विवाह जीवन में अनुशासन लाता है-मोहन भागवत, संघ प्रमुख।
पुत्री हो तो परिवार में अनुशासन और बढ़ जाता है।
सनातन संस्कृति में तो कन्यादान करने वाले माता-पिता को मोक्ष मिलने की मान्यता है।
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26 जुलाई को हैदराबाद में आयोजित विश्व मंगल्य सभा के समकालीन मातृत्व कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विवाह जीवन में अनुशासन लाता है और धर्म व जिम्मेदारी का भाव पैदा करता है। इसके विपरीत लिव इन रिश्तों में लोग जिम्मेदारी से बचकर केवल सुख चाहते हैं। लिव इन रिश्तों के दुष्परिणाम आज पूरी दुनिया देख रही है। पश्चिमी संस्कृति की अंधी नकल आधुनिकता नहीं बल्कि समाज का पतन है। संघ प्रमुख ने भारत की सनातन संस्कृति में विवाह पद्धति के महत्व के बारे में विस्तार से बताया। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज पश्चिम संस्कृति के पक्षधर लोग भी भारत की विवाह पद्धति की सराहना करने लगे है। यही वजह है कि रोजगार के लिए विदेश में गई भारतीय युवतियों को पश्चिमी देशों के युवा सनातन संस्कृति के अनुरूप विवाह कर रहे है। यानी भारत की विवाह पद्धति को दुनिया में स्वीकारा जा रहा है। सनातन संस्कृति के अनुरूप संपन्न विवाह के बाद जिस परिवार में पुत्री का जन्म होता है, वह परिवार और अनुशासित हो जाता है। पुत्री को देखते हुए माता पिता को भी अपनी जिम्मेदारी का ज्यादा अहसास होता है। हालांकि पुत्री के जन्म का फैसला सनातन संस्कृति में ईश्वर का माना जाता है। लेकिन हम यदि सिर्फ पुत्रों वाले परिवारों की तुलना पुत्री वाले परिवार से करे तो दोनों में फर्क नजर आएगा। यह भी देखा गया है कि पुत्री वाला परिवार ज्यादा सफलता और सरलता के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है। सनातन संस्कृति में तो मान्यता है कि कन्यादान करने वाले माता पिता को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हमारी संस्कृति में मोक्ष का बहुत महत्व है। कई बार मोक्ष प्राप्ति के लिए मनुष्य को अनेक जतन करने होते है, जबकि कन्यादान करने वाले माता पिता को सरलता के साथ मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। वो परिवार वाकई भाग्यशाली है जिनके यहां पुत्री का जन्म हुआ है ।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 27-07-2026)
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