शाकाहार के लिए जैन मुनि ही आंदोलन चलाएं
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की जयन्ती के समारोह में 13 मार्च को मुझे भी अतिथि बनने का सम्मान प्राप्त हुआ। जयन्ती समारोह अजमेर के पड़ाव क्षेत्र में स्थित आदिनाथ मार्ग पर हुआ। ध्वजारोहण, दीप प्रज्जवलन, स्वागत सत्कार आदि के बाद आचार्य विद्यासागर महाराज की शिष्या ब्रह्मचारिणी बबीता दीदी की जोशपूर्ण कविता और ब्रह्मचारिणी सरिता दीदी का उत्साह भरा प्रवचन हुआ। हालांकि प्रवचन के दौरान बरसात ने विध्न डाला लेकिन उपस्थित धर्मप्रेमियों ने माना कि स्वयं इन्द्रदेवता आज भगवान आदिनाथ पर मेहरबान है। इसमें कोई दोराय नहीं कि समाज में धर्म की पताका फहराने में जैन समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज में चाहे कितने भी धड़े हो लेकिन धार्मिक आयोजन होते ही रहते हैं। जैन मुनियों, आचार्यो आदि के संघ से जुड़े धर्मप्रेमी लोग भव्यता भी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। 13 मार्च को भगवान आदिनाथ की जयन्ती के समारोह में भी भारतीय संस्कृति के अनुरुप शाकाहार पर जोर रहा। इस मुद्दे पर मेरा यह मानना है कि यदि मांसाहार के खिलाफ और शाकाहार के पक्ष में देशव्यापी आंदोलन चलाया जाए तो उसकी अगुवाई जैन साधु संतों और आचार्य को करनी चाहिए। संपूर्ण समाज में यह आम धारणा है कि जैन साधु संत और आचार्य अपने शरीर के लिए जितना तप और संयम करते हैं उतना और कोई नहीं कर सकता। यदि इस समाज के साधु संत मांसाहार के खिलाफ आंदोलन करेंगे तो उसे निश्चित सफलता मिलेगी। एक तरफ मांसाहार के खिलाफ आंदोलन चलाया जाए तो दूसरी तरफ जैन साधु संत अपने प्रवचनों में शाकाहार का संकल्प दिलवावे। संकल्प यह भी होना चाहिए कि जैन समाज से जुड़ा कोई भी व्यक्ति न तो मांस खाएगा और न ही मांस का कारोबार करेगा। अक्सर यह आरोप लगता है कि देश में जो बड़े-बड़े कत्लखाने है उनके मालिक जैन समाज के है। साधु संतों को इस धारणा को भी समाप्त करना होगा। असल में जैन धर्म ही नहीं बल्कि संपूर्ण हिन्दू धर्म और सम्पूर्ण समाज को यह तय करना चाहिए कि शाकाहार को बढ़ावा मिले। अब तो वैज्ञानिक भी कहने लगे कि मांस खाने वाले के मुकाबले शाकाहारी व्यक्ति स्वस्थ रहकर ज्यादा समय तक जिंदा रहता है। मेरा मानना है कि मांस को किसी धर्म से नहीं जोडऩा चाहिए। हम मांस न खाए यह कोई हिन्दू संस्कृति नहीं है। मांस न खाकर जहां हम बेजुबान पशुओं को मरने से रोकते है वहीं अपने शरीर को भी स्वस्थ रखते है। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि जैन और हिन्दू धर्म से जुड़े लोग भी बड़ी संख्या में मांसाहारी हैं। जिस भारतीय संस्कृति में गाय को माता माना जाता हो उस संस्कृति के लोग यदि मांस खाए तो बेहद ही शर्मनाक बात है। बदलते परिवेश में जिस प्रकार भारतीय संस्कृति पर चौतरफा हमला हो रहा है उसमें यदि मांसाहार के खिलाफ आंदोलन चलाया जाएगा तो संस्कृति की भी रक्षा हो सकती है। अजमेर में विद्यासागर महाराज की दोनों शिष्या ब्रह्मचारिणी सरिता दीदी और बबीता दीदी विराजमान हैं। विद्यासागर महाराज ने अजमेर में ही दीक्षा ग्रहण की थी। सरिता दीदी और बबीता दीदी चाहे तो मांसाहार के खिलाफ अजमेर में ही आंदोलन की शुरूआत कर सकती है। भगवान आदिनाथ के जयन्ती समारोह में मुझे अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के लिए मैं विनीत जैन और समारोह के सभी आयोजकों का आभारी हूं। समारोह में राजीव शर्मा, आर.के. जैन, प्रकाश जैन और शहर के गणमान्य लोगों की उपस्थित भी प्रभावी रही।
(एस.पी. मित्तल)(spmittal.blogspot.in) M-09829071511
Sunday, 15 March 2015
शाकाहार के लिए जैन मुनि ही आंदोलन चलाएं
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http://www.newsview.in/reviews/38331
ReplyDeleteमासाहार पुरे जैन लोगो ने ग्रहण करना चाहिए क्यू की वो सिर्फ 35 लाख लोग बचे । इनकी शाकाहार से प्रजनन क्षमता ही कम हो गयी इसलिए जैन धर्म यह नष्ट होने के रह पर है
ReplyDeleteमासाहार पुरे जैन लोगो ने ग्रहण करना चाहिए क्यू की वो सिर्फ 35 लाख लोग बचे । इनकी शाकाहार से प्रजनन क्षमता ही कम हो गयी इसलिए जैन धर्म यह नष्ट होने के रह पर है
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