जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिंदू नहीं।
देशवासियों को इस मानसिकता को समझने की जरुरत।
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सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय कमेटी इन दिनों के देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में आए आबादी, असंतुलन बदलाव का अध्ययन कर रही है। यानी सीमावर्ती राज्यों में जो घुसपैठ हुई है उस पर रिपोर्ट तैयार की जा री है। प्राथमिक तौर पर जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी बस गए है। सरकारी रिकॉर्ड में इनकी संख्या करीब 10 हजार मानी गई है, जबकि हकीकत में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की संख्या बहुत ज्यादा है। चिंताजनक बात यह है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की मौजूदगी पर कश्मीरी मुसलमानों और पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथियों को कोई ऐतराज नहीं है, बल्कि इन विदेशी नागरिकों को कश्मीरी मुसलमान संरक्षण देते हैं। जानकारी के मुताबिक रोहिंग्या और बांग्लादेशी कश्मीर घाटी में इतने घुलमिल गए हैं कि अब फर्क नजर नहीं आता। इसके विपरीत कश्मीर घाटी में अभी भी हिंदुओं को खतरा बना हुआ है। कट्टरपंथियों के अत्याचारों के कारण ही 90 के दशक में चार लाख से ज्यादा हिंदुओं को कश्मीर से भागना पड़ा और अब आए दिन पाकिस्तानी आतंकी हिंदुओं को निशाना बनाते है। धर्म के आधार पर हिंदुओं की पहचान कर मौत के घाट उतार दिया जाता है। यानी जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिन्दू नहीं। देशवासियों को जम्मू कश्मीर की इस मानसिकता को समझना चाहिए। आज पूरे देश में जम्मू कश्मीर के नागरिक आसानी के साथ बिना डर के रह रहे हैं। किसी भी कश्मीरी मुसलमान के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है। सवाल उठता है कि जब कश्मीर के मुसलमान देश के किसी भी राज्य में रह सकते हैं तो हिंदू जम्मू कश्मीर में क्यों नहीं रह सकते? राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे विपक्षी नेता अकसर जम्मू कश्मीर के हालातों पर चिंता जताते हैं, लेकिन ऐसे नेता हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर चुप रहते हैं। यहां तक कि जम्मू कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती भी रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों के साथ ही खड़ी रहती है।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 19-08-2026)
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