Sunday, 20 December 2015

जिंदा रहने के लिए प्रकृति की पूजा करनी ही पड़ेगी-स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज।


द्वारकापीठ और जोशी मठ के शंकराचार्यस्वामी स्वरूपानंद महाराज के परम शिष्य स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने कहा है कि जिस तरह प्राकृतिक वातावरण बिगडऩे को लेकर दुनिया भर में चिंता व्यक्त की जा रही है, उसमें यदि मनुष्य को जिंदा रहना है तो प्रकृति की पूजा करनी ही पड़ेगी। स्वामी प्रज्ञानानंद नागौर जिले के मकराना कस्बे में श्रीमद्भागवत कथा का वाचन कर रहे हैं। 15 दिसम्बर से शुरूहुई कथा का समापन 22 दिसम्बर को होगा। 20 दिसम्बर को राजस्थान राजस्व मंडल के सदस्य एल.डी.यादव, प्रदेश के पूर्व संसदीय सचिव ब्रह्मदेवकुमावत, बिजयनगर नगर पालिका के अध्यक्ष सचिन सांखला, समाजसेवी विष्णु चौधरी आदि के साथ मैंने भी ज्ञान से भरी कथा को सुना। भारतीय आध्यात्म को आज के विज्ञान से जोड़ते हुए स्वामी प्रज्ञानानंद ने कहा कि आज जब हमने पूरे वातावरण को अपने स्वार्थों के लिए दूषित कर दिया है, तब हमें अपने जिंदा रहने की चिंता सताने लगी है। 
कहा जा रहा है कि देश की राजधानी दिल्ली में तत्काल उपाय नहीं किए गए तो दिल्लीवासियों का जिंदा रहना मुश्किल हो जाएगा। देश की सर्वोच्च न्यायालय भी हस्तक्षेप कर रही है। स्वामी जी ने कहा कि यह सब इसलिए हुआ है कि हमने प्रकृति का सम्मान नहीं किया। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजा के योग्य माना गया। जबकि मनुष्य ने अपने भोग के लिए प्रकृति का दुरुपयोग किया हैै। अब धार्मिक स्थलों पर लोग श्रद्धा के साथ नहीं बल्कि पर्यटन के लिए जाते हैं। हमारी संस्कृति आध्यात्म से जुड़ी है,जो हमें प्रकृति की पूजा करने की शिक्षा देती है। भगवान श्रीकृष्ण ने तब गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की सीख दी, तो गाय को माता माना। आज भी यदि दुनिया भारतीय संस्कृति के अनुरूप प्रकृति की पूजा करने लगे तो हम इस जानलेवा संकट से बच सकते हैं। उन्होंने ने कहाकि वर्तमान समय में जो उपाय किए जा रहे है, उनसे कोई हल निकलने वाला नहीं है। स्वामी जी ने कहा कि हो यह रहा है कि हम जीने की कला सीख रहे है, जबकि हमें छोडऩे की कला सीखनी चाहिए। हमने अपने विलासितापूर्ण जीवन के लिए बहुत से कृतिम साधन एकत्रित कर लिए हैं। हमें इन कृत्रिम साधनों का भी त्याग करना होगा। मनुष्य के जीवन में आवश्यकताएं जितनी कम होंगी,उसका जीवन उतना ही सरल और आनंदमय होगा। स्वामी जी ने कहा कि हमें प्रकृति की पूजा के साथ साथ अपने माता-पिता का भी सम्मान करना चाहिए। जिन परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता की सेवा की जाती है, उन परिवारों को कभी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। स्वामी ने मुकुट बिहारी लाल नाठा, श्रीमती पुष्पा देवी नाठा के परिवार की सराहना करते हुए कहा कि यह परिवार अपने पूर्वज रामचन्द नाठा व चन्द्र देवी नाठा के पावन स्मरण में भागवत कथा का आयोजन करवा रहा हैं। परिवार के सदस्यों का श्रद्धाभाव दिखाता है कि इस परिवार में बुजुर्ग सदस्यों का कितना मान सम्मान होता है। 

(एस.पी. मित्तल)
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