Wednesday, 24 December 2014

कश्मीर और झारखंड के नतीजो से सबक ले नरेन्द्र मोदी

कश्मीर और झारखंड के नतीजो से सबक ले नरेन्द्र मोदी
भाजपा अब पूरी तरह पीएम नरेन्द्र मोदी पर निर्भर है। भाजपा की सफलता और विफलता भी मोदी के भरोसे ही है। इसलिए भाजपा के राजनीतिक विश्लेषण के बजाए मोदी का ही विश्लेषण होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा के चुनावों के नतीजों से मोदी को सबक लेने की जरूरत है। लोकसभा से लेकर कश्मीर तक के चुनावों में मोदी ने बार-बार कहा सबका साथ सबका विकास तथा सवा सौ करोड़ भारतीयों के विकास का लक्ष्य है। अपने इन कथनों पर भरोसा दिलाने के लिए मोदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन फिर भी दोनों राज्यों में मोदी की उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं आए। झारखंड में 81 में से 42 सीटे और कश्मीर में 87 में से मात्र 25 सीटे मिलने से जाहिर है कि मतदाताओं ने मोदी के कथन पर भरोसा नहीं किया है। सवाल यह नहीं है कि कश्मीर में मुसलमान है तो झारखंड में पूर्व सीएम हेमन्त शेरोन के आदिवासी समर्थक? सवाल यह है कि जब मोदी सबका साथ सबका विकास की बात कह रहे हंै तो फिर भाजपा को वोट क्यों नही मिल रहे?  जो सफलता लोकसभा चुनावों में इन राज्यों में मिली थी उतनी सफलता विधानसभा के चुनावों में नहीं मिली। ऐसा नहीं कि मोदी ने कश्मीर में मुसलमानों का दिल जीतने की कोशिश नहीं की। बाढ़ के समय एक हजार करोड़ रुपए दिए थे। थोड़े ही दिन बाद दीपावली के पर्व पर गुजरात या दिल्ली न रहने की वजह कश्मीर में बाढ़ पीडि़तों के बीच चले गए। मोदी ने अपनी ओर से यह भरोसा दिलाने की कोशिश की वह सिर्फ हिन्दुओं के पीएम नहीं है, बल्कि उनकी नजर में मुसलमानों की भी मुसीबत पहले है। लेकिन इसके बावजूद भी कश्मीर घाटी में भाजपा का एक विधायक भी चुनाव नहीं जीत सका। मुसलमानों के वोट लेने के लिए भाजपा ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, लेकिन ऐसे सभी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए। लोकतंत्र की दुहाई देकर जम्मू-कश्मीर के नतीजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर मोदी के सबका साथ-सबका विकास के कथन पर भरोसा क्यों नहीं किया जा रहा है?  झारखंड में भले ही कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया हो, लेकिन जेएमएम की 18 सीटे बताती है कि आदिवासी क्षेत्र के लोग भी मोदी के कथन पर भरोसा नहीं कर पा रहे है। जम्मू-कश्मीर में तो हिन्दू मुस्लिम मतदाता एक तरह से आमने-सामने है। पीडीपी को 28 सीटे मिलने से प्रतीत होता है कि इन चुनावों में वे ताकते सक्रिय रही जो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ है। 25 सीटे हांसिल कर भाजपा को जश्न मनाने की जरूरत नहीं है क्योंकि सवाल देश की एकता और अखण्डता का है। अब भाजपा की ओर से पीडीपी के समक्ष तीन-तीन वर्ष की सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। यानि 6 में से 3 वर्ष पीडीपी और 3 वर्ष भाजपा की सरकार बनेगी। पहले तीन वर्ष में महबूबा मुफ्ती ही पीडीपी की सरकार बनाएगी, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि तीन वर्ष बाद जब भाजपा की बारी आएगी तब महबूबा मुफ्ती भाजपा की सरकार बनाने में अपना समर्थन देगी। भाजपा के सामने उत्तर प्रदेश में मायावती का उदाहरण है जहां मायावती ने भाजपा के समर्थन से ढाई वर्ष बसपा की सरकार चला ली, जब भाजपा की बारी आई तो समर्थन देने से इंकार कर दिया। कश्मीर में भाजपा को तीन वर्ष का फार्मूला तभी लागू करना चाहिए जब पहले चरण में भाजपा की सरकार हो पीडीपी समर्थन दे। नए वर्ष में बिहार और दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होंगे। भाजपा के नेता बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा कर रहे है, लेकिन सवाल यह भी है कि पड़ौसी राज्य झारखंड में जो नतीजे आए है इनसे बिहार में पूर्ण बहुमत की उम्मीद लगाई जा सकती है?  झारखंड में यदि गठबंधन में शामिल दलों का समर्थन न मिले तो भाजपा यहां भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। जब झारखंड में ही यह हाल है तो फिर बिहार में बहुमत का दावा कैसे किया जा रहा है? बिहार में सभी विपक्षी दल मिलकर भाजपा को चुनौती दे रहे है।
-(एस.पी.मित्तल)(spmittal.blogspot.in)

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