Friday, 31 July 2026

 आरपीएससी के सचिव रामनिवास मेहता की सेवानिवृत्ति पर अनूठा प्रदर्शन।

लेकिन नौकरशाही की जीत को रस्सियों से खींचना कितना उचित।

यह कृत्य आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है।
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31 जुलाई को आईएएस रामनिवास मेहता राजस्थान लोक सेवा आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्ति हुए। दावा किया गया कि आयोग के इतिहास में यह पहला अवसर है जब कोई सचिव सेवानिवृत्त हुआ है। यानी अभी कोई भी आईएएस आयोग के सचिव के पद से सेवानिवृत्त नहीं हुआ। जो भी सचिव आए वे सेवानिवृत्ति से पहले ही तबादला करवाकर चले गए। मेहता ने सेवानिवृत्ति तक सचिव के पद पर काम किया। यह भी सही है कि सचिव के पद पर रहते हुए मेहता ने मन लगाकर काम किया। आयोग जब पेपर लीक के बुरे दौर से गुजर रहा था, तब मेहता ने अभ्यर्थी से सीधा संवाद कर भरोसा कायम करने का प्रयास किया। मेहता अपने कक्ष से उठकर आयोग के बाहर आ गए और अभ्यर्थियों की समस्याओं का समाधान किया। इसलिए अब जब 31 जुलाई को मेहता की सेवानिवृत्ति हुई तो आयोग के सदस्यों अधिकारियों और कर्मियों ने खुली जीप मंगवाई और मेहता को जीप पर खड़ा किया तथा सभी ने मिलकर रस्सियों से जीप को खींचा। रस्सियों से जीप को खींचने वालों में आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष कर्नल केसरी सिंह राठौड़, सदस्य हेमंत प्रियदर्शी, डॉ. सुशील बिस्सू भी शामिल रहे। लेकिन सवाल उठता है कि क्या किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर खुली जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचा जाना चाहिए? आयोग के अधिकारी और कार्मिक कुछ भी तर्क दे, लेकिन यह आयोग के सदस्यों की गरिमा के विपरीत भी है। आयोग के सदस्य के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्यपाल द्वारा एक बार नियुक्ति आदेश करने के बाद सुप्रीम कोर्ट भी सदस्य को हटा नहीं सकता। इतनी मजबूत स्थिति वाले सदस्य यदि किसी नौकरशाह को सेवानिवृत्ति पर जीप में बैठाकर रस्सियों से खींचे तो इसे किसी भी दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता। रामनिवास मेहता की सेवाएं अपनी जगह है। मेहता की सेवाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इस तरह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई उचित नहीं है। 31 जुलाई को आयोग के सदस्य डॉ. अशोक कुमार कलवार का कार्यकाल भी पूरा हो हुआ। इसलिए खुली जीप में मेहता के साथ डॉ. कलवार को भी खड़ा कर दिया गया। आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा प्रदर्शन हुआ, जब कार्यकाल पूरा होने के बाद किसी सदस्य को नौकरशाह के साथ खड़ा किया गया। आयोग के प्रशासनिक ढांचे में सदस्य और सचिव के बीच काफी अंतर है। सचिव आयोग के सदस्यों के निर्देश पर काम करता है। केसरी सिंह राठौड़ तो सेना में कर्नल के पद पर रह चुके हैं। क्या किसी सेन्य अधिकारी रहे व्यक्ति को किसी नौकरशाह की जीप को खींचना चाहिए? 


S.P.MITTAL BLOGGER ( 01-08-2026)

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अमित शाह से मुलाकात के बाद उत्साहित है, केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी।

सब्सिडी विवाद के बाद पहली मुलाकात।
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अजमेर के भाजपा सांसद और केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी ने 31 जुलाई को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। मुलाकात के बाद चौधरी ने कहा कि उन्हें अमित शाह का मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है जो उत्साहित करने वाला है। अमित शाह से मुलाकात के बाद चौधरी जिस तरह उत्साहित नजर आए उससे प्रतीत होता है कि एक करोड़ की सब्सिडी लेने और वापस लौटने का मामला खत्म हो गया है। विगत दिनों जब कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से एक करोड़ रुपए की सब्सिडी लेने का मामला मीडिया में वायरल हुआ तो भागीरथ चौधरी के केंद्रीय मंत्री पद को लेकर अटकलें लगने लगी थी। कहा गया कि चौधरी को मंत्री पद से हटाया जा सकता है। विवाद के बाद चौधरी ने एक करोड़ की सब्सिडी की राशि संबंधित बैंक में जमा करवा दी और बैंक से आग्रह किया कि इस राशि को वापस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के खाते में जमा करवा दिया जाए। चौधरी के निर्देश पर सब्सिडी की राशि बोर्ड के पास पहुंच भी गई। चूंकि सब्सिडी विवाद के बाद भागीरथ चौधरी की अमित शाह से पहली मुलाकात थी, इसलिए राजनीतिक क्षेत्रों में इस मुलाकात का महत्व है। चौधरी अब संतुष्ट है कि यह विवाद खत्म हो गया है। उल्लेखनीय है कि चौधरी ने कुचामन जिले के पीह गांव स्थित अपने कृषि फार्म हाउस पर व्यावसायिक खेती के लिए एक करोड़ की सब्सिडी प्राप्त की थी। मीडिया में चौधरी के सब्सिडी लेने की आलोचना हुई थी। 

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 जानकारी के अभाव में डोटासरा ने बयान दिया-अशोक गहलोत, पूर्व सीएम।

लेकिन चौथी बार गहलोत सरकार के नारों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

ऐरे-गैरे नत्थू गेरे कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं-संदीप चौधरी, प्रदेश उपाध्यक्ष व गहलोत समर्थक।
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30 जुलाई को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने महेंद्रजीत सिंह मालवीय और उनके साथ आए समर्थकों को लेकर जो नाराजगी प्रकट की उसके संदर्भ में 31 जुलाई को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सफाई दी। मालूम हो कि बांसवाड़ा डूंगरपुर से आए 300 कार्यकर्ताओं को मालवीय पहले गहलोत के सरकारी आवास पर ले गए। यहां गहलोत की उपस्थिति में समर्थकों ने चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। इसके बाद मालवीय के नेतृत्व में सभी समर्थकों ने जयपुर में कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय में डोटासरा से मुलाकात की। तभी डोटासरा ने नाराजगी जताते हुए कहा, मालवीय तो किसी नेता की ब्रांडिंग करने के लिए जयपुर आए हैं। डोटासरा की इस नाराजगी पर गहलोत ने कहा, ऐसा बयान जानकारी के अभाव में दिया गया। असल में जयपुर में कार्यकर्ताओं की जॉइनिंग का कोई कार्यक्रम नहीं था। मालवीय के नेतृत्व में कार्यकर्ता तो सिर्फ मिलने के लिए जयपुर आए थे। मैंने तो कार्यकर्ताओं से आग्रह किया था कि वे बांसवाड़ा डूंगरपुर से जयपुर नहीं आए। थोड़े दिनों में मैं स्वयं ही बांसवाड़ा आ जाऊंगा। लेकिन जब कार्यकर्ता आ ही गए तो मैं मिलने के बाद सभी कार्यकर्ता शिष्टाचार के नाते अध्यक्ष डोटासरा से भी मिलने के लिए चले गए। गहलोत ने कहा कि डोटासरा ने कोई नाराजगी नहीं जताई। मीडिया वाले बेवजह इस मामले को तूल दे रहे हैं। मेरे और डोटासरा के बीच कोई विवाद नहीं है।

 
नारों पर टिप्पणी नहीं:
असल में डोटासरा की सबसे ज्यादा नाराजगी गहलोत के निवास पर चौथी बार गहलोत सरकार के नारों को लेकर थी, लेकिन गहलोत ने इसे नारे को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। गहलोत की सफाई से प्रतीत होता है कि मालवीय के समर्थक तो सिर्फ अशोक गहलोत से मिलने के लिए ही जयपुर आए थे। मालवीय को तो सिर्फ गहलोत की ही ब्रांडिंग करनी थी। बाद में डोटासरा से मिलने का कार्यक्रम भी जोड़ा गया। इसलिए गहलोत ने कहा कि डोटासरा के पास जानकारी का अभाव रहा। असल में कांग्रेस की राजनीति में सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा चौथी बार गहलोत सरकार का नारा ही है। लेकिन अशोक गहलोत इस नारे पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे है। इससे जाहिर है कि गहलोत चौथी बार राजस्थान का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।
 
संदीप चौधरी की टिप्पणी से विवाद और बढ़ा:
गहलोत भले ही डोटासरा के साथ कोई विवाद होने से इंकार करे,लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष संदीप चौधरी के ताजा बयान से विवाद और गहरा गया है। कांग्रेस की राजनीति में गहलोत का समर्थक माने जाने वाले संदीप चौधरी ने 31 जुलाई को किसी नेता का नाम लिए बगैर कहा कि ऐरे गैरे नत्थू गेरे जब कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं। माना जा रहा है कि संदीप चौधरी की यह टिप्पणी डोटासरा को लेकर है। मालूम हो कि वर्ष 2020 में जब सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस के 18 विधायक दिल्ली चले गए थे, तब मुख्यमंत्री रहते हुए अशोक गहलोत ने पायलट के स्थान पर डोटासरा को ही प्रदेशाध्यक्ष बनवाया था। तब गहलोत के समर्थन के कारण अनेक वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए डोटासरा अध्यक्ष बने। चूंकि उस समय गहलोत को गांधी परिवार का पूरा संरक्षण था, इसलिए वे जूनियन होते हुए भी डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में सफल रहे, भले ही गहलोत ने डोटासरा को अध्यक्ष बनवाया हो, लेकिन गहलोत को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब डोटासरा भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं और उन्हें यह पसंद नहीं कि कांग्रेस का कार्यकर्ता चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। 

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 ब्राह्मण पुजारी बनकर सांसद पप्पू यादव ने संसद भवन परिसर में सनातन धर्म का मजाक उड़ाया।

कांग्रेस, सपा जैसे दल सत्ता में आए तो सनातनियों के हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सवाल-क्या किसी दूसरे मजहब का इस तरह मजाक उड़ाने की हिम्मत है?
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31 जुलाई को संसद भवन परिसर में कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने संसद की सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है, उसी मंदिर परिसर में सनातन धर्म का मजाक उड़ाया गया। कांग्रेस समर्थित निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ब्राह्मण पुजारी के भेष में संसद भवन आए। उनके हाथ में लोहे के पीपे से बना दान पात्र भी था। पप्पू यादव ब्राह्मण पुजारी के भेश में दान पात्र को लेकर संसद भवन  परिसर में बैठ गए और फिर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दलों के सांसदों ने एक एक कर दान पात्र में राशि डाली। नगद राशि डालने वालों में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी, सपा के मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, कांग्रेस की सांसद प्रियंका गांधी आदि भी शामिल रही। बाद में पप्पू यादव  दान पात्र को लेकर भाग गए। पप्पू यादव का कहना है कि यह नाटक उन्होंने अयोध्या में चढ़ावा चोरी के संदर्भ में किया, लेकिन यह विपक्ष के सांसदों का नाटक नहीं बल्कि उनकी मानसिकता को दर्शाता है। पप्पू यादव ने ब्राह्मण पुजारी का भेष धारण किया और फिर कांग्रेस और सपा के सांसदों ने इस नाटक में जिस तरह भाग लिया उससे साफ जाहिर है कि इन दलों के नेताओं के मन में सनातन के प्रति कितनी नफरत है। मंदिर चढ़ावा चोरी का विरोध अन्य तरीके से भी किया जा सकता था, लेकिन जिस तरह पूरे सनातन धर्म का मजाक उड़ाया, वह देश के लिए खतरनाक स्थिति है। यदि कांग्रेस, सपा जैसे दल सत्ता में आ गए तो सनातनियों के हालात कैसे होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष ही विधानसभा के चुनाव होने हैं। सनातन धर्म को मानने वाले लोग समाजवादी पार्टी की नफरत विचारधारा को देख सकते हैं। पप्पू यादव के माध्यम से विपक्षी दलों ने यह प्रदर्शित किया कि वह सनातन से कितनी नफरत करते हैं। सब जानते हैं कि रावण ने ब्राह्मण का भेष धारण कर ही माता सीता का हरण किया था।

 
साधु संत और ब्राह्मण समाज में रोष:
कांग्रेस, सपा और विपक्षी दलों ने 31 जुलाई को जिस तरह सनातन धर्म का मजाक उड़ाया उससे अब पूरे देश में साधु संत और ब्राह्मण समाज आक्रोशित है। 1 अगस्त को साधु संत दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन भी कर रहे हैं। देश भर में भी साधु संतों के प्रदर्शन शुरू हो गए है। इतिहास गवाह है कि भारत में सनातन को बचाने के लिए करोड़ों सनातनियों ने अपना बलिदान दिया है। जिस राम मंदिर का चढ़ावा चोरी को विपक्ष मुद्दा बना रहा है उस मंदिर के लिए भी लाखों सनातनियों ने बलिदान दिया है।
 
ऐसी मजाक दूसरे मजहब के लिए नहीं:
सवाल उठता है कि विपक्षी दलों ने जिस तरह सनातन धर्म का मजाक उड़ाया क्या ऐसा कृत्य किसी दूसरे मजहब के लिए किया जा सकता है? विपक्ष के किसी भी सांसद में हिम्मत नहीं कि वह दूसरे मजहब का भेष धारण कर संसद में इस तरह का नाटक कर सके। पप्पू यादव और उनके समर्थक सांसद अभी भी सीना चौड़ा कर घूम रहे है। यदि ऐसा मजाक दूसरे मजहब को लेकर किया जाता तो अब तक सिर तन से जुदा हो जाता है। यह सनातन धर्म की विशेषता ही है कि आलोचना करने और मजाक उड़ाने वालों को भी सांसद, विधायक बनने का अवसर मिल जाता है। 

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Thursday, 30 July 2026

 तो राहुल गांधी चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए।

प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल को लोकसभा में बोलना ही नहीं था।

आखिर प्रतिपक्ष के नेता के लोकतंत्र विरोधी आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा?

न राहुल गांधी माफी मांगेंगे और न मानसून सत्र चल पाएगा।
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29 जुलाई को कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में जो आचरण किया, उस से प्रतीत होता है कि वे चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए। राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस के सांसद नहीं है बल्कि प्रतिपक्ष के नेता भी है, इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे लोकतंत्र की परंपराओं के अनुरूप संसद में मर्यादित आचरण करें। प्रतिपक्ष के नेता का पद होने के कारण राहुल गांधी को लोकसभा में हर विषय पर बोलने का अधिकार है, लेकिन संसद की कार्यवाही बताती है कि राहुल गांधी जब भी बोलते हैं तो विवाद हो जाता है। 29 जुलाई को राहुल गांधी को लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर बोलना था, लेकिन उन्होंने शुरुआत ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमले के साथ की। राहुल ने कहा कि गत 20 जुलाई को जब कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ता जंतर मंतर से संसद भवन की ओर आ रहे थे, तब अतिम शाह ने गृह मंत्री के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए छात्रों पर गोलियां चलवा दी। स्वाभाविक था कि राहुल के इस कथन पर सत्तारूढ़ भाजपा के सांसद ने ऐतराज जताते। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, पहली बात तो छात्रों पर गोली चली ही नहीं और मौके पर हालातों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट और पुलिस के अधिकारियों की होती है। रिजिजू ने कहा कि राहुल गांधी को अपने झूठे कथन के लिए माफी मांगनी पड़ेगी। हंगाम के बीच संशोधन विधेयक को तो पारित कर दिया गया, लेकिन फिर लोकसभा का संचालन नहीं हो सका।

 
राहुल को तो बोलना ही नहीं था:
संसद में हंगामे के बाद थोड़ी ही देर में राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल  को संसद में बोलना ही नहीं था। राहुल गांधी ने कहा, उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया गया, इसलिए वे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने वीडियो के माध्यम से जिस तरह प्रेजेंटेशन दिया उस से जाहिर था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। राहुल गांधी तय करके गए थे कि उन्हें लोकसभा के बजाए प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात को रखना है। राहुल ने पूर्व नियोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर गोली चलाने के आरोप लगाए।
 
संसद निशाने पर:
राहुल गांधी 20 जुलाई के कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री शाह पर हमलावर है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट बता रही है कि कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च के प्रदर्शन में करीब तीन हजार अपराधी प्रवृत्ति के युवा शामिल थे। इन्हीं लोगों ने जंतर मंतर के धरने के दौरान देश विरोधी नारे लगाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भद्दी गालियां दी। पुलिस का प्रयास था कि कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ताओं को बैरिकेट्स लगाकर रोका जाए, लेकिन जब कार्यकर्ता नहीं रुके तो फिर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस के अधिकारियों का मानना रहा कि यदि बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जाता तो संसद पर हालात बिगड़ जाते। यानी देश विरोधी तत्व संसद में घुस सकते थे। क्या राहुल गांधी यहीं चाहते है कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए?

कब तक बर्दाश्त:
राहुल गांधी संसद में जो अमर्यादित आचरण कर रहे हैं उसे आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? सब जानते हैं कि कांग्रेस की वजह से ही संसद का गत बजट सत्र भी नहीं चल पाया था। इसी प्रकार शीतकालीन सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति के तहत ही अब चालू मानसून सत्र भी चल नहीं पाएगा। राहुल गांधी मांग कर रहे है कि केंद्रीय गृहमंत्री इस्तीफा दे, जबकि भाजपा के सांसद अब राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग कर रहे है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कह दिया है कि वे माफी नहीं मांगेंगे। सवाल उठता है कि आखिर राहुल गांधी के अमर्यादित आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? यह माना कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन देखा जा रहा है कि भारत में विपक्ष सिर्फ नकारात्मक भूमिका निभा रहा है। लोकतंत्र में हार जीत का फैसला चुनाव से होता है। कांग्रेस और विपक्षी दल चुनाव में लगातार हार रहे हैं। इस हार के कारण ही कई क्षेत्रीय दल राज्यों की सत्ता से बाहर हो गए है तथा लाख कोशिश के बाद भी कांग्रेस केंद्र में सरकार नहीं बना पा रही है। कहा जा सकता है कि बगैर राहुल गांधी और विपक्षी दलों के नेता छटपटा रहे हैं। यही वजह है कि संसद को भी चलने नहीं दिया जा रहा है। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 30-07-2026)

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तो राहुल गांधी चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए।

प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल को लोकसभा में बोलना ही नहीं था।

आखिर प्रतिपक्ष के नेता के लोकतंत्र विरोधी आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा?

न राहुल गांधी माफी मांगेंगे और न मानसून सत्र चल पाएगा।
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29 जुलाई को कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में जो आचरण किया, उस से प्रतीत होता है कि वे चाहते हैं कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए। राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस के सांसद नहीं है बल्कि प्रतिपक्ष के नेता भी है, इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे लोकतंत्र की परंपराओं के अनुरूप संसद में मर्यादित आचरण करें। प्रतिपक्ष के नेता का पद होने के कारण राहुल गांधी को लोकसभा में हर विषय पर बोलने का अधिकार है, लेकिन संसद की कार्यवाही बताती है कि राहुल गांधी जब भी बोलते हैं तो विवाद हो जाता है। 29 जुलाई को राहुल गांधी को लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर बोलना था, लेकिन उन्होंने शुरुआत ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमले के साथ की। राहुल ने कहा कि गत 20 जुलाई को जब कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ता जंतर मंतर से संसद भवन की ओर आ रहे थे, तब अतिम शाह ने गृह मंत्री के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए छात्रों पर गोलियां चलवा दी। स्वाभाविक था कि राहुल के इस कथन पर सत्तारूढ़ भाजपा के सांसद ने ऐतराज जताते। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, पहली बात तो छात्रों पर गोली चली ही नहीं और मौके पर हालातों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट और पुलिस के अधिकारियों की होती है। रिजिजू ने कहा कि राहुल गांधी को अपने झूठे कथन के लिए माफी मांगनी पड़ेगी। हंगाम के बीच संशोधन विधेयक को तो पारित कर दिया गया, लेकिन फिर लोकसभा का संचालन नहीं हो सका।
 
राहुल को तो बोलना ही नहीं था:
संसद में हंगामे के बाद थोड़ी ही देर में राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। प्रेस कॉन्फ्रेंस की रणनीति बताती है कि राहुल  को संसद में बोलना ही नहीं था। राहुल गांधी ने कहा, उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया गया, इसलिए वे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने वीडियो के माध्यम से जिस तरह प्रेजेंटेशन दिया उस से जाहिर था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। राहुल गांधी तय करके गए थे कि उन्हें लोकसभा के बजाए प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात को रखना है। राहुल ने पूर्व नियोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर गोली चलाने के आरोप लगाए।
 
संसद निशाने पर:
राहुल गांधी 20 जुलाई के कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री शाह पर हमलावर है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट बता रही है कि कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च के प्रदर्शन में करीब तीन हजार अपराधी प्रवृत्ति के युवा शामिल थे। इन्हीं लोगों ने जंतर मंतर के धरने के दौरान देश विरोधी नारे लगाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भद्दी गालियां दी। पुलिस का प्रयास था कि कॉकरोच पार्टी के कार्यकर्ताओं को बैरिकेट्स लगाकर रोका जाए, लेकिन जब कार्यकर्ता नहीं रुके तो फिर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस के अधिकारियों का मानना रहा कि यदि बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जाता तो संसद पर हालात बिगड़ जाते। यानी देश विरोधी तत्व संसद में घुस सकते थे। क्या राहुल गांधी यहीं चाहते है कि देश विरोधी तत्व संसद में घुस जाए?

कब तक बर्दाश्त:
राहुल गांधी संसद में जो अमर्यादित आचरण कर रहे हैं उसे आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? सब जानते हैं कि कांग्रेस की वजह से ही संसद का गत बजट सत्र भी नहीं चल पाया था। इसी प्रकार शीतकालीन सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति के तहत ही अब चालू मानसून सत्र भी चल नहीं पाएगा। राहुल गांधी मांग कर रहे है कि केंद्रीय गृहमंत्री इस्तीफा दे, जबकि भाजपा के सांसद अब राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग कर रहे है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कह दिया है कि वे माफी नहीं मांगेंगे। सवाल उठता है कि आखिर राहुल गांधी के अमर्यादित आचरण को कब तक बर्दाश्त किया जाएगा? यह माना कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन देखा जा रहा है कि भारत में विपक्ष सिर्फ नकारात्मक भूमिका निभा रहा है। लोकतंत्र में हार जीत का फैसला चुनाव से होता है। कांग्रेस और विपक्षी दल चुनाव में लगातार हार रहे हैं। इस हार के कारण ही कई क्षेत्रीय दल राज्यों की सत्ता से बाहर हो गए है तथा लाख कोशिश के बाद भी कांग्रेस केंद्र में सरकार नहीं बना पा रही है। कहा जा सकता है कि बगैर राहुल गांधी और विपक्षी दलों के नेता छटपटा रहे हैं। यही वजह है कि संसद को भी चलने नहीं दिया जा रहा है। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 30-07-2026)

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 एमडीएस यूनिवर्सिटी का सफर 38 वर्ष पहले दयानंद कॉलेज के हॉस्टल से शुरू हुआ था।

प्रो. रामवली उपाध्याय प्रथम कुलपति थे। वर्तमान कुलगुरु सुरेश अग्रवाल के नवाचारों की प्रदेशभर में गूंज।

एक अगस्त को 39वें स्थापना दिवस समारोह में राज्यपाल बागड़े शामिल होंगे।
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अजमेर स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (एमडीएसयू) एक अगस्त को अपना 39वां स्थापना दिवस धूमधाम से मना रहा है। इस विश्वविद्यालय के पास आज भले ही विशालतम संसाधन और संपत्तियां हो, लेकिन इसकी शुरुआत अजमेर के निजी क्षेत्र के दयानंद कॉलेज के हॉस्टल से हुई थी। तब सरकार के पास अजमेर में ऐसा कोई भवन नहीं था, जिसमें विश्वविद्यालय को संचालित किया जा सके। ऐसी स्थिति में सरकार को दयानंद कॉलेज के हॉस्टल को किराये पर लेना पड़ा। हास्टल के जिन कमरों में कभी विद्यार्थी रहते थे, उन्हीं कमरों में विश्वविद्यालय का संचालन किया गया। यह विश्वविद्यालय करीब कुछ वर्षों तक किराये के परिसर में ही चला। वर्ष 1990 में निकटवर्ती कायड़ ग्राम में विश्वविद्यालय को आवंटित भूमि पर दो तीन भवन निर्मित हुए और फिर इस विश्वविद्यालय को स्थानांतरित किया गया। आवंटित भूमि पर सबसे ज्यादा भवनों का निर्माण पीएल चतुर्वेदी के कुलपति रहते हुए हुआ। प्रो. चतुर्वेदी 12 जनवरी 1995 से 2 दिसंबर 1999 तक कुलपति रहे। यहां उल्लेखनीय है कि प्रो. पीएल चतुर्वेदी वर्तमान राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी के पिता थे। पहले इस विश्वविद्यालय का नाम अजमेर विश्वविद्यालय रखा गया, चूंकि अजमेर में स्वामी दयानंद का निर्वाण हुआ, इसलिए विश्वविद्यालय का नाम आगे चलकर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय रखा गया। आज गर्व के साथ कहा जा सकता है कि प्रदेश के उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जब विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई, तब प्रो. रामवली उपाध्याय प्रथम कुलपति बने। मौजूदा समय में प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल कुलगुरु के तौर पर कार्य कर रहे हैं। यह संयोग ही है कि प्रो. अग्रवाल का एक वर्ष का कार्यकाल हाल ही में पूरा हुआ है। प्रो. अग्रवाल ने अल्प अवधि में ही विश्वविद्यालय में जो नवाचार किए हैं, उसकी गूंज पूरे प्रदेश में है। कुलाधिपति और राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े भी प्रो. अग्रवाल की कार्यशैली की प्रशंसा कर चुके है। यदि सरकार ने प्रो. अग्रवाल के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया तो आने वाले दिनों प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया एक समान ही होगी। प्रो. अग्रवाल ने बताया कि 39वें स्थापना दिवस का मुख्य समारोह एक अगस्त को विश्वविद्यालय परिसर स्थित बृहस्पति भवन में प्रात: साढ़े 11 बजे होगा। इस समारोह के मुख्य अतिथि कुलाधिपति और राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े होंगे। जबकि विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और कैबिनेट मंत्री सुरेश सिंह रावत विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे। इस समारोह में विश्वविद्यालय के अब तक के सफर की विस्तृत जानकारी दी जाएगी। प्रो. अग्रवाल ने बताया कि स्थापना दिवस के समारोह की शुरुआत 31 जुलाई से ही हो रही है। इस दिन 108 दीपों से दीप यज्ञ और स्काई नॉर्टन के आयोजन होंगे। 3 अगस्त को आत्ममंथन दिवस, 4 अगस्त को विभागीय उपलब्धियों की प्रदर्शनी, पांच अगस्त को सांस्कृतिक एवं गुरु वंदन का कार्यक्रम, 6 अगस्त को विश्वविद्यालय की भावी  कार्य योजना और विकास पर मंथन होगा। 7 अगस्त को समापन समारोह आयोजित होगा। 



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 जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही आरएसएस के है तो फिर कुलपतियों के होने से क्या फर्क पड़ता है।

मनुस्मृति की आलोचना करते करते पचास वर्षों से सत्ता का सुख भोग रहे हैं खरगे।
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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने आरोप लगाया कि देश की शिक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा हावी है। देश की अधिकांश यूनिवर्सिटीज पर आरएसएस के कुलपतियों की नियुक्ति कर दी गई है। खडग़े ने आरएसएस को मनुस्मृति के विचारों से भी जोड़ दिया। खडग़े के आरोप अपनी जगह है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मादेी गर्व से कहते हैं कि वे संघ के स्वयं सेवक है। सवाल उठता है कि कुलपतियों के संघ का होने से क्या फर्क पड़ता है। संघ के बारे में खडग़े के विचार कुछ भी हो, लेकिन संघ की विचारधारा देश के स्वाभिमान से जुड़ी है। संघ की विचारधारा मे ंभारत के स्वय को प्राथमिकता दी जाती है। यानी आज भारत को गुलामी की परंपराओं की जरुरत नहीं है, इसलिए संघ की ओर से रानी अहिल्या बांध, संत कवि रविदास की जयंती वर्ष भर मनाई जा रही है। खडग़े मनुस्मृति की आलोचना करते है तो संघ की विचारधारा संत रविदास के विचारों को आगे बढ़ाती है। आज भारत को राजनी अहिल्या बाई और संत रविदास के विचारों की ही जरुरत है। मनुस्मृति की आलोचना करते करते खडग़े गत पचास वर्षों से सत्ता का सुख भोग रहे है। खडग़े पहले लोकसभा में प्रतिपक्ष   के नेता थे, लेकिन लोकसभा का चुनाव हार गए तो उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया गया और मौजूदा समय में खडग़े राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता है। प्रतिपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलता है। सनातन धर्म को लेकर खडग़े के कुछ भी विचार हो, लेकिन कांग्रेस ने खडग़े को राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना रखा है। गंभीर बात तो यह है कि मनुस्मृति के तथ्य भी खडग़े गलत प्रस्तुत करते हैं। खगड़े का उद्देश्य समाज में विद्वेष की भावना पैदा करना है। अच्छा हो कि खडग़े भी राजनी अहिल्या बाई और संत रविदास के विचारों को आगे बढ़ाए। 



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 डोटासरा, सचिन पायलट की तरह शालीन नहीं जो अशोक गहलोत की हर करतूत को बर्दाश्त कर लें।

6 साल में पहला अवसर जब डोटासरा ने गहलोत पर सीधा हमला किया। मालवीय को भी राजनीतिक हैसियत दिखाई।

चौथी बार गहलोत सरकार के नारों को क्यों नहीं रुकवाते पूर्व मुख्यमंत्री?
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राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सार्वजनिक तौर पर अनेक बार पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट के विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग किया, लेकिन हर बार पायलट ने शालीनता दिखाई और कहा कि गहलोत उनके पिता के समान है। पायलट ने कभी भी गहलोत को लेकर अभद्र टिप्पणी नहीं की। लेकिन गहलोत को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से पायलट जैसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। 30 जुलाई को जब कांग्रेस नेता महेंद्र जीत सिंह मालवीय अपने समर्थकों को लेकर पहले अशोक गहलोत के जयपुर आवास पर चले गए तो डोटासरा ने मीडिया के कैमरों के सामने गहलोत पर सीधा हमला किया। इतना ही नहीं गहलोत समर्थक मालवीय को उनकी राजनीतिक हैसियत भी दिखा दी। डोटासरा गत 6 वर्षों से प्रदेशाध्यक्ष है, लेकिन यह पहला अवसर है, जब डोटासरा ने गहलोत के कृत्य पर नाराजगी जताई। असल में मालवीय अपने गृह क्षेत्र बांसवाड़ा डूंगरपुर से 300 कार्यकर्ताओं को लेकर जयपुर आए और वादा किया कि यह सभी भारत आदिवासी पार्टी के कार्यकर्ता है और आम कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा को उम्मीद थी कि मालवीय कार्यकर्ताओं को सीधे प्रदेश कार्यालय में लाएंगे और फिर कांग्रेस की सदस्यता दिलाई जाएगी, लेकिन मालवीय कार्यकर्ताओं को लेकर पहले पूर्व सीएम गहलोत के सिविल लाइन स्थित सरकारी आवास पर पहुंच गए। यहां सभी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस का दुपट्टा पहनाया गया। मालवीय ने कहा कि हम सब अशोक गहलोत के साथ है। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं ने अशोक गहलोत की मौजूदगी में ही चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। मालवीय की इस कार्यवाही से जाहिर था कि उनका समर्पण जब चौथी बार गहलोत सरकार के नो लगा रहे है, तब कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में अध्यक्ष डोटासरा इंतजार कर रहे थे। डोटासरा को मालवीय का यह व्यवहार गलत लगा कि वे प्रदेश कार्यालय आने के बजाए पहले गहलोत के आवास पर चले गए। मालवीय जब अपने समर्थकों के साथ प्रदेश कार्यालय आए तो डोटासरा ने मीडिया के कैमरों के सामने नाराजगी जताई। डोटासरा ने मालवीय से कहा कि आप तो किसी नेता की ब्रांडिंग करने आए हैं, जबकि आपको पता है कि कांग्रेस को मजबूत करने का काम करना चाहिए। डोटासरा ने कहा कि व्यक्तिवादी राजनीति के कारण कांग्रेस को पहले ही काफी नुकसान हो चुका है। डोटासरा ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट का नाम लेते हुए कहा कि मैं हमेशा कांग्रेस को मजबूत करने का करता हूं, मैंने कभी भी अपने नाम की ब्रांडिंग नहीं करवाई। डोटासरा ने मालवीय से कहा कि कांग्रेस में आ मुझसे वरिष्ठ है, लेकिन आज आम मेरे पीछे खड़े है। मालवीय को यह नहीं भुलना चाहिए कि जब उन्होंने वर्ष 2024 में बांसवाड़ा डूंगरपुर संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था, तब मैंने चुनौती देकर मालवीय को हरवाया। आज मालवीय न सांसद है और न विधायक। यानी डोटासरा ने गहलोत पर हमला करने के साथ साथ मालवीय को भी राजनीतिक हैसियत दिखा दी। डोटासरा ने 30 जुलाई को जिस अंदाज में अपनी नाराजगी जताई, उसको लेकर अब राजस्थान में कांग्रेस का माहौल गर्म हो गया है। एक ओर कांग्रेस शहरी निकाय और पंचायती राज के चुनावों की तैयारियां कर रही है, तो वहीं प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा और पूर्व सीएम गहलोत के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। हालांकि डोटासरा की नाराजगी पर गहलोत ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन गहलोत को भी एहसास हो गया है कि डोटासरा, पायलट की तरह शालीनता नहीं दिखाएंगे। डोटासरा ने जो नाराजगी दिखाई उसे देखते हुए भविष्य में कांग्रेस का कोई नेता शायद ही अशोक गहलोत से इस तरह मुलाकात करे।

नारों को रोकते क्यों नहीं?:
मालूम हो कि गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। चूंकि राजस्थान में गत पांच बार से एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार बन रही है। इसलिए गहलोत की लालसा है कि वर्ष 2028 में जब कांग्रेस सरकार बने तो वे चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाए। यही वजह है कि गहलोत के समर्थक चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाते हैं। यदि गहलोत की लालसा न हो तो वे अपने समर्थकों को ऐसे नारे लगाने से मना कर रोक सकते हैं। जानकारों की मानें तो कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व पर दबाव डालने के लिए गहलोत चौथी बार के बारे लगाते हैं। 30 जुलाई को भी मालवीय के समर्थकों ने गहलोत के घर पर चौथी बार के नारे लगाए तो साफ प्रदर्शित हो रहा था कि इन नारों में गहलोत की सहमति है।

सत्ता के बगैर छटपटाहट:
महेंद्र जीत सिंह मालवीय लाखों रुपया खर्च कर 300 कार्यकर्ताओं को जयपुर इसलिए लाए ताकि कांग्रेस में उनका प्रभाव बढ़ सके, लेकिन मालवीय का यह दांव उल्टा पड़ गया। असल में मालवीय सत्ता के बगैर छटपटा रहे हैं। मालवीय ने कांग्रेस में रहते हुए बरसो तक सत्ता का सुख भोगा। वे स्वयं सांसद, विधायक और मंत्री रहे। जब वे कांग्रेस की गहलोत सरकार में मंत्री थे, तो  अपनी पत्नी रेशमा मालवीय को जिला प्रमुख बनवा दिया। कांग्रेस में इतना सुख भोगने के बाद मालवीय ने वर्ष 2024 में भाजपा का दामन थाम लिया। लेकिन भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मालवीय लोकसभा का चुनाव हार गए। इतना नहीं मालवीय बागीदौरा उप चुनाव में अपने साले को भाजपा का उम्मीदवार बनवाया। साला भी चुनाव हार गया। इसी वर्ष जनवरी माह में मालवीय ने भाजपा छोड़कर फिर से कांग्रेस जॉइन कर ली। मौजूदा समय में मालवीय और उनके परिवार का कोई भी सदस्य सांसद, विधायक, जिला प्रमुख नहीं है। पंचायती राज के चुनाव को देखते हुए मालवीय की नजर डूंगरपुर के जिला प्रमुख के पद पर लगी हुई है। वहीं भारत आदिवासी पार्टी की ओर से दावा किया गया है कि मालवीय के साथ जो 300 कार्यकर्ता जयपुर गए है उनका हमारी पार्टी से कोई संबंध नहीं है। ये वे ही लोग है जिने मालवीय भाजपा में ले गए थे। 



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Tuesday, 28 July 2026

 दिल्ली में कॉकरोचों के प्रदर्शन में गुंडई करने वालों पर कार्यवाही होगी।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्णय पर कॉकरोचों को ऐतराज।
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28 जुलाई को देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली में कॉकरोच  जनता पार्टी के प्रदर्शन में 20 जुलाई को जिन तत्वों ने कानून का उल्लंघन किया उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए सरकार स्वतंत्र है। देश के किसी भी नागरिक को कानून तोड़ने का अधिकार नहीं है, लेकिन इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि आंदोलन में शामिल किसी भी छात्र के विरुद्ध कोई कार्यवाही न हो। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम निर्णय से यह साफ हो गया है कि प्रदर्शन के दौरान 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान जिन तत्वों ने गुंडागर्दी की उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी। दिल्ली पुलिस ने कम्प्यूटर तकनीक से गुंडागर्दी करने वाले दो हजार युवाओं की पहचान की है। इनमें से कई तो आदतन अपराधी है। एक सुनियोजित षडय़ंत्र के तहत देश विरोधी तत्वों ने छात्र आंदोलन में घुसपैठ की। यानी ऐसे तत्वों ने छात्रों का ेचोला ओढ़कर माहौल को खराब किया। यदि इन तत्वों को सख्ती से नहीं रोका जाता तो संसद पर हमला हो सकता  था। गुंडों को नियंत्रित करने के दौरान ही अनेक छात्र भी पुलिस की चपेट में आ गए। पुलिस ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी छज्ञत्र के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी, लेकिन 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान जिन युवाओं ने गुंडागर्दी की उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कर सख्त से सख्त कार्यवाही करवाई जाएगी।

कॉकरोचों को ऐतराज:
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्णय पर कॉकरोच पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने ऐतराज जताया है, उनका कहना है कि सरकार के साथ जो समझौता हुआ, उसमें वायदा किया गया था कि आंदोलन में शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होगा, लेकिन अब ऐसा लगता है कि सरकार अपने वादे से मुकर रही है। सौरभ दास ने कहा कि पुलिस को आंदोलन में शामिल किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। सौरभ दास हा यह बयान बताता है कि कॉकरोच पार्टी गुंडागर्दी के पक्ष में है। सवाल उठता है कि जब आंदोलन नीट पेपर लीक को लेकर सिर्फ छात्रों का था तो फिर दिल्ली के जंतर मंतर पर देश विरोधी नारे कैसे लगे? 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हिंसा किन लोगों ने की? छात्रों की आड़ में हुई इस हिंसा में 250 पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस वाहनों को क्षतिग्रस्त भी किया गया। स्पष्ट है कि यह काम छात्रों का नहीं गुंडों का था और अब गुंडों को कॉकरोच पार्टी बचाना चाहती है। 


S.P.MITTAL BLOGGER ( 29-07-2026)

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 पंचायत और निकाय चुनाव में विलंब के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार।

एसआईआर से पहले की मतदाता सूची से होंगे चुनाव।

राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र में पांच करोड़ 43 लाख तथा शहरी क्षेत्र में एक करोड़ 2 लाख मतदाता।

निकाय चुनाव पहले करवाने का फैसला प्रशासनिक है।

राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने कहा कि मैं ज्यादा सामाजिक व्यक्ति नहीं हूं।
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फर्स्ट इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर और सीईओ पवन अरोड़ा (सेवानिवृत्त आईएएस) ने राजस्थान के निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह से सीधा संवाद किया है। इस संवाद में राजेश्वर सिंह ने प्रदेश में होने वाले पंचायतीराज और शहरी निकायों के चुनावों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। जब पवन अरोड़ा ने जानना चाहा कि इन चुनावों में विलंब के लिए कौन जिम्मेदार है तो राजेश्वर सिंह ने कहा कि चुनाव करवाने के लिए निर्वाचन आयोग ने कई पत्र राज्य सरकार को लिखे। इन पत्रों में सरकार से कहा गया कि एससी एसटी, ओबीसी और महिहलाओं के लिए आरक्षण की जानकारी उपलब्ध करवाई जाए, लेकिन सरकार ने समय रहते आरक्षण नहीं किया। संवैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत संबंधित वर्गों के लिए आरक्षण के बगैर निर्वाचन आयोग चुनाव की घोषणा नहीं कर सकता। संविधान में आरक्षण निर्धारित करने का अधिकार सरकार के पास ही है, इसलिए पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनाव में विलंब के लिए निर्वाचन आयोग जिम्मेदार नहीं है। वन स्टेट, वन इलेक्शन के सवाल पर राजेश्वर सिंह ने कहा कि यह कितनी बड़ी उपलब्धि है इसका पता आने वाले समय में लगेगा। पवन अरोड़ा ने जानना चाहा कि पंचायती राज से पहले शहरी निकायों के चुनाव कराने का फैसला क्या राज्य की भाजपा सरकार को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। इस पर राजेश्वर सिंह ने कहा कि यह एक प्रशासनिक फैसला है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या करीब पांच करोड़ 43 लाख है, इसलिए बाद में चुनाव करवाने का फैसला किया गया। जबकि शहरी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या 1 करोड़ 2 लाख है। शहरी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या कम होने े के कारण पहले चुनाव कराने का निर्णय लिया गया है। निर्वाचन आयोग यह नहीं देखता है कि चुनाव की प्रक्रिया से किस राजनीतिक दल को फायदा हो रहा है। आयोग का उद्देश्य निष्पक्ष चुनाव करवाना है। मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शिता के साथ होंगे। उन्होंने बताया कि शहरी निकायों के चुनाव 2 तथा पंचायत राज के चुनाव चार चरणों में होंगे। मतदाताओं की संख्या को देखते हुए केंद्रीय चुनाव आयोग और मध्यप्रदेश से ईवीएम मंगाई गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव बैलेट पेपर से होंगे। राजेश्वर सिंह ने उम्मीद जताई कि हाईकोर्ट ने चुनाव करवाने के लिए इसी वर्ष जो 15 नवंबर तक की डेडलाइन दी है, उसके अनुरूप प्रदेश में शहरी निकाय और पंचायती राज के चुनाव संपन्न हो जाएंगे। सरकार ने हाईकोर्ट में लिखित में दिया है कि 5 अगस्त तक ओबीसी आयोग की रिपोर्ट मिल जाएगी और 14 अगस्त तक एससी, एसटी, ओबीसी और महिला वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण कर दिया जाएगा। चुनाव आयोग ने पहले ही कहा है कि आरक्षण की रिपोर्ट मिलते ही तीन माह के अंदर अंदर चुनाव करवा लिए जाएंगे।

एसआईआर वाली सूची से चुनाव नहीं:
चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि मतदाता पुनरीक्षण वाली सूची से पंचायती राज और निकायों के चुनाव नहीं होंगे। सरकार का कहना है कि अभी एसआईआर के अंतिम आंकड़े नहीं आए हैं। इसलिए 1 जनवरी 2025 के डेटा के आधार पर ही चुनाव करवाए जाएंगे। लेकिन 18 वर्ष की उम्र वाले मतदाताओं के नाम जोड़ने का काम अभी भी जारी है। उन्होंने कहा कि जहां तक ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों के वार्डों के परिसीमन का सवाल है तो यह कार्य पहले ही हो चुका है। प्रदेश में 14 हजार 403 ग्राम पंचायत हैं।

ज्यादा सामाजिक नहीं:
राजेश्वर सिंह ने स्वीकार किया कि वे ज्यादा सामाजिक व्यक्ति नहीं है। यही वजह है कि कुछ लोग उनकी कार्यशैली से खुश नहीं है। लेकिन वे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति हैं। आईएएस की सेवा में रहते हुए भी उन्होंने अपने काम को प्राथमिकता दी। सरकारी नौकरी की व्यस्तता के बावजूद उनका साहित्य से लगाव रहा। यही वजह है कि उन्होंने अनेक कविताएं लिखी। साहित्य के प्रति रुचि उनकी पारिवारिक है। उनके पिता और दादा भी साहित्यकार रहे। चूंकि उनकी पढ़ाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हुई, इसलिए उन्हें दार्शनिक माहौल भी मिला। 


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आखिर नैतिकता दिखाते हुए केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी ने एक करोड़ की सब्सिडी लौटाई।

भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व संतुष्ट।
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आखिर अजमेर के भाजपा सांसद और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी ने नैतिकता दिखाते हुए एक करोड़ की सरकारी सब्सिडी लौटा दी। मालूम हो कि चौधरी ने कुचामन जिले के पीह गांव में स्थित अपने कृषि फार्म पर व्यावसायिक खेती के लिए राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से एक करोड़ रुपए की सब्सिडी प्राप्त की थी। कृषि मंत्री होने के नाते कृषि मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से सब्सिडी लेने पर जोरदार हंगामा हुआ। कांग्रेस ने मंत्री से इस्तीफे तक की मांग की, लेकिन तब चौधरी ने दृढ़ता के साथ कहा कि उन्होंने नियमों के अनुरूप आवेदन किया और सरकार से सब्सिडी ली। सरकार से सहायता वाला बोर्ड भी पीह के कृषि फार्म पर लगाया गया है। लेकिन विवाद के बाद यह मामला भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचा। चौधरी ने राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष भी अपने पक्ष को दृढ़ता के साथ रखा। जानकार सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय नेतृत्व ने माना कि चौधरी ने नियमों के अनुरूप सब्सिडी हासिल की है, लेकिन नैतिकता के नाते चौधरी को सब्सिडी नहीं लेनी चाहिए। थी। राष्ट्रीय नेतृत्व की सलाह पर ही चौधरी नैतिकता दिखाई और एक करोड़ रुपए की राशि वापस बैंक में जमा करवा दी। चौधरी ने बैंक अधिकारियों से आग्रह किया कि सब्सिडी की राशि को वापस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के खाते में जमा करवा दिया जाए। चौधरी के सब्सिडी वापस करने से अब सब्सिडी वाला मामला समाप्त हो गया है। इसके साथ ही चौधरी ने भी राहत की सांस ली है, क्योंकि जब मीडिया में सब्सिडी वाला मामला उजागर हुआ तो चौधरी के मंत्री पद को भी खतरा उत्पन्न हो गया था। 

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Sunday, 26 July 2026

 अजमेर में साम्प्रदायिक सौहार्द की भावना से निकलेगा ईद मिलादुन्नबी का जुलूस।

25 अगस्त को निकलने वाले जुलूस में सभी धर्मों के प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे।
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प्रतिवर्ष निकलने वाले ईद मिलादुन्नबी का जुलूस इस बार 25 अगस्त को साम्प्रदायिक सौहार्द की भावना से निकाला जाएगा। जुलूस की तैयारियों को सूफी इंटरनेशनल संस्था की ओर से 26 जुलाई को ख्वाजा साहब की दरगाह स्थित अकबरी मस्जिद में एक बैठक हुई। इस बैठक की अध्यक्ष खादिमों की संस्था अंजुमन मोइनिया फखरिया चिश्तिया के सचिव सैय्यद कलीमुद्दीन चिश्ती ने की।  बैठक में जुलूस के सफल संचालन, मार्ग व्यवस्था, अनुशासन, स्वच्छता, सुरक्षा तथा सामाजिक समरसता जैसे विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। सूफी इंटरनेशनल के सचिव नवाब हिदायतउल्ला ने बताया कि जुलूस में शामिल होने वाले सभी लोग प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करेंगे। जुलूस के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाएगा, यातायात व्यवस्था में सहयोग किया जाएगा तथा यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी नागरिक को असुविधा का सामना न करना पड़े। साथ ही सभी से अपील की गई कि जुलूस की गरिमा बनाए रखें और ऐसा कोई कार्य न करें जिससे समाज में गलत संदेश जाए। बैठक में इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि अजमेर हमेशा से गंगा-जमुनी तहज़ीब और कौमी एकता की मिसाल रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जुलूस में विभिन्न धर्मों एवं समाजों के प्रतिनिधियों को भी सम्मान आमंत्रित किया जाएगा, ताकि पैगंबर-ए-इस्लाम के अमन और इंसानियत के संदेश को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाया जा सके। बैठक में मौजूद प्रतिनिधियों ने विश्वास जताया कि इस वर्ष का 1501 वां जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी पूरी शान, अकीदत और  शहरवासियों के लिए भाईचारे सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेकर निकलेगा। अंत में सभी समाजों, संगठनों और शहरवासियों से अधिक से अधिक संख्या में जुलूस में शामिल होकर पैगंबर ए इस्लाम की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने तथा प्रेम, शांति और इंसानियत के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया। बैठक में सूफी इंटरनेशनल के अध्यक्ष हाजी सरवर सिद्दीकी,मौलाना अय्यूब कासमी, दरगाह कमेटी के सहायक नाजिम शादाब अहमद, काजी मुनव्वर अली, अनजुमन सदस्य गफ्फार काजमी,एहतेशाम चिश्ती, अब्दुल नईम खान, सैय्यद फ़ज़ले अमीन चिश्ती, हाजी इफ्तेखार चिश्ती,पूर्व पार्षद मुख्तार अहमद नवाब, मोहम्मद शाकिर खान, अहसान सुलतानी, सैय्यद अनवर चिश्ती,सैय्यद मसूद मोईनी, अहसान मिर्ज़ा, हुमायूं खान, सलीम कुरैशी, हाजी रईस कुरैशी, आरिफ हुसैन, बशीर खान कायम खानी , सैय्यद सलीम बना,सैय्यद गुलज़ार चिश्ती, अब्दुल जब्बार अब्बासी, अकबर घोसी,शेखजादा ज़ीशान चिश्ती,उमरदीन अब्बासी, अब्दुल शाहिद, अब्दुल हमीद, एस एम अकबर,बदरुद्दीन कुरैशी , हाफिज खान,अब्दुल सलाम,सुब्हानी, मोहम्मद इस्लाम, अशरफ अली, अब्दुल अजीज मुल्तानी,आइन हुसैन घोसी, साहिल घोसी, इकबाल कुरैशी, अस्नान कुरैशी,गयासुद्दीन चिश्ती, अल्ताफ ऊंटडा, जाहिद खान ,उस्मान घड़ियाली   बिलाल, हाफिज रमजान शेरानी, अल्ताफ हुसैन अंसारी, आदि मौजूद रहे  जुलूस के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नंबर 9413383786 पर नवाब हिदायतउल्ला से ली जा सकती है। 


S.P.MITTAL BLOGGER ( 27-07-2026)

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