जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही आरएसएस के है तो फिर कुलपतियों के होने से क्या फर्क पड़ता है।
मनुस्मृति की आलोचना करते करते पचास वर्षों से सत्ता का सुख भोग रहे हैं खरगे।
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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने आरोप लगाया कि देश की शिक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा हावी है। देश की अधिकांश यूनिवर्सिटीज पर आरएसएस के कुलपतियों की नियुक्ति कर दी गई है। खडग़े ने आरएसएस को मनुस्मृति के विचारों से भी जोड़ दिया। खडग़े के आरोप अपनी जगह है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मादेी गर्व से कहते हैं कि वे संघ के स्वयं सेवक है। सवाल उठता है कि कुलपतियों के संघ का होने से क्या फर्क पड़ता है। संघ के बारे में खडग़े के विचार कुछ भी हो, लेकिन संघ की विचारधारा देश के स्वाभिमान से जुड़ी है। संघ की विचारधारा मे ंभारत के स्वय को प्राथमिकता दी जाती है। यानी आज भारत को गुलामी की परंपराओं की जरुरत नहीं है, इसलिए संघ की ओर से रानी अहिल्या बांध, संत कवि रविदास की जयंती वर्ष भर मनाई जा रही है। खडग़े मनुस्मृति की आलोचना करते है तो संघ की विचारधारा संत रविदास के विचारों को आगे बढ़ाती है। आज भारत को राजनी अहिल्या बाई और संत रविदास के विचारों की ही जरुरत है। मनुस्मृति की आलोचना करते करते खडग़े गत पचास वर्षों से सत्ता का सुख भोग रहे है। खडग़े पहले लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता थे, लेकिन लोकसभा का चुनाव हार गए तो उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया गया और मौजूदा समय में खडग़े राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता है। प्रतिपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलता है। सनातन धर्म को लेकर खडग़े के कुछ भी विचार हो, लेकिन कांग्रेस ने खडग़े को राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना रखा है। गंभीर बात तो यह है कि मनुस्मृति के तथ्य भी खडग़े गलत प्रस्तुत करते हैं। खगड़े का उद्देश्य समाज में विद्वेष की भावना पैदा करना है। अच्छा हो कि खडग़े भी राजनी अहिल्या बाई और संत रविदास के विचारों को आगे बढ़ाए।
S.P.MITTAL BLOGGER ( 31-07-2026)
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