Monday, 24 August 2026

 

10 वर्ष अजमेर के मेयर रहने वाले धर्मेन्द्र गहलोत ने भाजपा छोड़ी।

कांग्रेस के हाथों-हाथ लपका।
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10 वर्ष तक अजमेर के मेयर रहने वाले धर्मेन्द्र गहलोत ने 20 अगस्त को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। गहलोत ने यह इस्तीफा तब दिया, जब एक दिन पहले ही भाजपा के प्रदेश नेतृत्व में उन्हें नागौर नगर परिषद का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया था। गहलोत का आरोप है कि अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक और राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी आरोप के चलते उन्हें 18 अगस्त को स्वायत शासन विभाग ने दो प्रकरणों में नोटिस जारी किए है। एक प्रकरण मेयर रहते हुए का है। 13 नक्शों की स्वीकृति के मामले में जो नोटिस दिया गया है, उसमें कहा गया है कि क्यों न उन्हें 6 वर्ष तक नगरीय निकायों के पुनिर्वाचन के अयोग्य घोषित कर दिया जाए। गहलोत ने कहा कि जब उन्हें स्वयं को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित करने वाला नोटिस दिया जा रहा है तब वे नागौर में भाजपा के चुनाव प्रभारी की भूमिका कैसे निभा सकते है। गहलोत ने माना कि देवनानी के साथ उनके वैचारिक मतभेद है। नोटिस से नाराज गहलोत ने कहा कि वे किसी से भी डरने वाले नहीं है। वही भाजपा के शहर जिलाध्यक्ष रमेश सोनी ने कहा कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता। किसी के आने जाने से भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

कांग्रेस ने लपका:
पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का इस्तीफा ऐसे समय में हुआ, जब नगर निगम के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गहलोत के इस्तीफे में कांग्रेस अपना लाभ देख रही है। इसलिए कांग्रेस के नेताओं को गहलोत से सहानुभूति हो गई है। कांग्रेस के जो नेता कल तक भाजपा नेता के रूप में गहलोत की आलोचना करते थे, उनके विचार अचानक बदल गए है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने कहा कि भाजपा हमेशा डराने, धमकाने वाला काम करती है। गहलोत को भी डराने के लिए नोटिस दिलवाए गए हे। आरटीडीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेन्द्र राठौड़ ने कहा कि गहलोत का इस्तीफा बताता है कि भाजपा में आंतरिक विरोध चरम पर है। भाजपा के नेता स्वयं ही सुरक्षित नहीं है। वही शहर उपाध्यक्ष एडवोकेट विवेक पाराशर ने कहा कि अब जब धर्मेन्द्र गहलोत ने भाजपा छोड़ दी है, तब कांग्रेस गहलोत के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि गहलोत सूझबूझ वाले राजनेता है। आवश्यकता होने पर गहलोत के साथ मिलकर नगर निगम चुनाव की रणनीति भी बनाई जाएगी। पाराशर ने कहा, गहलोत राजनेता के साथ साथ वकील भी है, इसलिए वकील समुदाय भी गहलोत के साथ खड़ा है। गहलोत को जो नोटिस दिया गया है, उसमें भी सभी वकील मिलकर गहलोत को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाएंगे। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 21-08-2026)

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 राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से किसी को भी मिलने नहीं दिया जा रहा।

प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली के इस कथन में कितनी सच्चाई है?
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राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली का आरोप है कि इन दिनों भाजपा में जबरदस्त रोष है। मंत्री किरोड़ी लाल मीणा और संजय शर्मा अपनी ही सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। वन राज्यमंत्री संजय शर्मा ने तो अलवर की जिला कलेक्टर श्रीमती अर्तिका शुक्ला पर लूट कर खाने का आरोप लगाया है। दोनों मंत्रियों के बयानों से प्रतीत होता है कि सरकार में भी असंतोष है। जूली ने कहा कि पूर्व सीएम और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे से भी किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा है। जूली का कहना है कि राजे के जयपुर के सिविल लाइन स्थित सरकारी आवास पर कड़ा पहरा है। सवाल उठता है कि जूली ने वसुंधरा राजे को लेकर जो बयान दिया है, उसमें कितनी सच्चाई है? क्या वाकई पूर्व सीएम को किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है? चौबीस घंटे गुजर जाने के बाद भी वसुंधरा राजे की ओर से जूली के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस से अटकलों का बाजार और गर्म हो गया है। मालूम हो कि हाल ही में राजे को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। राजे लंबे समय से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर आसीन हे। लेकिन उन्होंने कभी भी भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता नहीं दिखाई माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे अपनी भूमिका से संतुष्ट नहीं है। हालांकि अभी तक राजे ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं की है। अब प्रतिपक्ष के नेता जूली के बयान से राजे का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। देखना होगा कि जूली के बयान पर वसुंधरा राजे क्या प्रतिक्रिया देती हैं। 


S.P.MITTAL BLOGGER ( 20-08-2026)

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 जिन शहरी निकायों में 11 सितंबर को मतदान होगा, उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन अधिक मिलेंगे।

निर्वाचन आयोग हाईकोई की अवमानना के दायरे में नहीं।

पंचायतीराज में आरक्षण की लॉटरी नहीं निकालने वाला सवाल राजस्थान सरकार से पूछा जाए-राजेश्वर सिंह आयुक्त।
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राजस्थान में शहरी निकायों की 309 संस्थाओं के चुनाव 9 व 11 सितंबर को होंगे। राज्य के निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने 19 अगस्त को चुनाव की जो घोषणा की उसके अनुसार दो चरणों में होने वाले मतदान के नामांकन की प्रक्रिया 27 अगस्त से शुरू हो जाएगी। यानी वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवार 27 अगस्त से नामांकन शुरू कर देंगे। प्रदेश में भले ही दो चरणों में चुनाव हो रहे हो, लेकिन नामांकन की प्रक्रिया को एक समान रखा गया है। ऐसे में जिन निकायों में 11 सितंबर को मतदान होगा उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन अधिक मिलेंगे। जबकि जिन निकायों में 9 सितंबर को मतदान होगा उनके उम्मीदवारों को प्रचार के लिए दो दिन कम मिलेंगे। आमतौर पर मतदान से दो दिन पहले चुनावी सभाओं जैसा प्रचार बंद हो जाता है। निर्वाचन आयोग के अनुसार पहले चरण के मतदान में पांच हजार 550 और दूसरे चरण के मतदान में 4 हजार 695 पार्षद चुने जाएंगे। कुल 10 हजार 245 पार्षदों का निर्वाचन होना है। 14 सितंबर को परिणाम आने के बाद निकाय प्रमुखों के पद के लिए नामांकन 15 और 16 सितंबर को होगा तथा 21 सिंतबर को मतदान और उसी दिन परिणाम घोषित होगा।

आयोग अवमानना के दायरे में नहीं:
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने माना कि हाईकोर्ट ने 15 अगस्त तक शहरी निकाय और पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की लॉटरी निकालने के आदेश दिए थे। लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ शहरी निकायों की लॉटरी ही निकाली है, इसलिए आयोग ने शहरी निकायों के चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। आयुक्त ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की लॉटरी क्यों नहीं निकाली यह सवाल राज्य सरकार से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि लॉटरी निकालने का काम राज्य सरकार का है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लॉटरी नहीं निकलने पर हाई कोर्ट की अवमानना के दायरे में निर्वाचन आयोग नहीं आता है। आयोग तो चुनावों की घोषणा तभी कर सकता है, जब आरक्षण की रिपोर्ट आयोग को दी जाए। बगैर आरक्षण के आयोग चुनावों की घोषणा नहीं कर सकता। मालूम हो कि राज्य सरकार ने पंचायती राज चुनाव में आरक्षण की लॉटरी निकालने के लिए 17 अगस्त की तारीख निर्धारित की थी, लेकिन एक दिन पहले इस से एक माह के लिए टाल दिया गया। सरकार का कहना है कि अब 17 सितंबर को लॉटरी निकाल कर आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। सवाल उठता है कि हाईकोर्ट ने शहरी निकायों और पंचायती राज चुनाव के लिए 15 अगस्त तक आरक्षण का निर्धारण करने का आदेश दिया था, तब सरकार ने कोर्ट के आदेशों की पालना क्यों नहीं की। कहा जा रहा है कि अब हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की जाएगी। संभावित याचिका को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयुक्त ने पहले ही सरकार पर जिम्मेदारी डाल दी है।

 
आचार संहिता पर असमंजस:
निर्वाचन आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि आचार संहिता उन्हीं क्षेत्रों में प्रभावी होगी, जहां शहरी निकायों के चुनाव होने हैं। यानी ग्राम पंचायतों वाले क्षेत्रों में आचार संहिता लागू नहीं है। यही वजह है कि आचार संहिता के क्षेत्र को लेकर  असमंजस रहेगा। हाल ही में जो परिसीमन हुआ उसमें ग्राम पंचायतों की कुछ सीमा शहरी निकायों में शामिल हुई है, ऐसे में आचार संहिता को प्रभावी बनाना निर्वाचन विभाग के लिए भी परेशानी का सबब बनेगा। 

S.P.MITTAL BLOGGER ( 20-08-2026)

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अजमेर विकास प्राधिकरण के जिस नवनिर्मित भवन का लोकार्पण केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किया उस पर ठेकेदार ने ताला लगा दिया।

बिना राजनीतिक संरक्षण के ऐसी हिमाकत नहीं हो सकती।

यह कृत्य डबल इंजन की सरकार को धमकाने वाला है।
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16 अगस्त को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राजस्थान के निंबाहेड़ा और अलवर से प्रदेश के 11 हजार 953 करोड़ कार्यों के लोकार्पण और शिलान्यास भी किए। अपने संबोधन में अमित शाह ने इन परियोजनाओं को डबल इंजन की उपलब्धि बताया। अमित शाह के साथ दोनों स्थानों पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी मौजूद रहे। केंद्रीय गृहमंत्री ने जिन योजनाओं का लोकार्पण किया उनमें अजमेर के करीब 68 करोड़ के कार्य भी शामिल रहे। लोकार्पण वाली सूची में अजमेर विकास प्राधिकरण का नवनिर्मित भवन भी है। इस भवन की लागत 25 करोड़ 98 लाख बताई जा रही है। चूंकि नए भवन का लोकार्पण 16 अगस्त को हो गया था, इसलिए उच्च स्तर पर निर्णय लिया गया कि मौजूदा पुराने भवन से नए भवन में शिफ्टिंग का काम 19 अगस्त से शुरू किया जाएगा। लेकिन 19 अगस्त को कुछ विभाग शिफ्ट होते इससे पहले ही भवन का निर्माण करने वाले ठेकेदार अरिहंत ने मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया। ठेकेदार ने कहा कि उसका दो करोड़ रुपया बकाया है, जब तक बकाया भुगतान नहीं हो जाता तब तक मुख्य द्वार पर ताला लगा रहेगा। ठेकेदार का आरोप रहा कि उसने एक वर्ष पहले ही नया भवन प्राधिकरण को सौंप दिया, लेकिन इसके बाद भी भुगतान नहीं हो रहा। 19 अगस्त को जब कुछ अधिकारी जयपुर रोड स्थित नए भवन पर पहुंचे तो दोनों मुख्य द्वारों पर ताला लगा हुआ था। गंभीर बात तो यह है थी कि मौके पर सुरक्षा गार्ड भी नहीं था। ऐसी स्थिति में अधिकारियों को ताले तुड़वाने पड़े। नवनिर्मित भवन पर ठेकेदार द्वारा ताले लगाने की घटना से पूरे प्रशासन में हड़कंप मच गया है।
 
राजनीतिक संरक्षण:
आमतौर पर ठेकेदारों का बकाया रहता ही है। अजमेर विकास प्राधिकरण के मामले में बताया जा रहा है कि फाइनल बिल के मात्र 2 करोड़ रुपए बकाया है। इंजीनियरों का तर्क है कि फाइनल बिल की राशि इसलिए रोकी गई है ताकि शिफ्टिंग के बाद कोई खामी हो तो उसी ठेकेदार से दूर करवाया जाए। प्राधिकरण के अधिकारी भी ठेकेदार के ताला लगाने के कृत्य को गलत माना हैं। माना जा रहा है कि ठेकेदार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, इसलिए उसने नवनिर्मित भवन पर ताला लगाने जैसी हिमाकत की है। ठेकेदार का यह कृत्य डबल इंजन की सरकार को धमकाने वाला भी है। यदि ठेकेदार ही सरकारी भवनों पर ताला लगाने लगेंगे तो फिर व्यवस्था चौपट हो जाएगी। अजमेर प्राधिकरण का मामला इसलिए भी गंभीर है कि नवनिर्मित भवन का लोकार्पण केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किया था। 

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 जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिंदू नहीं।

देशवासियों को इस मानसिकता को समझने की जरुरत।
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सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय कमेटी इन दिनों के देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में आए आबादी, असंतुलन बदलाव का अध्ययन कर रही है। यानी सीमावर्ती राज्यों में जो घुसपैठ हुई है उस पर रिपोर्ट तैयार की जा री है। प्राथमिक तौर पर जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी बस गए है। सरकारी रिकॉर्ड में इनकी संख्या करीब 10 हजार मानी गई है, जबकि हकीकत में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की संख्या बहुत ज्यादा है। चिंताजनक बात यह है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की मौजूदगी पर कश्मीरी मुसलमानों और पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथियों को कोई ऐतराज नहीं है, बल्कि इन विदेशी नागरिकों को कश्मीरी मुसलमान संरक्षण देते हैं। जानकारी के मुताबिक रोहिंग्या और बांग्लादेशी कश्मीर घाटी में इतने घुलमिल गए हैं कि अब फर्क नजर नहीं आता। इसके विपरीत कश्मीर घाटी में अभी भी हिंदुओं को खतरा बना हुआ है। कट्टरपंथियों के अत्याचारों के कारण ही 90 के दशक में चार लाख से ज्यादा हिंदुओं को कश्मीर से भागना पड़ा और अब आए दिन पाकिस्तानी आतंकी हिंदुओं को निशाना बनाते है। धर्म के आधार पर हिंदुओं की पहचान कर मौत के घाट उतार दिया जाता है। यानी जम्मू कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह सकते हैं, लेकिन हिन्दू नहीं। देशवासियों को जम्मू कश्मीर की इस मानसिकता को समझना चाहिए। आज पूरे देश में जम्मू कश्मीर के नागरिक आसानी के साथ बिना डर के रह रहे हैं। किसी भी कश्मीरी मुसलमान के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है। सवाल उठता है कि जब कश्मीर के मुसलमान देश के किसी भी राज्य में रह सकते हैं तो हिंदू जम्मू कश्मीर में क्यों नहीं रह सकते? राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे विपक्षी नेता अकसर जम्मू कश्मीर के हालातों पर चिंता जताते हैं, लेकिन ऐसे नेता हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों  पर चुप रहते हैं। यहां तक कि जम्मू कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला  और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती भी रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों के साथ ही खड़ी रहती है। 


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