Thursday, 3 July 2025
अब यदि हाईकोर्ट एसआई भर्ती की परीक्षा रद्द करता है तो चयनित ईमानदार थानेदारों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का बहुत आधार है। सबसे बड़ी गवाही तो भजन सरकार की ही होगी।
1 जुलाई को हाईकोर्ट में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि कांग्रेस के शासन में हुई सब इंस्पेक्टर पुलिस भर्ती परीक्षा 2021 को रद्द नहीं किया जाएगा। सरकार के इस शपथ पत्र के बाद जस्टिस समीर जैन ने मामले की सुनवाई के लिए 7 जुलाई की तारीख निर्धारित की है। माना जा रहा है कि जस्टिस जैन 7 जुलाई को परीक्षा को रद्द करने अथवा नहीं करने के बारे में फैसला सुनाएंगे। परीक्षा के अनेक अभ्यर्थियों ने परीक्षा को रद्द करने की याचिका प्रस्तुत कर रखी है। यह वही बहुचर्चित एसआई भर्ती परीक्षा है, जिसको लेकर कांग्रेस शासन में भाजपा नेताओं ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन अब सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार का कहना है कि परीक्षा में जिन अभ्यर्थियों ने बेईमानी की उन्हें परीक्षा प्रक्रिया से बाहर कर दिया है। ऐसे बेईमान अभ्यर्थी मात्र 6 प्रतिशत ही है। इसलिए पूरी परीक्षा को रद्द कर 94 प्रतिशत चयनित ईमानदार थानेदारों को सजा नहीं दी जा सकती। सरकार की ओर से कहा गया है कि चयनित थानेदारों में से 312 पहली बार किसी नौकरी में आए हैं, जबकि 550 ऐसे चयनित थानेदार है जो पूर्व में किसी न किसी पद पर कार्यरत थे। थानेदार के पद पर चयन होने के बाद ऐसे 550 अभ्यर्थियों ने पूर्व की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अब यदि यह परीक्षा रद्द की जाती है तो ऐसे अभ्यर्थियों के साथ कुठाराघात होगा। सरकार ने शपथ पत्र देकर कहा के एसआईटी की जांच में जिन अभ्यर्थियों को निर्दोष माना गया है उन्हें ही थानेदार के पद पर नियुक्ति दी जा रही है। जिन अभ्यर्थियों ने राजस्थान लोक सेवा आयोग से प्रश्न पत्र हासिल कर परीक्षा दी, या डमी परीक्षार्थी के माध्यम से परीक्षा पास की उन सभी की पहचान कर ली गई है। ऐसे 55 चयनित अभ्यर्थियों से थानेदार बनने का सर्टिफिकेट छीन लिया गया है। सरकार ने हाईकोर्ट में परीक्षा रद्द न करने को लेकर जो तर्क दिए है उससे साफ जाहिर है कि अब यदि हाईकोर्ट परीक्षा को रद्द करता है तो चयनित थानेदारों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का बड़ा आधार होगा। सबसे बड़ी गवाही तो खुद राज्य की भजन सरकार की होगी। यह बात अलग है कि पूर्व में जांच एजेंसी एसओजी पुलिस मुख्यालय और कैबिनेट सब कमेटी ने परीक्षा को रद्द करने की सिफारिश की थी, लेकिन रद्द करने वाली सभी सिफारिशों को दरकिनार कर मुख्यमंत्री कार्यालय ने परीक्षा को रद्द करने से इंकार कर दिया। सरकार का अब कहना है कि कांग्रेस के शासन में इन परीक्षा में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं हुई है।
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पर्यटन को घरेलू उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं। इसमें महिलाओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण। ललित के पंवार ने रखे नीति आयोग में सुझाव।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अध्यक्षता वाले नीति आयोग की पर्यटन क्षेत्र की समिति की एक बैठक एक जुलाई को दिल्ली में आयोग के सदस्य राजीव गौबा की अध्यक्षता में हुई। इस बैठक में आयोग के नवनियुक्त पर्यटन क्षेत्र के सलाहकार पूर्व आईएएस ललित के पंवार ने सुझाव रखे। पंवार ने कहा कि पर्यटन को घरेलू उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं। अनेक धार्मिक स्थलों के आसपास के मकान आज होम स्टे जी भूमिका निभा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तराखंड के आदि कैलाश तीर्थ यात्रा का है। पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र से आदि कैलाश पर्वत के बीच जो गांव बसे हैं, उनके अधिकांश मकान होम स्टे बन गए हैं। तीर्थ यात्री इन्हीं घरेलू होमस्टे में ठहरते हैं। घर की महिलाएं ही भोजन आदि का प्रबंध करती है। यानी पर्यटन के घरेलू उद्योग में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती जा रही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चाहते हैं कि भारत में पर्यटन विकास हो और उसे घरेलू उद्योग के रूप में विकसित किया जाए। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने पर्यटन नीति में बड़ा बदलाव किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ललित के पंवार राजस्थान में पर्यटन सचिव और पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। पंवार ने ही पधारो म्हारे देश का स्लोगन देकर पर्यटन के क्षेत्र में राजस्थान की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। एक जुलाई की बैठक में आयोग के संयुक्त सचिव राजीव ठाकुर भी उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि पंवार की पर्यटन क्षेत्र में भूमिका को देखते हुए नीति आयोग में विशेष आमंत्रित सलाहकार सदस्य के रूप में नियुक्ति हुई है।
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Tuesday, 1 July 2025
अजमेर के मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आरके गोखरू ने 69 साल की उम्र में एलएलबी की। वकालत करने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाएंगे।
अजमेर के जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के प्राचार्य रहे मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आरके गोखरू ने 69 वर्ष की उम्र में एलएलबी की डिग्री ली है। वह डिग्री एमडीएस यूनिवर्सिटी से संबद्ध भगवंत यूनिवर्सिटी से प्राप्त की। 28 जून को ही एलएलबी अंतिम वर्ष का परिणाम आया। डॉ. गोखरू ने 70 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। डॉ. गोखरू सरकारी सेवा में रहते हुए प्रतिदिन दो तीन घंटे मेडिकल कॉलेज के छात्रों को पढ़ाने का काम करते थे। लेकिन अब जब 2021 में 65 वर्ष की उम्र होने पर सेवानिवृत्त हुए तो कॉलेज में पढ़ाने का काम भी बंद हो गया। तब डॉ. गोखरू ने स्वयं पढ़ने का निर्णय लिया और एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी। यानी जो डॉ. गोखरू बरसों तक कॉलेज में पढ़ाते रहे, उन्होंने 66 वर्ष की उम्र में छात्र बनने में कोई हिचक नहीं दिखाई। भगवंत यूनिवर्सिटी के अध्यापक बताते हैं कि डॉ. गोखरू नियमित छात्र की तरह उपस्थित रहे। 70 प्रतिशत अंक बताते हैं कि डॉ. गोखरू ने एलएलबी की पढ़ाई पर उम्र को हावी नहीं होने दिया। यही वजह है कि 69 वर्ष की उम्र में भी डॉ. गोखरू युवा नजर आते हैं। डॉ. गोखरू आज भी अजमेर के जवाहर रंगमंच के निकट इंदिरा कॉम्प्लेक्स स्थित अपने हार्ट सेंटर में मरीजों को देखने का काम करते हैं। डॉ. गोखरू जब जेएलएन अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख रहे, तब उन्हें पूरे अजमेर संभाग में गरीबों का डॉक्टर कहा जाता था। सरकारी अस्पतालों में एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और हार्अ सर्जरी के लाखों रुपए लगते हैं, तब डॉ. गोखरू सरकारी अस्पताल में गरीबों का नि:शुल्क इलाज करते रहे। अजमेर संभाग में हजारों लोग मिल जाएंगे जो डॉक्टर गोखरू की वजह से ही आज सांस ले पा रहे हैं।
राष्ट्रपति से गुहार:
एलएलबी की डिग्री लेने के बाद भी डॉ. गोखरू अदालतों में पैरवी नहीं कर सकेंगे। डॉ. गोखरू ने बताया कि देश में मौजूदा व्यवस्ािा के अनुसार एक व्यक्ति एक प्रोफेशनल काम ही कर सकता है। चूंकि वे चिकित्सा का कार्य कर रहे हैं, इसलिए वकालत नहीं कर सकते। वकालत करने के लिए उन्हें डॉक्टरी का काम बंद करना होगा। यानी मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के रजिस्ट्रेशन को रद्द करवाना होगा। डॉ. गोखरू का कहना है कि जब व्यक्ति बहुआयामी हो रहा है, तब इस तरह के प्रतिबंध हटाए जाने चाहिए। यदि कोई डॉ. वकील के तौर पर अदालत में पैरवी करेगा तो पैरवी ज्यादा प्रभावी होगी। अभी चिकित्सा से जुड़े मुकदमों में भी एलएलबी डिग्री वाले वकील पैरवी करते हैं। जबकि ऐसे वकीलों की चिकित्सा क्षेत्र की तकनीकी बातों की जानकारी नहीं होती है। डॉ. गोखरू ने कहा कि मोदी सरकार ने देश के बहुत से कानूनों को हटा दिया है। ऐसे में एक व्यक्ति एक प्रोफेशनल के नियम को भी हटाना चाहिए। इसके लिए वह राष्ट्रपति को पत्र लिख रहे है। एलएलबी की डिग्री हासिल करने के लिए मोबाइल नंबर 9414002135 पर डॉ. आरके गोखरू को बधाई दी जा सकती है।
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यह माना कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं, लेकिन कश्मीर, बंगाल आदि राज्यों में हिंदुओं का रहना मुश्किल। बिहार में चुनाव के मद्देनजर नए वक्फ कानून की आड़ में पांच लाख मुसलमानों का जलसा।
बिहार में इसी वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव के मद्देनजर ही 30 जून को राजधानी पटना में मुस्लिम संगठनों ने एक बड़ा जलसा किया। दावा किया जा रहा है कि इस जलसे में पांच लाख मुसलमान एकत्रित हुए। यह जलसा नए वक्फ कानून के विरोध में किया गया। जलसे का राजनीतिक मकसद इसी से समझा जा सकता है कि भाषण देने वालों में आरजेडी, कांग्रेस, वामपंथी आदि दलों के नेता शामिल रहे। जलसे को संबोधित करते हुए आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है। देश की आजादी में मुसलमानों का भी योगदान रहा है। इसलिए वक्फ संपत्तियों पर सरकार का कब्जा नहीं होने दिया जाएगा। आज केंद्र की मोदी सरकार को मुसलमानों की ताकत को देख लेना चाहिए। यह सही है कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन यह भी हकीकत है कि इसी हिंदुस्तान के कश्मीर, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में हिंदुओं का रहना मुश्किल है। कश्मीर से तो चार लाख हिंदुओं को प्रताड़ित कर भगा दिया गया। आज जब अमरनाथ यात्रा हो रही है तो श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पचास हजार सुरक्षा बल तैनात किए गए है। सवाल उठता है कि जब हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है तो फिर हिंदुओं का रहना मुश्किल क्यों हो रहा है? क्या कांग्रेस, आरजेडी जैसे दलों के नेताओं को हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब मंदिर जाने और भगवान के दर्शन करने वाले हिंदुओं की रक्षा करनी पड़ रही हो, तब हिंदुस्तान के हालातों का अंदाजा लगा लेना चाहिए। अच्छा हो कि कांग्रेस और आरजेडी जैसे दलों के नेता हिंदुओं के प्रति भी वैसा ही प्रेमभाव दिखाए, जैसा मुसलमानों के प्रति दिखाते हैं। जब कोई मुसलमान धार्मिक यात्रा पर जाता है तो उसे देश के किसी भी कोने में सुरक्षा की जरुरत नहीं होती। क्योंकि पूरी दुनिया में मुसलमान सबसे ज्यादा हिंदुस्तान में सुरक्षित है। लेकिन इसी हिंदुस्तान में हिंदू श्रद्धालुओं को सुरक्षा की जरुरत होती है। जहां तक नए वक्फ कानून का सवाल है तो केंद्र सरकार की ओर से पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि वक्फ संपत्तियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। नए कानून से वक्फ संपत्तियों को इनकम में वृद्धि होगी और इस इनकम को मुसलमानों पर ही खर्च किया जाएगा। बिहार में 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, इस में से अधिकांश पसमांदा (पिछड़े और गरीब) गरीब मुसलमान है। यदि पिछड़े और गरीब मुसलमानों को वक्फ संपत्तियों का लाभ मिलता है तो फिर आरजेडी और कांग्रेस के नेताओं को कोई एतराज नहीं होना चाहिए। बिहार के पसमांदा मुसलमानों को भी अपने समाज के नेताओं से सावधान रहने की जरूरत है। इन्हीं नेताओं के कारण मुसलमानों का विकास नहीं हो पाया है।
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का पलड़ा भारी। शिवराज सिंह, मनोहर लाल खट्टर, वीडी शर्मा के नाम की भी चर्चा।
इन दिनों देश भर में भाजपा के प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने के लिए कम से कम पचास प्रतिशत राज्य इकाइयों में अध्यक्ष का होना जरूरी है। देश भर में भाजपा की 37 इकाइयां हैं और भाजपा संगठन का प्रयास है कि सभी इकाइयों पर अध्यक्ष का चुनाव हो जाए। भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा इसका फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के स्तर पर होगा। भाजपा के किसी भी नेता को यह नहीं पता कि राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन बनेगा, जिस नेता को अध्यक्ष बनना है उसे भी पता नहीं है। अब मीडिया भी भाजपा के पदाधिकारियों, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों के नाम चलाने में संकोच करता है, क्योंकि हर बार मीडिया के कयास गलत साबित होता है। लेकिन अब जब प्रदेश अध्यक्षों का चुनाव हो रहा है, तब राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर तथा मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के नाम राष्ट्रीय मीडिया में चल रहे है। इनमें से कोई भी नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए दौड़ नहीं लगा रहा। चर्चा में आने वाले नेताओं को भी पता है कि ज्यादा चर्चा होने पर नुकसान भी हो सकता है। कई मौकों पर खुद पीएम मोदी ने कहा कि मीडिया में जिन नामों की चर्चा होती है, उन पर संबंधित नेताओं को विश्वास नहीं करना चाहिए। भाजपा में काम और निष्ठा को देखकर ही चयन होता है। मीडिया में इन दिनों राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए जिन नेताओं के नाम चल रहे हैं, उनमें राजस्थान से अलवर के सांसद और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का पलड़ा सबसे भारी है। यादव पर पीएम मोदी और अमित शाह का भी भरोसा है। भाजपा की रणनीति बनाने में यादव की हमेशा सक्रिय भूमिका रहती है। अमित शाह के बाद भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भूपेंद्र यादव का नाम चला था, लेकिन ऐन मौके पर जेपी नड्डा को बनाया गया। अब जब नड्डा के उत्तराधिकारी की चर्चा हो रही है तो एक बार फिर भूपेंद्र यादव का नाम सुर्खियों में है। यादव भले ही भाजपा के रणनीतिकार हो, लेकिन वे हमेशा लो प्रोफाइल में रहते हैं। यादव की उन नेताओं में पहचान है, जिन्हें कभी भी असंतुष्ट नहीं देखा गया। संगठन में जो जिम्मेदारी मिली, उसे सहर्ष स्वीकार किया। सब जानते हैं कि वर्ष 2023 में जब मोहन यादव को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब शिवराज सिंह चौहान की क्या प्रतिक्रिया थी। चौहान को लगता था कि उनके मुख्यमंत्री रहते ही मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत हुई है, इसलिए मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया जाएगा। हालांकि बाद में चौहान ने केंद्र में कृषि मंत्री का पद भी स्वीकार कर लिया। मनोहर लाल खट्टर को भी हरियाणा से चुनाव से पहले रातों रात हटाया गया, लेकिन भूपेंद्र यादव को संगठन और सरकार में जिन हालातों में रखा गया, उन सभी में संतोष जाहिर किया । भूपेंद्र यादव में संगठनात्मक क्षमता भी जबरदस्त है।
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