पशु पालन को कृषि की तरह मिले सुविधाएं
अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचन्द्र चौधरी सहित गांव-ढाणी में रहने वाले पशुपालकों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखकर मांग की है कि जिस प्रकार कृषि से जुड़े ग्रामीणों को सुविधाएं दी जाती है। उसी प्रकार पशुपालन से जुड़े ग्रामीणों को भी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
चौधरी के साथ-साथ दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों से जुड़े शुभकरण चौधरी, हरिराम, सुखपाल जाखड़, पप्पू सिंह भिचार, गणेश चौधरी आदि ने पत्र में पीएम मोदी को लिखा कि सरकार की अनदेखी की वजह से पशु पालन का व्यवसाय बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है। यदि सरकार ने पशुपालकों की मदद नहीं की तो कृषि आधारित इस व्यवसाय की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में अराजकता का माहौल हो जाएगा। आज भी देश की 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। सरकार ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। मनरेगा जैसी येाजनाएं भी ग्रामीणों को रोजगार दिलाने के लिए चलाई गई है, लेकिन इसके बावजूद भी ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है। पत्र में प्रधानमंत्री से कहा गया कि एक दुधारू पशु एक ग्रामीण को रोजगार उपलब्ध करवाता है। यदि सरकार पशुपालन को मदद करें तो ग्रामीण क्षेत्रों से बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो जाएगा। किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से जिस प्रकार कृषि के कार्य के लिए चार प्रतिशत की दर से किसानों को ऋण मिलता है, उसी प्रकार ग्रामीणों को पशुओं की खरीद पर भी ऋण मिलना चाहिए। यदि ग्रामीण पशु खरीदकर जीवन यापन करता है तो न केवल कृषि से जुड़़ी समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि देश के विकास में भी भागीदारी होगी।
पत्र में कहा गया कि हाल ही में सॉइल स्वास्थ कार्ड की योजना शुरू की गई है। यह इसलिए करनी पड़ी क्योंकि किसान भूमि को उपजाऊ करने के लिए कृत्रिम खाद का उपयोग करने लगा है। जबकि सब जानते हैं कि यदि जमीन में गोबर की खाद डाली जाए तो मिट्टी कभी भी खराब नहीं होगी। यह तभी संभव है, जब ग्रामीण क्षेत्रों में पशु पालन को बढ़ाया जाए। अब तो गाय और भैस के गोबर से गैस भी बनने लगी है। सरकार श्वेत क्रांति का नारा तो लगाती है, लेकिन आज तक भी दूध का समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं किया गया है। सरकार विभिन्न प्रकार के अनाज का तो समर्थन मूल्य निर्धारित करती है, लेकिन दूध का नहीं। जबकि दूध और दूध से बने उत्पाद की मांग भारत में ही नहीं दुनिया भर में है। निजी क्षेत्र के जो लोग दूध का कारोबार करते हैं। वे रातोंरात मालामाल हो रहे हैं। पत्र में इस बात पर अफसोस जताया गया कि सरकार पशुपालन को बढ़ावा देने के बजाए स्लॉटर हाऊस में पशुओं को काटने वाली मशीनों पर आयात शुल्क कम कर रही है, ताकि भारत में जगह-जगह विदेशी मशीनों वाले आधुनिक स्लॉटर हाऊस खुल सके। जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है, उसी देश में गाय का मांस खाने के लिए जिला और उपखंड स्तर पर स्लॉटर हाऊस खोले जा रहे हैं। गाय जैसे दुधारू पशुओं के मांस खाने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से कृषि का क्षेत्र पूरी तरह चरमरा रहा है। सरकार को स्लॉटर हाऊस खोलने के बजाए गाय जैसे दुधारू पशुओं की सुरक्षा करनी चाहिए। पत्र में सुझाव दिया गया कि पशुपालन को मनरेगा से जोड़ा जाए। गांव का जो युवक एक पशु पालने की जिम्मेदारी ले उसे मनरेगा के तहत मजदूरी दिलवाई जावे। यदि सरकार ने मनरेगा को पशुपालन से जोड़ दिया तो यह योजना अपने आप सफल हो जाएगी। पत्र में बताया गया कि सरकार पशुपालन को व्यवसाय मानकर अनेक सुविधाओं से वंचित करती है,जबकि पशुपालन तो कृषि से जुड़ा हुआ काम है। वर्ष 2003 में जब अजमेर में अकाल पड़ा था, तब पशु पालकों को चारा आदि खरीदने के लिए 13-13 हजार रुपए का ऋण दिया गया। सरकार ने किसानों का तो ऋण माफ कर दिया, लेकिन पशुपालकों का नहीं। आज यह राशि 50 हजार रुपए तक पहुंच गई है। वसूली के लिए सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक वाले पशु पालकों की जमीनों को निकाल रहे है। सरकार को किसानों और पशुपालकों के बीच इस भेदभाव को ही समाप्त करना है।
(एस.पी. मित्तल)(spmittal.blogspot.in) M-09829071511
Tuesday, 3 March 2015
पशु पालन को कृषि की तरह मिले सुविधाएं
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