Tuesday, 25 August 2026
Monday, 24 August 2026
अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की समझदारी से हादसा टला।
इसलिए पीएम मोदी ने दिमागी नक्सली की बात कही।
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राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र 20 अगस्त को शुरू हुआ। आमतौर पर सभी विधायक अपने वाहनों से विधानसभा के परिसर में प्रवेश करते है। पोर्च में वाहन से उतरने के बाद सदन में पैदल जाते हैं। लेकिन 20 अगस्त को कांग्रेस के विधायक पैदल विधानसभा के मुख्य द्वार पर पहुंचे। विधायकों के साथ बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता भी थे। इस भीड़ को देखते हुए विधानसभा के सुरक्षा गार्डों ने विधायकों को भी प्रवेश नहीं दिया। कांग्रेस के विधायक चाहते थे कि उनके साथ कार्यकर्ताओं को भी विधानसभा परिसर में घुसने दिया जाए। गंभीर बात तो यह थी कि विधायकों और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व टीकाराम जूली, कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट कर रहे थे। यह तीनों नेता भी विधायक है। जब विधायकों को कार्यकर्ताओं के साथ प्रवेश नहीं दिया गया तो सभी विधायक मुख्य द्वार के बाहर धरने पर बैठ गए। सवाल उठता है कि यदि कांग्रेस विधायकों को कार्यकर्ताओं के साथ घुसने दिया जाता तो विधानसभा परिसर का क्या हाल होता? क्या कांग्रेस के कार्यकर्ता शांत रहते? वैसे भी बिना अनुमति के कोई भी व्यक्ति परिसर में प्रवेश नहीं कर सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि 20 अगस्त को अध्यक्ष देवनानी ने सूझबूझ का परिचय दिया। यदि देवनानी समझदारी नहीं दिखाते तो 20 अगस्त को विधानसभा में बड़ा हादसा हो जाता। राजस्थान के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर रहा, जब विपक्षी दल के विधायकों ने भीड़ के साथ विधानसभा में घुसने का प्रयास किया। असल में कांग्रेस के विधायक सदन में जाना ही नहीं चाहते थे। इसे भी अफसोसनाक कहा जाएगा कि 20 अगस्त को जब विधानसभा में दिवंगत पूर्व विधायकों को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, तब विपक्ष का कोई विधायक उपस्थित नहीं था। जबकि दिवंगत पूर्व विधायकों में कांग्रेस के विधायक भी शामिल थे। यानी कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायकों के प्रति भी संवेदना नहीं दिखाई।
दिमागी नक्सली:
देश के राजनीतिक हालातों को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भले ही देश से नक्सलवाद समाप्त हो गया है, लेकिन कुछ नेता दिमागी नक्सली हो गए हैं, इसलिए संसद में गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया जा रहा है। मालूम हो कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने संसद का मानसून सत्र भी नहीं चलने दिया। कांग्रेस ने जो रवैया संसद में अपनाया वही रवैया राजस्थान विधानसभा में अपना रही है। विधानसभा के मानसून सत्र में कांग्रेस लगातार हंगामा करती रहेेगी। कांग्रेस के विधायकों ने 20 अगस्त को जो कृत्य किया वह दिमागी नक्सली वाला ही था। आने वाले दिनों में भी कांग्रेस का ऐसा ही कृत्य सामने आएगा।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 21-08-2026)
कांग्रेस के हाथों-हाथ लपका।
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10 वर्ष तक अजमेर के मेयर रहने वाले धर्मेन्द्र गहलोत ने 20 अगस्त को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। गहलोत ने यह इस्तीफा तब दिया, जब एक दिन पहले ही भाजपा के प्रदेश नेतृत्व में उन्हें नागौर नगर परिषद का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया था। गहलोत का आरोप है कि अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक और राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी आरोप के चलते उन्हें 18 अगस्त को स्वायत शासन विभाग ने दो प्रकरणों में नोटिस जारी किए है। एक प्रकरण मेयर रहते हुए का है। 13 नक्शों की स्वीकृति के मामले में जो नोटिस दिया गया है, उसमें कहा गया है कि क्यों न उन्हें 6 वर्ष तक नगरीय निकायों के पुनिर्वाचन के अयोग्य घोषित कर दिया जाए। गहलोत ने कहा कि जब उन्हें स्वयं को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित करने वाला नोटिस दिया जा रहा है तब वे नागौर में भाजपा के चुनाव प्रभारी की भूमिका कैसे निभा सकते है। गहलोत ने माना कि देवनानी के साथ उनके वैचारिक मतभेद है। नोटिस से नाराज गहलोत ने कहा कि वे किसी से भी डरने वाले नहीं है। वही भाजपा के शहर जिलाध्यक्ष रमेश सोनी ने कहा कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता। किसी के आने जाने से भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
कांग्रेस ने लपका:
पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का इस्तीफा ऐसे समय में हुआ, जब नगर निगम के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गहलोत के इस्तीफे में कांग्रेस अपना लाभ देख रही है। इसलिए कांग्रेस के नेताओं को गहलोत से सहानुभूति हो गई है। कांग्रेस के जो नेता कल तक भाजपा नेता के रूप में गहलोत की आलोचना करते थे, उनके विचार अचानक बदल गए है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने कहा कि भाजपा हमेशा डराने, धमकाने वाला काम करती है। गहलोत को भी डराने के लिए नोटिस दिलवाए गए हे। आरटीडीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ ने कहा कि गहलोत का इस्तीफा बताता है कि भाजपा में आंतरिक विरोध चरम पर है। भाजपा के नेता स्वयं ही सुरक्षित नहीं है। वही शहर उपाध्यक्ष एडवोकेट विवेक पाराशर ने कहा कि अब जब धर्मेन्द्र गहलोत ने भाजपा छोड़ दी है, तब कांग्रेस गहलोत के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि गहलोत सूझबूझ वाले राजनेता है। आवश्यकता होने पर गहलोत के साथ मिलकर नगर निगम चुनाव की रणनीति भी बनाई जाएगी। पाराशर ने कहा, गहलोत राजनेता के साथ साथ वकील भी है, इसलिए वकील समुदाय भी गहलोत के साथ खड़ा है। गहलोत को जो नोटिस दिया गया है, उसमें भी सभी वकील मिलकर गहलोत को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाएंगे।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 21-08-2026)
राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से किसी को भी मिलने नहीं दिया जा रहा।
प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली के इस कथन में कितनी सच्चाई है?
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राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली का आरोप है कि इन दिनों भाजपा में जबरदस्त रोष है। मंत्री किरोड़ी लाल मीणा और संजय शर्मा अपनी ही सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। वन राज्यमंत्री संजय शर्मा ने तो अलवर की जिला कलेक्टर श्रीमती अर्तिका शुक्ला पर लूट कर खाने का आरोप लगाया है। दोनों मंत्रियों के बयानों से प्रतीत होता है कि सरकार में भी असंतोष है। जूली ने कहा कि पूर्व सीएम और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे से भी किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा है। जूली का कहना है कि राजे के जयपुर के सिविल लाइन स्थित सरकारी आवास पर कड़ा पहरा है। सवाल उठता है कि जूली ने वसुंधरा राजे को लेकर जो बयान दिया है, उसमें कितनी सच्चाई है? क्या वाकई पूर्व सीएम को किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है? चौबीस घंटे गुजर जाने के बाद भी वसुंधरा राजे की ओर से जूली के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस से अटकलों का बाजार और गर्म हो गया है। मालूम हो कि हाल ही में राजे को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। राजे लंबे समय से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर आसीन हे। लेकिन उन्होंने कभी भी भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता नहीं दिखाई माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे अपनी भूमिका से संतुष्ट नहीं है। हालांकि अभी तक राजे ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं की है। अब प्रतिपक्ष के नेता जूली के बयान से राजे का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। देखना होगा कि जूली के बयान पर वसुंधरा राजे क्या प्रतिक्रिया देती हैं।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 20-08-2026)
जिन शहरी निकायों में 11 सितंबर को मतदान होगा, उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन अधिक मिलेंगे।
निर्वाचन आयोग हाईकोई की अवमानना के दायरे में नहीं।
पंचायतीराज में आरक्षण की लॉटरी नहीं निकालने वाला सवाल राजस्थान सरकार से पूछा जाए-राजेश्वर सिंह आयुक्त।
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राजस्थान में शहरी निकायों की 309 संस्थाओं के चुनाव 9 व 11 सितंबर को होंगे। राज्य के निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने 19 अगस्त को चुनाव की जो घोषणा की उसके अनुसार दो चरणों में होने वाले मतदान के नामांकन की प्रक्रिया 27 अगस्त से शुरू हो जाएगी। यानी वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवार 27 अगस्त से नामांकन शुरू कर देंगे। प्रदेश में भले ही दो चरणों में चुनाव हो रहे हो, लेकिन नामांकन की प्रक्रिया को एक समान रखा गया है। ऐसे में जिन निकायों में 11 सितंबर को मतदान होगा उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन अधिक मिलेंगे। जबकि जिन निकायों में 9 सितंबर को मतदान होगा उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन कम मिलेंगे। आमतौर पर मतदान से दो दिन पहले चुनावी सभाओं जैसा प्रचार बंद हो जाता है। निर्वाचन आयोग के अनुसार पहले चरण के मतदान में पांच हजार 550 और दूसरे चरण के मतदान में 4 हजार 695 पार्षद चुने जाएंगे। कुल 10 हजार 245 पार्षदों का निर्वाचन होना है। 14 सितंबर को परिणाम आने के बाद निकाय प्रमुखों के पद के लिए नामांकन 15 और 16 सितंबर को होगा तथा 21 सिंतबर को मतदान और उसी दिन परिणाम घोषित होगा।
आयोग अवमानना के दायरे में नहीं:
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने माना कि हाईकोर्ट ने 15 अगस्त तक शहरी निकाय और पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की लॉटरी निकालने के आदेश दिए थे। लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ शहरी निकायों की लॉटरी ही निकाली है, इसलिए आयोग ने शहरी निकायों के चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। आयुक्त ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की लॉटरी क्यों नहीं निकाली यह सवाल राज्य सरकार से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि लॉटरी निकालने का काम राज्य सरकार का है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लॉटरी नहीं निकलने पर हाई कोर्ट की अवमानना के दायरे में निर्वाचन आयोग नहीं आता है। आयोग तो चुनावों की घोषणा तभी कर सकता है, जब आरक्षण की रिपोर्ट आयोग को दी जाए। बगैर आरक्षण के आयोग चुनावों की घोषणा नहीं कर सकता। मालूम हो कि राज्य सरकार ने पंचायती राज चुनाव में आरक्षण की लॉटरी निकालने के लिए 17 अगस्त की तारीख निर्धारित की थी, लेकिन एक दिन पहले इस से एक माह के लिए टाल दिया गया। सरकार का कहना है कि अब 17 सितंबर को लॉटरी निकाल कर आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। सवाल उठता है कि हाईकोर्ट ने शहरी निकायों और पंचायती राज चुनाव के लिए 15 अगस्त तक आरक्षण का निर्धारण करने का आदेश दिया था, तब सरकार ने कोर्ट के आदेशों की पालना क्यों नहीं की। कहा जा रहा है कि अब हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की जाएगी। संभावित याचिका को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयुक्त ने पहले ही सरकार पर जिम्मेदारी डाल दी है।
आचार संहिता पर असमंजस:
निर्वाचन आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि आचार संहिता उन्हीं क्षेत्रों में प्रभावी होगी, जहां शहरी निकायों के चुनाव होने हैं। यानी ग्राम पंचायतों वाले क्षेत्रों में आचार संहिता लागू नहीं है। यही वजह है कि आचार संहिता के क्षेत्र को लेकर असमंजस रहेगा। हाल ही में जो परिसीमन हुआ उसमें ग्राम पंचायतों की कुछ सीमा शहरी निकायों में शामिल हुई है, ऐसे में आचार संहिता को प्रभावी बनाना निर्वाचन विभाग के लिए भी परेशानी का सबब बनेगा।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 20-08-2026)
बिना राजनीतिक संरक्षण के ऐसी हिमाकत नहीं हो सकती।
यह कृत्य डबल इंजन की सरकार को धमकाने वाला है।
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16 अगस्त को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राजस्थान के निंबाहेड़ा और अलवर से प्रदेश के 11 हजार 953 करोड़ कार्यों के लोकार्पण और शिलान्यास भी किए। अपने संबोधन में अमित शाह ने इन परियोजनाओं को डबल इंजन की उपलब्धि बताया। अमित शाह के साथ दोनों स्थानों पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी मौजूद रहे। केंद्रीय गृहमंत्री ने जिन योजनाओं का लोकार्पण किया उनमें अजमेर के करीब 68 करोड़ के कार्य भी शामिल रहे। लोकार्पण वाली सूची में अजमेर विकास प्राधिकरण का नवनिर्मित भवन भी है। इस भवन की लागत 25 करोड़ 98 लाख बताई जा रही है। चूंकि नए भवन का लोकार्पण 16 अगस्त को हो गया था, इसलिए उच्च स्तर पर निर्णय लिया गया कि मौजूदा पुराने भवन से नए भवन में शिफ्टिंग का काम 19 अगस्त से शुरू किया जाएगा। लेकिन 19 अगस्त को कुछ विभाग शिफ्ट होते इससे पहले ही भवन का निर्माण करने वाले ठेकेदार अरिहंत ने मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया। ठेकेदार ने कहा कि उसका दो करोड़ रुपया बकाया है, जब तक बकाया भुगतान नहीं हो जाता तब तक मुख्य द्वार पर ताला लगा रहेगा। ठेकेदार का आरोप रहा कि उसने एक वर्ष पहले ही नया भवन प्राधिकरण को सौंप दिया, लेकिन इसके बाद भी भुगतान नहीं हो रहा। 19 अगस्त को जब कुछ अधिकारी जयपुर रोड स्थित नए भवन पर पहुंचे तो दोनों मुख्य द्वारों पर ताला लगा हुआ था। गंभीर बात तो यह है थी कि मौके पर सुरक्षा गार्ड भी नहीं था। ऐसी स्थिति में अधिकारियों को ताले तुड़वाने पड़े। नवनिर्मित भवन पर ठेकेदार द्वारा ताले लगाने की घटना से पूरे प्रशासन में हड़कंप मच गया है।
राजनीतिक संरक्षण:
आमतौर पर ठेकेदारों का बकाया रहता ही है। अजमेर विकास प्राधिकरण के मामले में बताया जा रहा है कि फाइनल बिल के मात्र 2 करोड़ रुपए बकाया है। इंजीनियरों का तर्क है कि फाइनल बिल की राशि इसलिए रोकी गई है ताकि शिफ्टिंग के बाद कोई खामी हो तो उसी ठेकेदार से दूर करवाया जाए। प्राधिकरण के अधिकारी भी ठेकेदार के ताला लगाने के कृत्य को गलत माना हैं। माना जा रहा है कि ठेकेदार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, इसलिए उसने नवनिर्मित भवन पर ताला लगाने जैसी हिमाकत की है। ठेकेदार का यह कृत्य डबल इंजन की सरकार को धमकाने वाला भी है। यदि ठेकेदार ही सरकारी भवनों पर ताला लगाने लगेंगे तो फिर व्यवस्था चौपट हो जाएगी। अजमेर प्राधिकरण का मामला इसलिए भी गंभीर है कि नवनिर्मित भवन का लोकार्पण केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किया था।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 20-08-2026)
जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिंदू नहीं।
देशवासियों को इस मानसिकता को समझने की जरुरत।
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सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय कमेटी इन दिनों के देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में आए आबादी, असंतुलन बदलाव का अध्ययन कर रही है। यानी सीमावर्ती राज्यों में जो घुसपैठ हुई है उस पर रिपोर्ट तैयार की जा री है। प्राथमिक तौर पर जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी बस गए है। सरकारी रिकॉर्ड में इनकी संख्या करीब 10 हजार मानी गई है, जबकि हकीकत में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की संख्या बहुत ज्यादा है। चिंताजनक बात यह है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की मौजूदगी पर कश्मीरी मुसलमानों और पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथियों को कोई ऐतराज नहीं है, बल्कि इन विदेशी नागरिकों को कश्मीरी मुसलमान संरक्षण देते हैं। जानकारी के मुताबिक रोहिंग्या और बांग्लादेशी कश्मीर घाटी में इतने घुलमिल गए हैं कि अब फर्क नजर नहीं आता। इसके विपरीत कश्मीर घाटी में अभी भी हिंदुओं को खतरा बना हुआ है। कट्टरपंथियों के अत्याचारों के कारण ही 90 के दशक में चार लाख से ज्यादा हिंदुओं को कश्मीर से भागना पड़ा और अब आए दिन पाकिस्तानी आतंकी हिंदुओं को निशाना बनाते है। धर्म के आधार पर हिंदुओं की पहचान कर मौत के घाट उतार दिया जाता है। यानी जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिन्दू नहीं। देशवासियों को जम्मू कश्मीर की इस मानसिकता को समझना चाहिए। आज पूरे देश में जम्मू कश्मीर के नागरिक आसानी के साथ बिना डर के रह रहे हैं। किसी भी कश्मीरी मुसलमान के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है। सवाल उठता है कि जब कश्मीर के मुसलमान देश के किसी भी राज्य में रह सकते हैं तो हिंदू जम्मू कश्मीर में क्यों नहीं रह सकते? राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे विपक्षी नेता अकसर जम्मू कश्मीर के हालातों पर चिंता जताते हैं, लेकिन ऐसे नेता हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर चुप रहते हैं। यहां तक कि जम्मू कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती भी रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों के साथ ही खड़ी रहती है।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 19-08-2026)
राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र छोटा रखने पर कांग्रेस को ऐतराज।
सवाल-तो फिर अध्यक्ष देवनानी के प्रस्ताव पर अमल क्यों नहीं होता?
गहलोत के शासन में वर्ष में 30-32 बैठकें ही होती थी।
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20 अगस्त से शुरू हो रहे राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र को लेकर 18 अगस्त को राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक हुई। इस बैठक में अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सत्र के बारे में नेताओं को जानकारी दी। बैठक के बाद कांग्रेस विधायक दल के नेता टीकाराम जूली ने कहा कि सरकार मानसून सत्र को मात्र चार पांच दिन ही चलाना चाहती है। सरकार की मंशा से लगता है कि सरकार विधानसभा से भाग रही है । यदि मानसून सत्र अधिक दिनों तक चलेगा तो सदन में जनता से जुड़े मुद्दों को उठाया जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधानसभा की बैठक ज्यादा होनी चाहिए, इसलिए अध्यक्ष बनने के बाद देवनानी ने प्रस्ताव रखा था कि जिस प्रकार संसद के तीन सत्र होते हैं, उसी प्रकार विधानसभा के भी तीन सत्र हो ताकि बैठक ज्यादा हो सके। राजस्थान में अभी एक वर्ष में दो सत्र की ही परंपरा है। एक बजट सत्र और दूसरा मानसून। देवनानी का प्रस्ताव है कि संसद की तरह शीतकालीन सत्र भी हो। कांग्रेस जब मानसून सत्र की अवधि को लेकर नाराजगी जता रही है, तब सवाल उठता है कि अध्यक्ष देवनानी के प्रस्ताव पर अमल क्यों नहीं किया जाता? क्या कांग्रेस ने कभी यह प्रयास किया कि राजस्थान में भी विधानसभा के तीन सत्र हो? जहां तक कांग्रेस शासन में विधानसभा की बैठकों का सवाल है तो अशोक गहलोत के तीन बार के कार्यकाल में एक वर्ष में 30-32 ही बैठकें हो सकी। यानी कांग्रेस शासन में भी विधानसभा की बैठकों की संख्या बढ़ाने का काम नहीं हुआ। अब जब कांग्रेस विपक्ष में है तो विधानसभा की बैठक बढ़ाने की मांग कर रही है।विधानसभा का रिकॉर्ड बताता है कि इस वर्ष बजट सत्र में 24 बैठकें हो चुकी है। यानी कांग्रेस के शासन से मात्र 8 दिन कम है। अब जब 20 अगस्त से मानसून सत्र शुरू हो रहा है तो सरकार की मंशा इसे 25 अगस्त तक ही चलाने की है। चूंकि प्रदेश में पंचायती राज और शहरी निकायों के चुनाव हो रहे है, इसलिए विधानसभा सत्र को छोटा रखा गया है। चूंकि 6 माह की अवधि में विधानसभा सत्र बुलाने की अनिवार्यता है, इसलिए 20 अगस्त से विधानसभा बुलाई गई है। बजट सत्र में इसी वर्ष 28 जनवरी को शुरू हुआ था। ऐसे में 6 माह की अवधि को ध्यान में रखते हुए मानसून सत्र आहूत किया गया। चूंकि चुनाव के कारण सत्र छोटा है, इसलिए नवंबर माह में एक सत्र और बुलाया जाएगा। मानसून सत्र को लेकर भाजपा ने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। इस सत्र में सरकार की ओर से राजस्थान यूनिफॉर्म सिविल कोड और ट्रीज प्रोटेक्शन बिल प्रस्तुत किए जाएंगे। जबकि कांग्रेस ने बता दिया है कि जनता से जुड़े मुद्दों को उठाया जाएगा। कांग्रेस ने जिस तरह संसद के मानसून सत्र में हंगामा किया उसी प्रकार राजस्थान विधानसभा में भी कांग्रेस के विधायक हंगामा करेंगे। यानी संसद की तरह विधानसभा को भी बाधित किया जाएगा।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 19-08-2026)
फर्स्ट इंडिया न्यूज ग्रुप से शानदार विदाई।
राजस्थान के मीडिया क्षेत्र में बड़ा बदलाव।
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आईएएस की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद राजस्थान में मीडिया क्षेत्र में कदम रखने वाले पवन अरोड़ा अब सच बेधड़क अखबार और न्यूज चैनल को चमकाने का काम करेंगे। 18 अगस्त को अरोड़ा ने सच बेधड़क ग्रुप के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक का पद ग्रहण कर लिया। इससे पहले अरोड़ा को फर्स्ट इंडिया न्यूज चैनल ग्रुप की ओर से शानदार विदाई दी गई। इस ग्रुप के निदेशक वीरेंद्र चौधरी ने कहा कि गत तीन वर्षों में पवन अरोड़ा ने ग्रुप के सीईओ और मैनेजिंग एडिटर के पद पर रहते हुए ग्रुप को लोकप्रियता दिलवाने में काई कसर नहीं छोड़ी। वे भारी मन से पवन अरोड़ा को विदा कर रहे है, लेकिन साथ ही अरोड़ा के उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहे हैं। पवन अरोड़ा जहां भी रहेंगे, वहां उन्हें सफलता मिलेगा। अपने विदाई समारोह में अरोड़ा ने भी स्वीकार किया कि फर्स्ट इंडिया ग्रुप में उन्हें अपार स्नेह और सम्मान मिला। टीम भावना के कारण ही वे फर्स्ट इंडिया न्यूज चैनल को सर्वश्रेष्ठ बना सके। फर्स्ट इंडिया न्यूज चैनल को सर्वश्रेष्ठ बना सके। फर्स्ट इंडिया ग्रुप से विदाई के तुरंत बाद पवन अरोड़ा ने सच बेधड़क ग्रुप के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक का पद संभाल लिया। पद संभालते ही सच बेधड़क समूह से जुड़े पत्रकारों और प्रबंधन स्टाफ से अरोड़ा ने कहा कि बदलाव ही जीवन है। तीन वर्ष पहले जब उन्होंने आईएएस जैसे प्रतिष्ठित पद से स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति ली, तब यह कल्पना भी नहीं की थी कि मीडिया के क्षेत्र में इतनी सफलता मिलेगी, लेकिन उनके बड़े भाई और मीडिया क्षेत्र की प्रमुख हस्ती डॉ. जगदीश चंद्र के मार्गनिर्देशन में जो काम किया उसकी वजह से अपार सफलता मिली। अब नए समूह का चेयरमैन बनने के बाद मुझे उम्मीद है कि बड़े भाई साहब का आशीर्वाद मिलता रहेगा। पवन अरोड़ा ने कहा कि अब मीडिया के क्षेत्र में आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। इससे मीडिया कर्मियों का काम आसान हुआ है। सच बेधड़क दैनिक समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल में भी एआई का उपयोग किया जाएगा। राजस्थान के पाठकों और दर्शकों को मीडिया के क्षेत्र में अब सच बेधड़क के माध्यम से टेक्नोलॉजी के बदलाव देखने को मिलेंगे। सच बेधड़क न्यूज चैनल जल्द ही सैटेलाइट के सभी प्लेटफार्म पर जल्द देखने को मिलेगा। इसी प्रकार अखबार भी प्रदेश के हर पाठक को उपलब्ध होगा। अरोड़ा ने कहा कि उन्होंने विगत दिनों राजस्थानी भाषा का जो गणगौर न्यूज चैनल रि-लांच किया, वह भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस चैनल में भी एआई टेक्नोलॉजी का समावेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब हर पाठक और दर्शक नए अंदाज में अखबार और चैनल देखना चाहता है। हम पाठक और दर्शकों की उम्मीद पर खरा उतरेंगे। मेरा प्रयास रहेगा कि राजस्थान की जनता और सरकार के बीच सेतु बनकर काम करें।
Monday, 17 August 2026
ढाई वर्ष में ही जमीन से आसमान में पहुंच गए सतीश पूनिया।
वसुंधरा राजे का मान सम्मान बरकरार रखा।
मन्नालाल रावत अब आदिवासियों के बीच भाजपा की पैठ जमाएंगे।
साफ सुथरी छवि का लाभ मिला सीए राजेश मंगल को।
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजस्थान पर फोकस।
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने 17 अगस्त को जो कार्यकारिणी घोषित की है इसमें राजस्थान पर विशेष फोकस किया गया है। चूंकि राजस्थान में गत पांच बार से भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की अदला बदली हो रही है, इसलिए इस बार भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रयास है कि वर्ष 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता भाजपा के पास ही रहे। यही वजह है कि राजस्थान से केंद्र सरकार में चार मंत्रियों की मौजूदगी के बाद संगठन में भी प्रदेश के नेताओं को भी महत्व दिया गया है। इसका असर इसी वर्ष होने वाले शहरी निकाय और पंचायती राज चुनाव पर भी पड़ेगा।
जमीन से आसमान पर:
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया को महामंत्री बनाया गया है। सब जानते हैं कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे पूनिया ढाई वर्ष पहले विधानसभा का चुनाव हार गए थे। तब पूनिया जमीन पर आ गए थे। पूनिया का दर्द और बढ़ गया, जब भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में भी कोई पद नहीं मिला, लेकिन पूनिया ने धैर्य नहीं खाया और एक वर्ष बाद ही पूनिया को राजनीति में जमीन से थोड़ा उठने का मौका मिल गया। पूनिया को हरियाणा का प्रभारी बनाया और हरियाणा में भाजपा की फिर से सरकार बन गई। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में आने के बाद पूनिया को राजस्थान से राज्यसभा का सांसद बनाया गया। सांसद बनने के बाद अटकले लगाई गई कि पूनिया को केंद्र में मंत्री बनाया जाएगा। ऐसे अटकलों पर पूनिया ने स्वयं सख्ती से विराम लगाया। पूनिया को पता था कि राष्ट्रीय नेतृत्व उनका संगठन में ही उपयोग करेगा। जो पूनिया ढाई वर्ष पहले विधानसभा का चुनाव हार कर जमीन पर आ गए थे, वो ही पूनिया 17 अगस्त को भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री बनकर राजनीति के आसमान पर पहुंच गए है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पूनिया का भाजपा की राजनीति में दबदबा बढ़ा है। पूनिया की इस नियुक्ति से भाजपा को शहरी निकाय और पंचायती राज चुनाव में खासा फायदा होगा।
मान सम्मान बरकरार:
भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे का मान सम्मान बरकरार रखा है। नई कार्यकारिणी में राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखा है। अमित शाह जब भाजपा के अध्यक्ष थे, तब से ही राजे उपाध्यक्ष है। भले ही राजे ने उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति में कभी भी सक्रियता न दिखाई हो, लेकिन राजे के मान सम्मान को बरकरार रखा गया है। उपाध्यक्ष पद बरकरार रखने पर राजे ने अध्यक्ष नितिन नवीन का आभार जताया है। राजे के समर्थकों को अब इसी बात में खुश रहना होगा कि राजे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनी हुई है।
आदिवासियों में पैठ:
नई कार्यकारिणी में उदयपुर के भाजपा सांसद मन्नालाल रावत को एसटी मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। सांसद बनने से पहले रावत राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में सक्रिय थे। एसटी मोर्चे का अध्यक्ष बनने के बाद अब रावत पर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में भाजपा की पैठ जमाने की जिम्मेदारी आ गई है। प्रदेश में आदिवासी बाहुल्य बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ आदि क्षेत्रों में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) का खासा प्रभाव है। इस पार्टी का एक सांसद और चार विधायक है। देखना होगा कि रावत के नेतृत्व में अब प्रदेश में भाजपा का प्रभाव कैसे बढ़ता है।
साफ सुथरी छवि:
नई कार्यकारिणी में जयपुर के सीए राजेश मंगल को सह कोषाध्यक्ष बनाया गया है। कोषाध्यक्ष की जिम्मेदार केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के पास है। मंग लकी नियुक्ति के पीछे उनकी साफ सुथरी छवि है। मंगल की नियुक्ति कर भाजपा ने वैश्य समाज को प्रतिनिधित्व देने का काम किया है। पूर्व में रामदास अग्रवाल भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 18-08-2026)