकर जेल से बाहर अपने रिश्तेदार फारुख चिश्ती से संवाद कर रहे हैं। फारुख चिश्ती ने इस वीडियो कॉलिंग के लिए जेलर सद्दाम का शुक्रिया अदा भी किया। आरोप है कि सद्दाम हुसैन जेलर के पद का फायदा उठाकर मुस्लिम कैदियों की बात मोबाइल पर उनके रिश्तेदारों से करवाता रहता है। ताजा मामला इसलिए भी गंभीर है कि तौफीक चिश्ती के संबंध बब्बर खालसा जैसे आतंकी संगठनों से भी रहे हैं। तौफिक चिश्ती पर आतंकी संगठनों को हथियार और ड्रग्स सप्लाई करने के आरोप है। ऐसे आरोपों में ही तौफिक चिश्ती पंजाब के जेलों में बंद रहा। तौफीक चिश्ती अपने पिता ताहिर चिश्ती के साथ अजमेर जेल में इसलिए बंद है कि उस पर अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह के खादिम हाजी बिलाल हुसैन चिश्ती पर जानलेवा हमला करने का आरोप है। तीनों आरोपी सात वर्ष की सजा अजमेर जेल में काट रहे हैं। सेंट्रल जेल से अपने रिश्तेदारों से वीडियो कॉल पर बात करने की इस घटना से जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। सरकार को इस पूरे मामले की गंभीरता के साथ जांच पड़ताल करवानी चाहिए । अजमेर में सेंट्रल जेल के साथ साथ हाई सिक्योरिटी जेल भी है। इन दोनों जेलों में कैदियों के पास मोबाइल मिलना आम बात है। लेकिन ताजा मामले में तो कैदी जेलर का मोबाइल ही इस्तेमाल कर रहे हैं। 


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अजमेर में गहलोत और पायलट गुट फिर आमने-सामने।

नगर निगम चुनाव से पहले कांग्रेस की फूट चौराहे पर।

पायलट समर्थकों ने धर्मेन्द्र राठौड़ के दखल पर ऐतराज जताया।
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अगले महीने जब अजमेर नगर निगम के चुनाव होने हैं, तब कांग्रेस की फूट चौराहे पर है। चुनाव से पूर्व, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट के समर्थक आमने सामने हो गए है। पायलट समर्थक माने जाने वाले पूर्व शहर अध्यक्ष विजय जैन और गत दो बार दक्षिण क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी के नेतृत्व में पायलट समर्थकों ने 7 अगस्त को एक बैठक की। इस बैठक में बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल हुए। विजय जैन और हेमंत भाटी ने आरोप लगाया कि आरटीडीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ के दखल से अजमेर शहर में कांग्रेस को नुकसान हो रहा है।
मौजूदा शहर अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल भी राठौड़ के दबाव में काम कर रहे हैं। इससे पुराने और निष्ठावान कांग्रेसियों की की उपेक्षा हो रही है। मौजूदा समय में अजमेर शहर में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त माहोल है। इस बार नगर निगम का मेयर कांग्रेस का बन सकता है, लेकिन धर्मेन्द्र राठौड़ की विभाजनकारी नीतियों के कारण कांग्रेस का कार्यकर्ता निराश है। जैन और भाटी ने कहा कि आखिर धर्मेन्द्र राठौड़ अजमेर की राजनीति में क्यों सक्रिय हैै? राठौड़ ने तो पूर्व में बानसूर (जयपुर ग्रामीण) से चुनाव लड़ा। उनकी राजनीतिक गतिविधियां बानसूर में ही रही है। लेकिन राठौड़ अब अजमेर में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे कांग्रेस का कार्यकर्ता स्वीकार नहीं करेगा। जैन और भाट ने कहा कि हमारा प्रयास कांग्रेस को मजबूत करने का है। जबकि धर्मेन्द्र राठौड़ अजमेर में कांग्रेस को कमजोर कर रहे हैं। जैन और भाटी के आरोपों के जवाब में राठौड़ का कहना रहा है कि वे गत 8 वर्षों से अजमेर की राजनीति में लगातार सक्रिय हैं। उनका पैतृक गांव अजमेर के निकट नांद है। उन्होंने गत 8 वर्षों से अजमेर में कांग्रेस संगठन को मजबूती दी है। आज जो लोग कांग्रेस को मजबूत करने का दावा कर रहे हैं, उन्हीं के कारण अजमेर शहर की दोनों विधानसभा सीटों पर गत पांच बार से लगातार कांग्रेस उम्मीदवारों की हार हो रही है। कांग्रेस को नगर निगम में भी अपना बोर्ड बनाने का अवसर नहीं मिल रहा है। राठौड़ ने कहा कि शहर अध्यक्ष जयपाल के नेतृत्व में कांग्रेस एकजुट है। मैंने तो प्रत्येक कार्यकर्ता का सम्मान किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि धर्मेन्द्र राठौड़ को पूर्व सीएम गहलोत का कट्टर समर्थक माना जाता है। सितंबर 2022 में अब अशोक गहलोत के समर्थन में कांग्रेस के विधायकों की समानांतर बैठक हुई, तब जिन 3 कांग्रेसी नेताओं को हाईकमान ने अनुशासनहीनता का नोटिस दिया, उसमें धर्मेन्द्र राठौड़ भी शामिल थे। आज भी राठौड़, गहलोत के साथ खड़े हैं। राठौड़ का कहना है कि मैं अशोक गहलोत का पक्का समर्थक हंू। 

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Wednesday, 5 August 2026

 

ब्यावर की भी सीमेंट फैक्ट्री से ग्रामीणों का जीना मुश्किल।

प्रतिबंधित केमिकल कचरे के इस्तेमाल से पर्यावरण, पानी जमीन सब कुछ खराब हो रहा है।

ब्यावर का जिला और पुलिस प्रशासन चुप: पर्यावरण विभाग के अधिकारी तो अंधे हैं।
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राजस्थान के ब्यावर के निकट अंधेरी देवरी में श्री सीमेंट का जो प्लांट (फैक्ट्री) लगा हुआ है उसकी वजह से आसपास के ग्रामीणों का जीना मुश्किल हो गया है। यह प्लांट देश के सुविख्यात बांगड़ औद्योगिक घराने का है। यूं तो बांगड़ घराना समाजसेवा का दावा करता है,लेकिन ब्यावर प्लांट की वजह से ग्रामीणों को सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है। ग्रामीणों के अनुसार पिछले कुछ दिनों में फैक्ट्री में प्रतिबंधित केमिकल का उपयोग हो रहा है। यह केमिकल सीमेंट बनाने के काम आने वाले पत्थरों को बरीक किया जाता है, लेकिन कोयले की कीमत बढ़ने के कारण बांगड़ समूह श्री सीमेंट फैक्ट्री में प्रतिबंधित केमिकल का उपयोग कर रहा है। यही कारण है कि फैक्ट्री से जो धुंआ निकलता है, उसकी वजह से आस पास के लोगों को सांस लेने में मुश्किल हो रही है। कई ग्रामीणों को चर्म रोग हो गया है। घरों पर मिट्टी की परत आ रही है। इस जहरीली परत को बार बार हटाना भी कठिन है। फैक्ट्री से जो जरीला पानी निकलता है उसकी वजह से खेती की जमीन बंजर हो रही है ।आसपास के कुओं और तालाबों का पानी भी जहरीला हो गया है। पीड़ित ग्रामीण फैक्ट्री के बाहर लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन ब्यावर का जिला और पुलिस प्रशासन चुप है। उल्टे ग्रामीणों को ही धमकी दी जा रही है कि उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएंगे। जिला और पुलिस प्रशासन नहीं चाहता कि श्री सीमेंट के खिलाफ कोई धरना प्रदर्शन हो। जहां तक पर्यावरण  विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर सवाल है तो इस विभाग के अधिकारी अंधे है। उन्हें फैक्ट्री से निकलने वाला जहरीला धुआ और पानी नजर नही नहीं आ रहा है। कहा जा सकता है कि ग्रामीणों की सुनने वाला कोई नहीं यहां यह कि ग्रामीणों को सुनने वाला कोई नहीं है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ब्यावर की प्रभारी राज्य के उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी है, ग्रामीणों को पीड़ा मंत्री तक पहुंच गई है। लेकिन दीया कुमारी ने भी अभी तक श्री सीमेंट के खिलाफ कार्यवाही करने के निर्देश नहीं दिए है। प्रभारी मंत्री की खामोशी से ब्यावर के पुलिस और जिला प्रशासन की मौज हो गई है। श्री सीमेंट की फैक्ट्री जिस अंधेरी देवरी गांव में स्थित है, वह मसूदा विधानसभा क्षेत्र में आता है। मौजूदा समय में मसूदा से भाजपा विधायक वीरेंद्र सिंह कानावत है, लेकिन कानावत के कानों में भी ग्रामीणों की आवाज सुनाई नहीं दे रही। ब्यावर के भाजपा विधायक शंकर सिंह रावत भी विधायक कानावत के साथ ही खड़े हे। ब्यावर जिला राजसमंद संसदीय क्षेत्र में आता है। मौजूदा समय में श्रीमती महिमा कुमारी भाजपा की सांसद है। शायद महिला कुमारी को भी यह भी पता नहीं होगा कि श्री सीमेंट की फैक्ट्री की वजह से ग्रामीणों को परेशान हो रही है। महिमा कुमारी मेवाड़ राजघराने की सदस्य हे। हो सकता है कि सांसद होने के कारण महिमा कुमारी के बांगड़ समूह से अच्छे संबंध हो।   

S.P.MITTAL BLOGGER ( 06-08-2026)

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 राजस्थान में ओबीसी की 92 जातियों में से सिर्फ 10 जातियों के लोगों की ही राजनीति में भागीदारी।

सवाल- क्या कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा वंचित 82 जातियों के लोगों को पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनाव में उम्मीद बनाएंगे?
आखिर क्यों 10 जातियों के लोग ही सांसद, विधायक, प्रधान, निकाय प्रमुख आदि बनते हैं?
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5 अगस्त को जयपुर में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) प्रतिनिधित्व आयोग के अध्यक्ष रिटायर्ड जज मदनलाल भाटी ने 900 पन्नों वाली आयोग की रिपोर्ट मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनावों में ओबीसी वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण होगा, लेकिन इस रिपोर्ट में चौकाने वाली बात यह है कि राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की 92 जातियों हैं, लेकिन इनमें से 10 जातियों के लोगों की ही राजनीति में भागीदारी है। यानी इन 10 जातियों के लोग ही सांसद, विधायक, प्रधान, शहरी निकायों के प्रमुख आदि बनते हैं। शेष वंचित 82 जातियों के लोग पार्षद और सरपंच भी नहीं बन पाते। इस बड़े अंतर को देखते हुए ही आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश भाटी ने कहा कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट केवल जनसंख्या को आधार मानकर नहीं बनाई है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन को भी देखकर रिपोर्ट तैयार की गई है। इसके लिए प्रदेश भर के 74 लाख 85 हजार ओबीसी वर्ग के परिवारों से संवाद किया गया है। यह वाकई अजीत बात है कि राजस्थान में ओबीसी वर्ग की ऐसी 82 जातियां हैं, जिनका कोई भी प्रतिनिधि आज तक सांसद, विधायक आदि नहीं बन सकता है। यानी 92 जातियों का समूह होने के बाद भी सिर्फ 10 जातियों के लोग ही मलाई खा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या ओबीसी वर्ग की वंचित जातियों को राजनीति में प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए? कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने जब देश भर में जाति आधारित जनगणना की मांग की तो उनका तर्क था कि वंचित जातियों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। राहुल गांधी कहना रहा कि जाति आधारित जनगणना से पता चल जाएगा कि अभी तक राजनीति में किन जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। केंद्र सरकार ने राहुल गांधी की मांग पर जाति आधारित जनगणना करवाने का निर्णय लिया है, लेकिन जब राजस्थान में ओबीसी वर्ग की रिपोर्ट उजागर हो गई है, तब सवाल उठता है कि क्या  प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा  इसी वर्ष होने वाले पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनाव में ओबीसी की वंचित 82 जातियों के लोगों को उम्मीदवार बनाएंगे? राहुल गांधी का सपना तभी पूरा होगा, जब राजस्थान में ओबीसी वर्ग की 82 जातियों के लोगों को आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार बनाया जाए। डोटासरा को अच्छी तरह पता है कि ओबीसी की वे 10 जातियां कौनसी है, जो राजनीति की मलाई खा रही है। यदि वंचित जातियों के लोगों को ओबीसी का लाभ दिया जाता है तो इस वर्ग में सामाजिक समानता भी आएगी। मौजूदा समय में सिर्फ 10 जातियों के लोग ही ओबीसी के 21 प्रतिशत कोटे का लाभ प्राप्त कर रहे है। यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में भी है। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 06-08-2026)
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जाति भी ओछी, जनम भी ओछा, ओछा कर्म हमारा। हम रैदास राम राई को, कह रैदास बिचारा।

मन चंगा तो कठौती में गंगा।
गुरु ग्रंथ साहिब में भी 41 वाणियों के शब्द।

संत रविदास जी का यह विचार आम लोगों तक पहुंचना जरूरी।

भाजपा की तरह कांग्रेस भी पहल कर सकती है।
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संत कवि रविदास जी 650 वीं जयंती पर भाजपा पूरे देश में श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान चला रही है। इसी के अंतर्गत 5 अगस्त को जयपुर में आयोजित एक समारोह में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने 245 रज कलश रथ को हरी झंडी दिखाई। ये रथ प्रदेश के सभी 25 लोकसभा क्षेत्रों में संत कवि रविदास के विचारों का प्रचार-प्रसार करेंगे। कांग्रेस का आरोप है कि प्रदेश में होने वाले पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनावों के मद्देनजर रज कलश रथ को घुमाया जा रहा है। कांग्रेस का अपना तर्क हो सकता है कि लेकिन मौजूदा समय में समाज में जो जातिवाद हावी है,उसका मुकाबला संत कवि रविदास के विचारों से ही किया जा सकता है। 650 वर्ष पहले समाज को जो वातावरण था उसी में चर्मकार रविदास जी ने लिखा, जाति भी ओछी, जनम भी ओछा, ओछा करम हारा। हम रैदास राम राई को, कह रैदास बिचारा। यानी हमारी जाति, जनम और कर्म छोटा है, लेकिन हम तो राजाराम के अनुचर है। अर्थात् जो राम काज में रत भक्त है, उसका कर्म, जन्म और जाति कमतर कैसे हो सकता है। उस समय रैदास जैसा संत कवि ही लिख सकता था, मन चंगा तो कठौती में गंगा। यानी मन पवित्र है तो घर पर गंगा स्नान का पुण्य मिलता सकता है। चूंकि रविदास चर्मकार थे, इसलिए उनके पास चमड़ा भिगोने का का छोटा बर्तन होता था। इस बात को ही कठौती कहा गया है। संत रविदास जी ने अपनी रचनाएं 1489 से 1471 ईवी के बीच लिखी। यह वह दौर था, जब भारत पर लोदी वंश के शासक राज कर रहे थे, इस से पहले हिंदू समाज पर कासिम, गजनवी, गौरी, खिलजी, गुलाम वंश, तुगलक, तैमूर के अत्याचार हो चुके थे। यह वही दौर था जब तलवार की नोंक पर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। तब संपूर्ण हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए संत रविदास जी ने रचनाएं लिखी। रविदास जी की रचनाएं यह बताती है कि हिंदू समाज को आज 650 वर्ष बाद भी एकजुट करने की जरूरत है। यहां यह खासतौर से उल्लेखनीय है कि रविदास जी द्वारा लिखित 41 वाणियोंं को सिख समुदाय के गुरु ग्रंथ साहिब में शब्द के रूप में शामिल किया गया है। इससे भी रविदास के विचारों की मानता का अंदाजा लगाया जा सकता है। रविदास जी के  विचारों को रथ के जरिए भले ही भाजपा ने पहुंचाने का काम किया हो, लेकिन यह काम कांग्रेस भी कर सकती है। भाजपा ने रथ रवाना किए हैं उनमें एक कलश भी रखा हुआ है। इस कलश में वाराणसी के क्षीर, गोवर्धन पुर की रज (मिट्टी) भी भरी हुई है। चूंकि गोवर्धन पुर ही संत रविदास जी की कर्मस्थली रहा, इसलिए अब मिट्टी को पवित्र मानकर उनके विचारों को आगे बढ़ाया जा रहा है। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 06-08-2026)

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Sunday, 2 August 2026

 

शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का 6 वर्ष पुराना मामला उठाकर पूर्व सीएम गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डोटासरा को 30 जुलाई वाले बयान का जवाब दिया।

यह डोटासरा के जले पर नमक छिड़कना जैसा है।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर लोकप्रियता का प्रदर्शन। स्वयं गहलोत ने डाला वीडियो।
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2 अगस्त को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने अपने गृह क्षेत्र जोधपुर के दौरे पर रहे। गहलोत ने अपनी आदत के मुताबिक जमकर बयानबाजी की। गहलोत ने राजनीतिक चतुराई से गत 30 जुलाई को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बयान का भी जवाब दिया। मालूम हो कि 30 जुलाई को पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय आने से पहले जयपुर में गहलोत के सरकारी आवास पर चले गए थे तो डोटासरा ने नाराजगी जताई थी। डोटासरा की यह नाराजगी गहलोत के नागवार लगी। यही वजह रही कि गहलोत ने डोटासरा से जुड़े 6 वर्ष पुराने शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का मामला उठा दिया। गहलाते जब भी मीडिया से संवाद करते हैं तब मीडिया कर्मियों के रूप में अपने समर्थकों को भी सवाल पूछने का मौका देते हैं। चूंकि गहलोत को डोटासरा के 30 जुलाई वाले बयान का जवाब देना था, इसलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिक्षकों के तबादले में रिश्वतखोरी का सवाल उठाया गया। गहलोत चाहते तो अपना जवाब भाजपा के शासन तक सीमित रख सकते थे, लेकिन गहलोत ने 6 वर्ष पुराना जयपुर स्थित बिड़ला ऑडिटोरियम में आयोजित शिक्षक दिवस के समारोह की घटना का भी उल्लेख कर दिया। गहलोत का कहना रहा कि तब मैं मुख्यमंत्री था और मैंने सामान्य शिष्टाचार के नाते समारोह में उपस्थित शिक्षकों से पूछ लिया कि क्या तबादलों में रिश्वत देनी पड़ती है? तो अधिकांश शिक्षकों ने हां में जवाब दिया। उस समय मेरे साथ शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा भी उपस्थित थे, लेकिन बाद में किसी भी शिक्षक ने मुझे रिश्वत का कोई सबूत नहीं दिया। गहलोत ने कहा कि हर शासन में शिक्षकों के तबादले में रिश्वत के आरोप लगते है। गहलोत ने यह बात कहकर डोटासरा के जले पर नमक छिड़कने वाला काम किया है। भाजपा के नेता आज तक इस मुद्दे को लेकर डोटासरा को कटघरे में खड़ा करते हैं और अब गहलोत ने भी यह बता दिया कि 6 वर्ष पहले मेरी सरकार के शिक्षा मंत्री डोटासरा पर भी तबादलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। चूंकि गहलोत चतुर राजनीतिज्ञ है, इसलिए स्वयं की जुबान से डोटासरा को रिश्वतखोर नहीं कहा। लेकिन बड़ी चतुराई से यह दर्शा दिया कि शिक्षकों ने डोटासरा पर भी रिश्वत लेने के आरोप लगाए। मालूम हो कि वर्ष 2018 में जब गहलोत मुख्यमंत्री बने तब डोटासरा को स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया था, लेकिन 2020 में सचिन पायलट की बगावत के बाद डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। तब उन्हें शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। देखना होगा कि गहलोत ने 6 वर्ष पुराना मामला उठाकर डोटासरा पर जो हमला किया है, उसका जवाब आने वाले दिनों में डोटासरा किस प्रकार से देते हैं।
 
लोकप्रियता का प्रदर्शन
2 अगस्त को पूर्व सीएम गहलोत ने जयपुर से जोधपुर का सफर ट्रेन से किया। इस सफर के पीछे गहलोत को स्वयं की लोकप्रियता दिखाना था। गहलोत जब जयपुर के प्लेटफार्म पर पहुंचे तो उनके कैमरा मैन पहले से ही तैयार थे। गहलोत ने प्लेटफार्म पर खड़े यात्रियों से उनके हाल चाल पूछे। कई यात्रियों ने गहलोत को पहचाना उनसे आत्मीय मुलाकात भी की। गहलोत ने एक कुली से भी उसके हाल जाने। प्लेटफार्म के बा जब गहलोत ट्रेन के कोच में पहुंचे तो यहां भी एक एक यात्री से हाथ मिलाया। कोई डेढ़ दो मिनट के इस वीडियो को फिल्मी गाने के साथ गहलोत ने स्वयं सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। इस वीडियो के माध्यम से यह जताने का प्रयास किया गया है कि वे आज भी प्रदेश भर में लोकप्रिय हैं। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 03-08-2026)

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 पाकिस्तान की सीमा से सटे खाजूवाला से 50 करोड़ की हेरोइन और 11 विदेशी पिस्टल जब्त।  ड्रोन का इस्तेमाल।

इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में 50 किलोमीटर की परिधि में अतिक्रमणों को हटाया जा रहा है।

लेकिन कांग्रेस इसमें भी राजनीति कर रही है।
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राजस्थान के सीमावर्ती बीकानेर रेंज में आईजी ओम प्रकाश और एसपी मृदुल कच्छावा के निर्देशन में नार्को आर्म्स, सिडीकेट के खिलाफ जो अभियान चलाया जा रहा है, उसी का परिणाम रहा कि 2 अगस्त को खाजूवाला क्षेत्र से पचास करोड़ रुपए की कीमत वाली 10 किलो अफगानी हेरोइन और 11 विदेशी पिस्टल जब्त की गई। आईजी ओम प्रकाश का मानना है कि यह नशा और हथियार पाकिस्तान से आए हैं ड्रोन ने गिराया है। चूंकि पुलिस लगातार निगरानी कर रही थी, इसलिए हेरोइन और हथियार के बारे में जानकारी मिल गई। उन्होंने बताया कि इस सामग्री के साथ डिलीवरी मैन पाली के जैतारण निवासी वीरेंद्र सिंह राजपुरोहित को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। राजपुरोहित ने बताया कि यह सामग्री पंजाब जेल में बंद लक्खी नाम के व्यक्ति ने पाकिस्तान से मंगवाई थी। रेंज आईजी ओम प्रकाश का मानना है कि नशा और विदेशी हथियार पूरे देश में सप्लाई किए जाने थे। पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राजस्थान में पाकिस्तान सीमा पर लगे श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर,बाड़मेर, हनुमानगढ़ और जोधपुर क्षेत्र की समीक्षा की थी। केंद्रीय एजेंसियों ने बताया कि अब पाकिस्तान राजस्थान वाली सीमा से ड्रोन तकनीक से हथियार और नशीले पदार्थ भिजवा रहा है। केंद्रीय मंत्री शाह के निर्देशों के बाद राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी को और प्रभावी बनाया गया। बीएसएफ और राजस्थान पुलिस के बीच तालमेल को और बेहतर किया जा रहा है। बाड़मेर, जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में दोनों समुदायों के धार्मिक स्थलों को भी हटाया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नशीले पदार्थ और विदेशी हथियारों को छुपाने के लिए धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल हो सकता है। कई बार ऐसे अतिक्रमण प्रभावी निगरानी में बाधक   होते हैं। राजस्थान में सटी सीमा से पाकिस्तान नशीले पदार्थों और हथियारों को न भेज सके, इसलिए सीमा से पचास किलोमी की परिधि में आने वाले निर्माणों को भी हटाया जा हा है। सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए कानून बना है, उसमें सीमा से पचास किलोमीटर की परिधि में संदिग्ध निर्माण नहीं होने चाहिए। इसी कानून के तहत सुरक्षा एजेंसियों को 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी स्थानों की जांच करने का अधिकार भी है। बीकानेर के खाजूवाला में जब्त हेरोइन और विदेशी हथियार की घटना बताती है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। लेकिन कांग्रेस सीमा के इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति कर रही है। संबंधित जिला प्रशासनों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जो अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया है उसका कांग्रेस की ओर से विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि मुसलमानों को निशाना बनाकर कार्यवाही की जा री है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर पुरानी मस्जिदों को भी गिराया जा रहा है। वही प्रशासन का कहना है कि अतिक्रमण हटाओ अभियान में मंदिर भी शामिल है। इसलिए भेदभाव का आरोप पूरी तरह गलत है। मौजूदा हालातों में सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभावी निगरानी की सख्त जरूरत है। उल्लेखनीय है कि पहले जम्मू कश्मीर की सीमा से नशीले पदार्थ और हथियार भेजे जाते थे, लेकिन अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद पाकिस्तान के लिए कश्मीर की सीमा से नशा और हथियार भेजना मुश्किल हो गया है, इसलिए पाकिस्तान अब राजस्थान की सीमा का इस्तेमाल करने लगा है।


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Friday, 31 July 2026

 आरपीएससी के सचिव रामनिवास मेहता की सेवानिवृत्ति पर अनूठा प्रदर्शन।

लेकिन नौकरशाही की जीत को रस्सियों से खींचना कितना उचित।

यह कृत्य आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है।
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31 जुलाई को आईएएस रामनिवास मेहता राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्ति हुए। दावा किया गया कि आयोग के इतिहास में यह पहला अवसर है जब कोई सचिव सेवानिवृत्त हुआ है। यानी अभी कोई भी आईएएस आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्त नहीं हुआ। जो भी सचिव आए वे सेवानिवृत्ति से पहले ही तबादला करवाकर चले गए। मेहता ने सेवानिवृत्ति तक सचिव के पद पर काम किया। यह भी सही है कि सचिव के पद पर रहते हुए मेहता ने मन लगाकर काम किया। आयोग जब पेपर लीक के बुरे दौर से गुजर रहा था, तब मेहता ने अभ्यर्थी से सीधा संवाद कर भरोसा कायम करने का प्रयास किया। मेहता अपने कक्ष से उठकर आयोग के बाहर आ गए और अभ्यर्थियों की समस्याओं का समाधान किया। इसलिए अब जब 31 जुलाई को मेहता की सेवानिवृत्ति हुई तो आयोग के सदस्यों अधिकारियों और कर्मियों ने खुली जीप मंगवाई और मेहता को जीप पर खड़ा किया तथा सभी ने मिलकर रस्सियों से जीप को खींचा। रस्सियों से जीप को खींचने वालों में आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष कर्नल केसरी सिंह राठौड़, सदस्य हेमंत प्रियदर्शी, डॉ. सुशील बिस्सू भी शामिल रहे। लेकिन सवाल उठता है कि क्या किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर खुली जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचा जाना चाहिए? आयोग के अधिकारी और कार्मिक कुछ भी तर्क दे, लेकिन यह आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है। आयोग के सदस्य के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्यपाल द्वारा एक बार नियुक्ति आदेश करने के बाद सुप्रीम कोर्ट भी सदस्य को हटा नहीं सकता। इतनी मजबूत स्थिति वाले सदस्य यदि किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचे तो इसे किसी भी दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता। रामनिवास मेहता की सेवाएं अपनी जगह है। मेहता की सेवाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इस तरह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई उचित नहीं है। 31 जुलाई को आयोग के सदस्य डॉ. अशोक कुमार कलवार का कार्यकाल भी पूरा हो हुआ। इसलिए खुली जीप में मेहता के साथ डॉ. कलवार को भी खड़ा कर दिया गया। आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा प्रदर्शन हुआ, जब कार्यकाल पूरा होने के बाद किसी सदस्य को नौकरशाह के साथ खड़ा किया गया। आयोग के प्रशासनिक ढांचे में सदस्य और सचिव के बीच काफी अंतर है। सचिव आयोग के सदस्यों के निर्देश पर काम करता है। केसरी सिंह राठौड़ तो सेना में कर्नल के पद पर रह चुके हैं। क्या किसी सेन्य अधिकारी रहे व्यक्ति को किसी नौकरशाह की जीप को खींचना चाहिए? 


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अमित शाह से मुलाकात के बाद उत्साहित है, केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी।

सब्सिडी विवाद के बाद पहली मुलाकात।
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अजमेर के भाजपा सांसद और केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी ने 31 जुलाई को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। मुलाकात के बाद चौधरी ने कहा कि उन्हें अमित शाह का मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है जो उत्साहित करने वाला है। अमित शाह से मुलाकात के बाद चौधरी जिस तरह उत्साहित नजर आए उससे प्रतीत होता है कि एक करोड़ की सब्सिडी लेने और वापस लौटने का मामला खत्म हो गया है। विगत दिनों जब कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से एक करोड़ रुपए की सब्सिडी लेने का मामला मीडिया में वायरल हुआ तो भागीरथ चौधरी के केंद्रीय मंत्री पद को लेकर अटकलें लगने लगी थी। कहा गया कि चौधरी को मंत्री पद से हटाया जा सकता है। विवाद के बाद चौधरी ने एक करोड़ की सब्सिडी की राशि संबंधित बैंक में जमा करवा दी और बैंक से आग्रह किया कि इस राशि को वापस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के खाते में जमा करवा दिया जाए। चौधरी के निर्देश पर सब्सिडी की राशि बोर्ड के पास पहुंच भी गई। चूंकि सब्सिडी विवाद के बाद भागीरथ चौधरी की अमित शाह से पहली मुलाकात थी, इसलिए राजनीतिक क्षेत्रों में इस मुलाकात का महत्व है। चौधरी अब संतुष्ट है कि यह विवाद खत्म हो गया है। उल्लेखनीय है कि चौधरी ने कुचामन जिले के पीह गांव स्थित अपने कृषि फार्म हाउस पर व्यावसायिक खेती के लिए एक करोड़ की सब्सिडी प्राप्त की थी। मीडिया में चौधरी के सब्सिडी लेने की आलोचना हुई थी। 

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 जानकारी के अभाव में डोटासरा ने बयान दिया-अशोक गहलोत, पूर्व सीएम।

लेकिन चौथी बार गहलोत सरकार के नारों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

ऐरे-गैरे नत्थू गेरे कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं-संदीप चौधरी, प्रदेश उपाध्यक्ष व गहलोत समर्थक।
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30 जुलाई को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने महेंद्रजीत सिंह मालवीय और उनके साथ आए समर्थकों को लेकर जो नाराजगी प्रकट की उसके संदर्भ में 31 जुलाई को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सफाई दी। मालूम हो कि बांसवाड़ा डूंगरपुर से आए 300 कार्यकर्ताओं को मालवीय पहले गहलोत के सरकारी आवास पर ले गए। यहां गहलोत की उपस्थिति में समर्थकों ने चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। इसके बाद मालवीय के नेतृत्व में सभी समर्थकों ने जयपुर में कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय में डोटासरा से मुलाकात की। तभी डोटासरा ने नाराजगी जताते हुए कहा, मालवीय तो किसी नेता की ब्रांडिंग करने के लिए जयपुर आए हैं। डोटासरा की इस नाराजगी पर गहलोत ने कहा, ऐसा बयान जानकारी के अभाव में दिया गया। असल में जयपुर में कार्यकर्ताओं की जॉइनिंग का कोई कार्यक्रम नहीं था। मालवीय के नेतृत्व में कार्यकर्ता तो सिर्फ मिलने के लिए जयपुर आए थे। मैंने तो कार्यकर्ताओं से आग्रह किया था कि वे बांसवाड़ा डूंगरपुर से जयपुर नहीं आए। थोड़े दिनों में मैं स्वयं ही बांसवाड़ा आ जाऊंगा। लेकिन जब कार्यकर्ता आ ही गए तो मैं मिलने के बाद सभी कार्यकर्ता शिष्टाचार के नाते अध्यक्ष डोटासरा से भी मिलने के लिए चले गए। गहलोत ने कहा कि डोटासरा ने कोई नाराजगी नहीं जताई। मीडिया वाले बेवजह इस मामले को तूल दे रहे हैं। मेरे और डोटासरा के बीच कोई विवाद नहीं है।

 
नारों पर टिप्पणी नहीं:
असल में डोटासरा की सबसे ज्यादा नाराजगी गहलोत के निवास पर चौथी बार गहलोत सरकार के नारों को लेकर थी, लेकिन गहलोत ने इसे नारे को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। गहलोत की सफाई से प्रतीत होता है कि मालवीय के समर्थक तो सिर्फ अशोक गहलोत से मिलने के लिए ही जयपुर आए थे। मालवीय को तो सिर्फ गहलोत की ही ब्रांडिंग करनी थी। बाद में डोटासरा से मिलने का कार्यक्रम भी जोड़ा गया। इसलिए गहलोत ने कहा कि डोटासरा के पास जानकारी का अभाव रहा। असल में कांग्रेस की राजनीति में सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा चौथी बार गहलोत सरकार का नारा ही है। लेकिन अशोक गहलोत इस नारे पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे है। इससे जाहिर है कि गहलोत चौथी बार राजस्थान का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।
 
संदीप चौधरी की टिप्पणी से विवाद और बढ़ा:
गहलोत भले ही डोटासरा के साथ कोई विवाद होने से इंकार करे,लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष संदीप चौधरी के ताजा बयान से विवाद और गहरा गया है। कांग्रेस की राजनीति में गहलोत का समर्थक माने जाने वाले संदीप चौधरी ने 31 जुलाई को किसी नेता का नाम लिए बगैर कहा कि ऐरे गैरे नत्थू गेरे जब कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं। माना जा रहा है कि संदीप चौधरी की यह टिप्पणी डोटासरा को लेकर है। मालूम हो कि वर्ष 2020 में जब सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस के 18 विधायक दिल्ली चले गए थे, तब मुख्यमंत्री रहते हुए अशोक गहलोत ने पायलट के स्थान पर डोटासरा को ही प्रदेशाध्यक्ष बनवाया था। तब गहलोत के समर्थन के कारण अनेक वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए डोटासरा अध्यक्ष बने। चूंकि उस समय गहलोत को गांधी परिवार का पूरा संरक्षण था, इसलिए वे जूनियन होते हुए भी डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में सफल रहे, भले ही गहलोत ने डोटासरा को अध्यक्ष बनवाया हो, लेकिन गहलोत को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब डोटासरा भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं और उन्हें यह पसंद नहीं कि कांग्रेस का कार्यकर्ता चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। 

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 ब्राह्मण पुजारी बनकर सांसद पप्पू यादव ने संसद भवन परिसर में सनातन धर्म का मजाक उड़ाया।

कांग्रेस, सपा जैसे दल सत्ता में आए तो सनातनियों के हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सवाल-क्या किसी दूसरे मजहब का इस तरह मजाक उड़ाने की हिम्मत है?
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31 जुलाई को संसद भवन परिसर में कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने संसद की सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है, उसी मंदिर परिसर में सनातन धर्म का मजाक उड़ाया गया। कांग्रेस समर्थित निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ब्राह्मण पुजारी के भेष में संसद भवन आए। उनके हाथ में लोहे के पीपे से बना दान पात्र भी था। पप्पू यादव ब्राह्मण पुजारी के भेश में दान पात्र को लेकर संसद भवन  परिसर में बैठ गए और फिर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दलों के सांसदों ने एक एक कर दान पात्र में राशि डाली। नगद राशि डालने वालों में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी, सपा के मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, कांग्रेस की सांसद प्रियंका गांधी आदि भी शामिल रही। बाद में पप्पू यादव  दान पात्र को लेकर भाग गए। पप्पू यादव का कहना है कि यह नाटक उन्होंने अयोध्या में चढ़ावा चोरी के संदर्भ में किया, लेकिन यह विपक्ष के सांसदों का नाटक नहीं बल्कि उनकी मानसिकता को दर्शाता है। पप्पू यादव ने ब्राह्मण पुजारी का भेष धारण किया और फिर कांग्रेस और सपा के सांसदों ने इस नाटक में जिस तरह भाग लिया उससे साफ जाहिर है कि इन दलों के नेताओं के मन में सनातन के प्रति कितनी नफरत है। मंदिर चढ़ावा चोरी का विरोध अन्य तरीके से भी किया जा सकता था, लेकिन जिस तरह पूरे सनातन धर्म का मजाक उड़ाया, वह देश के लिए खतरनाक स्थिति है। यदि कांग्रेस, सपा जैसे दल सत्ता में आ गए तो सनातनियों के हालात कैसे होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष ही विधानसभा के चुनाव होने हैं। सनातन धर्म को मानने वाले लोग समाजवादी पार्टी की नफरत विचारधारा को देख सकते हैं। पप्पू यादव के माध्यम से विपक्षी दलों ने यह प्रदर्शित किया कि वह सनातन से कितनी नफरत करते हैं। सब जानते हैं कि रावण ने ब्राह्मण का भेष धारण कर ही माता सीता का हरण किया था।

 
साधु संत और ब्राह्मण समाज में रोष:
कांग्रेस, सपा और विपक्षी दलों ने 31 जुलाई को जिस तरह सनातन धर्म का मजाक उड़ाया उससे अब पूरे देश में साधु संत और ब्राह्मण समाज आक्रोशित है। 1 अगस्त को साधु संत दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन भी कर रहे हैं। देश भर में भी साधु संतों के प्रदर्शन शुरू हो गए है। इतिहास गवाह है कि भारत में सनातन को बचाने के लिए करोड़ों सनातनियों ने अपना बलिदान दिया है। जिस राम मंदिर का चढ़ावा चोरी को विपक्ष मुद्दा बना रहा है उस मंदिर के लिए भी लाखों सनातनियों ने बलिदान दिया है।
 
ऐसी मजाक दूसरे मजहब के लिए नहीं:
सवाल उठता है कि विपक्षी दलों ने जिस तरह सनातन धर्म का मजाक उड़ाया क्या ऐसा कृत्य किसी दूसरे मजहब के लिए किया जा सकता है? विपक्ष के किसी भी सांसद में हिम्मत नहीं कि वह दूसरे मजहब का भेष धारण कर संसद में इस तरह का नाटक कर सके। पप्पू यादव और उनके समर्थक सांसद अभी भी सीना चौड़ा कर घूम रहे है। यदि ऐसा मजाक दूसरे मजहब को लेकर किया जाता तो अब तक सिर तन से जुदा हो जाता है। यह सनातन धर्म की विशेषता ही है कि आलोचना करने और मजाक उड़ाने वालों को भी सांसद, विधायक बनने का अवसर मिल जाता है। 

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Thursday, 30 July 2026

 तो राहुल गांधी चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए।

प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल को लोकसभा में बोलना ही नहीं था।

आखिर प्रतिपक्ष के नेता के लोकतंत्र विरोधी आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा?

न राहुल गांधी माफी मांगेंगे और न मानसून सत्र चल पाएगा।
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29 जुलाई को कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में जो आचरण किया, उस से प्रतीत होता है कि वे चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए। राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस के सांसद नहीं है बल्कि प्रतिपक्ष के नेता भी है, इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे लोकतंत्र की परंपराओं के अनुरूप संसद में मर्यादित आचरण करें। प्रतिपक्ष के नेता का पद होने के कारण राहुल गांधी को लोकसभा में हर विषय पर बोलने का अधिकार है, लेकिन संसद की कार्यवाही बताती है कि राहुल गांधी जब भी बोलते हैं तो विवाद हो जाता है। 29 जुलाई को राहुल गांधी को लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर बोलना था, लेकिन उन्होंने शुरुआत ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमले के साथ की। राहुल ने कहा कि गत 20 जुलाई को जब कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ता जंतर मंतर से संसद भवन की ओर आ रहे थे, तब अतिम शाह ने गृह मंत्री के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए छात्रों पर गोलियां चलवा दी। स्वाभाविक था कि राहुल के इस कथन पर सत्तारूढ़ भाजपा के सांसद ने ऐतराज जताते। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, पहली बात तो छात्रों पर गोली चली ही नहीं और मौके पर हालातों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट और पुलिस के अधिकारियों की होती है। रिजिजू ने कहा कि राहुल गांधी को अपने झूठे कथन के लिए माफी मांगनी पड़ेगी। हंगाम के बीच संशोधन विधेयक को तो पारित कर दिया गया, लेकिन फिर लोकसभा का संचालन नहीं हो सका।

 
राहुल को तो बोलना ही नहीं था:
संसद में हंगामे के बाद थोड़ी ही देर में राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल  को संसद में बोलना ही नहीं था। राहुल गांधी ने कहा, उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया गया, इसलिए वे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने वीडियो के माध्यम से जिस तरह प्रेजेंटेशन दिया उस से जाहिर था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। राहुल गांधी तय करके गए थे कि उन्हें लोकसभा के बजाए प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात को रखना है। राहुल ने पूर्व नियोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर गोली चलाने के आरोप लगाए।
 
संसद निशाने पर:
राहुल गांधी 20 जुलाई के कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री शाह पर हमलावर है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट बता रही है कि कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च के प्रदर्शन में करीब तीन हजार अपराधी प्रवृत्ति के युवा शामिल थे। इन्हीं लोगों ने जंतर मंतर के धरने के दौरान देश विरोधी नारे लगाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भद्दी गालियां दी। पुलिस का प्रयास था कि कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ताओं को बैरिकेट्स लगाकर रोका जाए, लेकिन जब कार्यकर्ता नहीं रुके तो फिर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस के अधिकारियों का मानना रहा कि यदि बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जाता तो संसद पर हालात बिगड़ जाते। यानी देश विरोधी तत्व संसद में घुस सकते थे। क्या राहुल गांधी यहीं चाहते है कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए?

कब तक बर्दाश्त:
राहुल गांधी संसद में जो अमर्यादित आचरण कर रहे हैं उसे आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? सब जानते हैं कि कांग्रेस की वजह से ही संसद का गत बजट सत्र भी नहीं चल पाया था। इसी प्रकार शीतकालीन सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति के तहत ही अब चालू मानसून सत्र भी चल नहीं पाएगा। राहुल गांधी मांग कर रहे है कि केंद्रीय गृहमंत्री इस्तीफा दे, जबकि भाजपा के सांसद अब राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग कर रहे है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कह दिया है कि वे माफी नहीं मांगेंगे। सवाल उठता है कि आखिर राहुल गांधी के अमर्यादित आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? यह माना कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन देखा जा रहा है कि भारत में विपक्ष सिर्फ नकारात्मक भूमिका निभा रहा है। लोकतंत्र में हार जीत का फैसला चुनाव से होता है। कांग्रेस और विपक्षी दल चुनाव में लगातार हार रहे हैं। इस हार के कारण ही कई क्षेत्रीय दल राज्यों की सत्ता से बाहर हो गए है तथा लाख कोशिश के बाद भी कांग्रेस केंद्र में सरकार नहीं बना पा रही है। कहा जा सकता है कि बगैर राहुल गांधी और विपक्षी दलों के नेता छटपटा रहे हैं। यही वजह है कि संसद को भी चलने नहीं दिया जा रहा है। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 30-07-2026)

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