Wednesday, 27 April 2016

40 हजार की रिश्वत लेते एडीए उपायुक्त के.के.गोयल गिरफ्तार।



यह रिश्वतखोरी अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा के लिए भी चुनौती है। 
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27 अप्रैल को दिन दहाड़े 40 हजार रुपए की रिश्वत लेते अजमेर विकास प्राधिकरण के उपायुक्त के.के.गोयल (आरएएस) को एसीबी ने रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। एसीबी के एएसपी राममूर्ति जोशी ने बताया कि आदर्श नगर में एक भूखंड के नियमन के लिए गोयल ने 60 हजार रुपए की मांग की थी। 20 हजार रुपए लेने के बाद 27 अप्रैल को 40 हजार रुपए की दूसरी किश्त ली जा रही थी, तब गोयल को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया। जोशी ने बताया कि गोयल के दलाल रोहित जैन और विनोद जोशी ने ही पहले रिश्वत की राशि एडीए के कार्यालय में ही ली और फिर जब यह राशि गोयल को दी गई तो सभी लोग गिरफ्त में आ गए। यह रिश्वत भूखंड मलिक फहजान हसन से ली जा रही थी। एसीबी ने जिस तरह एडीए परिसर में ही रिश्वतखोर दलालो और उपायुक्त को पकड़ा है, वह अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा के लिए भी चुनौती है। हेड़ा यह कह कर नहीं बच सकते कि इस रिश्वतखोरी से उनका कोई सरोकार नहीं है। घर में यदि कोई गड़बड़ी होती है तो मुखिया ही जिम्मेदार होता है। आज की घटना से साफ जाहिर है कि एडीए में खुलेआम रिश्वतखोरी हो रही है। दलालों और भ्रष्ट अफसरों का इतना नंगा नाच है कि दलाल एडीए परिसर में ही रिश्वत लेकर सरकारी कक्ष में ही अफसरों को धनराशि दे रहे हैं। यदि अध्यक्ष हेड़ा का डर होता तो के.के.गोयल उपायुक्त के कक्ष में ही रिश्वत लेने की हिम्मत नहीं करते। यह माना कि गोयल ने जो 60 हजार रुपए की रिश्वत ली, उसका हिस्सा हेड़ा तक नहीं पहुंच रहा, लेकिन यह बात तो तय है कि हेड़ा के कार्यकाल में जो प्रशासनिक व्यवस्था है उसमें रिश्वत ली जा सकती है। हेड़ा को यदि एडीए में रिश्वतखोरी रोकनी है तो उन्हें कामकाज में पारदर्शिता लानी होगी। भूखंड नियमन के नियम बने हुए हैं, लेकिन अधिकारी बेवजह लोगों को परेशान करते हैं, इसलिए परेशान व्यक्ति रिश्वत देने के लिए मजबूर होता है। यदि किसी क्षेत्र में एक भूखंड का नियमन हो गया है तो फिर उस क्षेत्र के अन्य भूखंडों का नियमन होना ही चाहिए। रिश्वतखोर अधिकारी नियमनशुदा भूखंड के पास वाले भूखंड का नियमन करने के लिए भी राशि वसूलते हैं। हेड़ा को चाहिए कि वे एडीए में ऐसा सिस्टम लागू करें, जिसमें आम लोगों के काम सरलता के साथ हो सके। हेड़ा के सामने दो पूर्ववर्ती अध्यक्ष धर्मेश जैन और नरेन शाहनी के उदाहरण हैं। दलालों की वजह से ही यह दोनों अपना तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। धर्मेश जैन सीडी कांड में और नरेन शाहनी नियमन के मामलों में ही मात्र दो-दो वर्ष की अवधि में घर चले गए। जैन की वजह से भाजपा को और शाहनी की वजह से कांग्रेस को नीचा देखना पड़ा। आज एडीए के अंदर जो रिश्वतखोरी पकड़ी गई है, उसे हेड़ा और राज्य की भाजपा सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। उम्मीद है कि हेड़ा धर्मेश जैन और नरेन शाहनी जैसे हालात बनने नहीं देंगे। 

नोट- फोटोज मेरे ब्लॉग spmittal.blogspot.in तथा फेसबुक अकाउंट पर देखें। 

(एस.पी. मित्तल)  (27-04-2016)
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