Thursday, 5 January 2023

जब किसी प्रदेश में क्षेत्रीय दल की सरकार होती है तो ऐसी ही जिद सामने आती है।जैन तीर्थ सम्मेद शिखर पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भी अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि झारखंड में कांग्रेस के समर्थन से ही हेमंत सोरेन की सरकार चल रही है।कोई भी सरकार जैन मुनियों के धैर्य की परीक्षा न लें।

झारखंड स्थित जैन तीर्थ स्थल को धार्मिक स्थल ही बनाए रखने की मांग को लेकर देशभर में जैन समाज धरना प्रदर्शन कर रहा है। राजस्थान के जयपुर में दिगम्बर जैन मुनि सुज्ञेय सागर ने गत 3 जनवरी को अपने प्राण त्याग दिए। मुनि सुज्ञेय सागर 9 दिनों से आमरण अनशन पर थे, लेकिन किसी ने भी उनके अनशन की सुध नहीं ली। 3 जनवरी को मुनि सुज्ञेय सागर के निधन के साथ ही जयपुर में ही मुनि समर्थ महाराज ने अन्न जल त्याग दिया है। यानी सम्मेद शिखर को बचाने के लिए अनेक जैन मुनि अपने प्राण त्यागने के लिए तैयार हैं। जैन समाज के देशव्यापी आंदोलन और जैन मुनियों के प्राण त्यागने के सिलसिले के बाद भी झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चल रही झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार पर कोई असर नहीं हुआ है। सोरेन सरकार ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सम्मेद शिविर को पर्यटन स्थल घोषित करने की अपनी जिद पर सोरेन सरकार कायम है। सवाल उठता है कि सोरेन सरकार पर जैन समाज के आंदोलन और जैन मुनियों के बलिदान का असर क्यों नहीं हो रहा? असल में हेमंत सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल है। मुख्यमंत्री सोरेन को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश के दूसरे राज्यों में रह रहे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। यही वजह है कि हेमंत सोरेन को आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। हेमंत सोरेन उनके राजनीतिक की सोच झारखंड तक ही सीमित है। यदि झारखंड में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की सरकार होती तो देश के अन्य हिस्सों में हो रहे आंदोलन का असर पड़ता। लेकिन फिर भी किसी भी सरकार के जैन मुनियों के धैर्य की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। यह सही है कि झारखंड सरकार के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार ने सम्मेद शिखर को भी अभ्यारण घोषित किया है। इसके बाद ही सोरेन सरकार ने सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित किया है। जैन समाज के लाखों लोग प्रतिवर्ष सम्मेद शिखर जाते हैं। उनका मकसद पर्यटन का नहीं बल्कि धार्मिक होता है। अनेक जैन मुनि सम्मेद शिखर पर  मोक्ष की प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या करते हैं। इसी भावना से उनके अनुयायी भी पहुंचते हैं। जैन मुनि तो सम्मेद शिखर को बचाने के लिए अपने त्याग भी त्याग कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वे जन भावनाओं को देखते हुए समस्या के समाधान के लिए प्रयास करें। केंद्र को यदि कोई सख्त कदम उठाना पड़े तो वह भी उठाया जाना चाहिए।
 
कांग्रेस अपनी स्थिति स्पष्ट करें:
सम्मेद शिखर के प्रकरण में कांग्रेस पार्टी को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार कांग्रेस के समर्थन से ही चल रही है। झारखंड में विधानसभा की 81 सीटें हैं। 2019 में हुए चुनाव में जेएमएम को 30 भाजपा को 25 तथा कांग्रेस को 16 सीटें मिलीं। बाद में जेएमएम और कांग्रेस ने मिल कर सरकार बनाई। यानी सोरेन सरकार ने सम्मेद शिखर को जो पर्यटन स्थल घोषित किया है, उसमें कांग्रेस की भी सहमति रही है। मंत्रिमंडल का निर्णय सामूहिक होता है। ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अपनी राय देश के समक्ष रखनी चाहिए। जेएमएम कांग्रेस और भाजपा माने या नहीं लेकिन सम्मेद शिखर का मामला जैन समाज ही नहीं बल्कि सनातन संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण है। जैन मुनियों के साथ सनातन संस्कृति को मानने वाले साधु संत भी खड़े हैं। भारत जैसे सनातन धर्मी देश में मुनियों का बलिदान यदि किसी धार्मिक स्थल को बचाने के लिए होता है तो यह बहुत ही शर्मनाक बात है। 

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हेमंत प्रियदर्शी बताएं कि इस काले आदेश पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सहमति है या नहीं?यदि सीएम गहलोत की सहमति के बगैर काला आदेश जारी हुआ है तो हेमंत प्रियदर्शी से तत्काल भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का चार्ज वापस लिया जाना चाहिए।भास्कर अखबार ने पहले ही दिन भ्रष्टाचार के आरोपियों की फोटो और नाम छाप कर काले आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंका।

हेमंत प्रियदर्शी राजस्थान में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रियदर्शी को एक जनवरी को ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा। यानी हेमंत प्रियदर्शी महानिदेशक नहीं होते हुए भी एसीबी के महानिदेशक बन गए। ऐसा तभी होता है, जब मुख्यमंत्री की विशेष कृपा हो। वैसे भी एसीबी का डीजी, मुख्यमंत्री का भरोसेमंद आईपीएस ही बनता है। राजस्थान में तो एसीबी भी सरकार बचाने और अपनी ही पार्टी में विरोधियों को कुचलने के काम आती है। एसीबी कितनी उपयोगी है, यह बात गृह मंत्री की हैसियत से भी अशोक गहलोत जानते हैं। राजस्थान में गृह विभाग का प्रभार भी मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने पास रखा है। एसीबी का महानिदेशक बनते ही हेमंत प्रियदर्शी ने सबसे पहला आदेश भ्रष्टाचारियों को बचाने वाला जारी किया है। 4 जनवरी को जारी आदेश में प्रियदर्शी ने एसीबी के सभी पुलिस अधीक्षकों को हिदायत दी कि जिन सरकारी कार्मिकों को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा जाए, उनके नाम और फोटो मीडिया में न दिए जाए। यानी आरोपी की पहचान उजागर नहीं होनी चाहिए। प्रियदर्शी का कहना रहा कि न्यायालय में आरोप सिद्ध होने के बाद ही आरोपी का नाम और पहचान उजागर हो। हेमंत प्रियदर्शी ने भ्रष्टाचार के आरोपियों के प्रति हमदर्दी क्यों दिखाई है, यह तो वही जाने, लेकिन प्रियदर्शी को यह बताना चाहिए कि उनके काले आदेश पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सहमति है या नहीं। क्या इतना बड़ा फैसला एक अतिरिक्त प्रभार वाले अधिकारी ने अपने स्तर पर ले लिया? आमतौर पर बड़े अधिकारी अपने स्तर पर निर्णय नहीं लेते हैं। अधिकारियों को अब अपनी कुर्सी अच्छी लगती है और अतिरिक्त प्रभार वाला अधिकारी तो फूंक फूंक कर कदम रखता है। अशोक गहलोत तो देश के सबसे होशियार और समझदार मुख्यमंत्री हैं, इसलिए स्वयं तो कुछ नहीं बोलेंगे, लेकिन यदि हेमंत प्रियदर्शी ने काला आदेश अपने विवेक से जारी किया है तो गहलोत सरकार को तत्काल प्रभाव से एसीबी के डीजी का अतिरिक्त चार्ज वापस लेना चाहिए। यदि हेमंत प्रियदर्शी को एसीबी का डीजी बनाए रखा जाता है तो यही माना जाएगा कि काले आदेश पर मुख्यमंत्री की सहमति है। रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए सरकारी कार्मिक का नाम और पहचान छिपाने का मानवाधिकार वाला तर्क समझ से परे हैं, क्योंकि पर्याप्त सबूत एकत्रित करने के बाद ही कार्मिक को रंगे हाथों पकड़ा जाता है। रिश्वत की पहली किस्त स्वीकारने के बाद दूसरी किश्त लेने पर ही पकड़ा जाता है। इतना ही नहीं अधिकांश मामलों में रिश्वत लेने वाले अधिकारी की आवाज भी मोबाइल पर रिकॉर्ड की जाती है। एसीबी के पास वही पीड़ित पहुंचता है जो बहुत दुखी और परेशान होता है। 95 प्रतिशत रिश्वत के मामले एसीबी के पास पहुंचते ही नहीं है। जो अधिकारी गुंडाई कर रिश्वत वसूल रहा है, उसके मानवाधिकार की चिंता की जा रही है? सरकारी कार्यालयों में फैले भ्रष्टाचार की वजह से आम आदमी बहुत परेशान है। देखा जाए तो भ्रष्टाचारी की पहचान उजागर होना ही उसकी सजा है। अधिकांश मामलों में तो आरोपी न्यायालय से बरी हो जाता है।
 
काला आदेश रद्दी की टोकरी में:
इधर 4 जनवरी को हेमंत प्रियदर्शी का काला आदेश जारी हुआ तो उधर इसी दिन भास्कर अखबार ने इस आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। 4 जनवरी को एसीबी ने नागौर में दो एएनएम और कोटा में एक सरकारी कार्मिक को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। हालांकि एसीबी स्थानीय अधिकारियों ने अपने डीजी के आदेश की पालना करते हुए दोनों एएनएम और सरकारी कार्मिक के नाम फोटो उपलब्ध नहीं करवाए, लेकिन भास्कर ने एसीबी के अंदर घुसकर तीनों आरोपियों के फोटो लिए और फोटो के साथ नाम भी प्रकाशित किए। भास्कर ने घोषणा की है कि वह काले आदेश को नहीं मानेगा और जो भी आरोपी रंगे हाथों पकड़े जाएंगे उनके नाम और फोटो उजागर करेगा। भास्कर के इस फैसले के बाद हेमंत प्रियदर्शी का काला आदेश कोई मायने नहीं रखता है। यहां यह खास तौर से उल्लेखनीय है कि गत भाजपा शासन में अभियोजन स्वीकृति से पहले आरोपियों की जानकारी सार्वजनिक नहीं करने का अध्यादेश भी जारी किया गया था। तब राजस्थान पत्रिका ने इस अध्यादेश का खुला विरोध किया। यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की फोटो और नाम छापने से भी इंकार कर दिया। बाद में मीडिया के दबाव से सरकार को विधानसभा में काला अध्यादेश वापस लेना पड़ा। अब देखना होगा कि हेमंत प्रियदर्शी के काले आदेश का क्या हश्र होता है। 

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50 मीटर की दूरी से राजस्थान पत्रिका के फोटो जर्नलिस्ट जय मखीजा ने खूंखार पैंथर के फोटो खींचे।विधानसभा चुनाव से 10 माह पहले ही कांग्रेस विधायक रघु शर्मा के पुतले जलना शुरू।

यूं तो प्रोफेशनल फोटोग्राफर जंगलों में जाकर खूंखार जानवरों के वीडियो बनाते हैं। लेकिन तब उनके पास सुरक्षा के पर्याप्त उपाय होते हैं। हिंसक जानवर के हमले पर भी ऐसे फोटोग्राफर अपनी जान बचा लेते हैं। लेकिन फिर भी ऐसे फोटोग्राफरों की हिम्मत की दाद दी जाती है। लेकिन राजस्थान पत्रिका के अजमेर संस्करण के फोटो जर्नलिस्ट जय मखीजा ने 3 जनवरी की रात को कमाल ही कर दिया। अक्सर अखबारों में छपता रहा कि अजमेर शहर से जुड़े पुष्कर घाटी क्षेत्र की नाग पहाड़ी पर पैंथर परिवार का आवागमन होता है। कई बार घाटी से गुजरने वाले लोगों ने दूर खड़े होकर पैंथर के वीडियो भी बनाए। पैंथर परिवार की सूचना के मद्दे नजर ही पत्रिका के फोटो जर्नलिस्ट जय माखीजा 3 जनवरी की रात को भरी सर्दी में अपना कैमरा लेकर पुष्कर घाटी के डियर पार्क में पहुंच गए। कार को पार्क की दीवार के सहारे लगाकर माखीजा पैंथर का इंतजार करने लगे। तब उनका मानना रहा कि यदि आज रात पैंथर नहीं आता है तो वे कल फिर आएंगे। लेकिन कोई दो घंटे के इंतजार के बाद माखीजा का सामना पैंथर से हो ही गया। एक बार तो  पैंथर को सामने देखकर माखीजा की सांसें थम गई, क्योंकि पैंथर कार की ओर ही आ रहा था, इसलिए माखीजा ने कार की खिड़की बंद कर ली ताकि हमला होने पर स्वयं का बचाव किया जा सके। माखीजा को तब थोड़ी राहत मिली जब पैंथर 50 मीटर की दूरी पर ही एक स्थान पर बैठ गया। माखीजा ने शीशे चढ़ी कार से ही पैंथर के कुछ फोटो खींचे, लेकिन तब भी पैंथर अपने स्थान पर बैठा रहा। माखीजा को ऐसा लगा कि अब पेंथर स्वयं अपना फोटो खिंचवाने को उत्सुक है। इस पर माखीजा ने कांच के शीशे नीचे कर पैंथर के फोटो बड़े आराम से ली। माखीजा का कहना है कि पैंथर का फोटो मात्र 50 मीटर की दूरी से लेना उनके लिए जोखिम भरा था। यह फोटो उनके जीवन का सबसे सर्वश्रेष्ठ फोटो है। जय माखीजा की दिलेरी पर अजमेर संस्कार के संपादक अनिल केले ने भी बधाई दी है। जय माखीजा के पेंथर वाले फोटो 4 जनवरी को पत्रिका में प्रमुखता के साथ प्रकाशित भी हुए है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जय माखीजा ने अपनी जान जोखिम में डालकर खूंखार पैंथर के फोटो लिए हैं। वन विभाग ने भी फोटो के प्रकाशन के बाद पैंथर के आवागमन पर चिंता जताई है। चूंकि पुष्कर घाटी शहरी सीमा से लगी हुई है इसलिए माना जा रहा है कि पैंथर आबादी क्षेत्र में आ सकता है। मोबाइल नंबर 9057531558 जय माखीजा को उनकी दिलेरी के लिए हौसला अफजाई की जा सकती है।
 
पुतले जलना शुरू:
विधानसभा चुनाव में अभी 10 माह शेष है, लेकिन कांग्रेस में अजमेर जिले के सबसे शक्तिशाली नेता माने जाने वाले केकड़ी के विधायक रघु शर्मा के पुतले जलना शुरू हो गए हैं। 4 जनवरी को जिला परिषद के बाहर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ही रघु शर्मा का पुतला जलाया। नाराज कांग्रेसियों का आरोप है कि रघु शर्मा अपने प्रभाव से देहात के एक नेता को अजमेर शहर कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। चूंकि रघु शर्मा का सरकार और संगठन में दखल है, इसलिए माना जा रहा है कि शहर और देहात के संगठन में रघु शर्मा की राय को प्राथमिकता दी जाएगी। पूर्व में भी रघु शर्मा ने अपने चहेतों को ही सरकार और संगठन में एडजस्ट करवाया है। इससे कांग्रेस का आम कार्यकर्ता नाराज है। यह नाराजगी शर्मा के निर्वाचन क्षेत्र केकड़ी में भी देखी जा रही है। केकड़ी से लेकर अजमेर शहर तक रघु का विरोध हो रहा है। नाराज कांग्रेसियों का कहना है कि अभी तो शुरुआत हुई है। आने वाले दिनों में और नाराजगी देखने को मिलेगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि रघु शर्मा जब प्रदेश के चिकित्सा मंत्री थे, तब भी लोगों की नाराजगी सामने आई थी। कोई एक वर्ष पहले रघु शर्मा को गुजरात का प्रभारी बनाया गया था, लेकिन गुजरात के चुनावों में कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई, इसके बाद रघु ने प्रभारी के पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि अभी रघु का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है। 

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Tuesday, 3 January 2023

इंडोर स्टेडियम को खुर्दबुर्द करने पर पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत ने नाराजगी जताई।अजमेर के माली समाज में भी रोष। कानूनी प्रक्रियाओं को भी नहीं अपनाने का आरोप।देवनारायण मंदिर की दीवार तोड़ने से गुर्जर समुदाय में रोष। सवाल-जब निर्माण हो रहा था, तब कार्यवाही क्यों नहीं की?

गुर्जर समुदाय में भारी रोष व्याप्त है। गुर्जर समुदाय के सैकड़ों लोग। रात को ही मंदिर पर एकत्रित हो गए थे। रात को ही समुदाय के लोगों ने रास्ते भी जाम किए। सवाल उठता है कि जब मंदिर की चारदीवारी का निर्माण हो रहा था, तब प्रशासन ने कार्यवाही क्यों नहीं की? यह मंदिर कोई सुनसान स्थान पर नहीं बना है, बल्कि शहर के व्यस्ततम वैशाली नगर के डिवाइडर पर बना है। लाखों लोग प्रतिदिन इस मार्ग से गुजरते हैं। मंदिर के सामने ही विशालकाय जी मॉल भी बना हुआ है। ऐसे में प्रशासन के अधिकारियों का आना जाना भी लगा रहता है। चार दीवारी भी कोई एक दिन में नहीं बनी। बल्कि करीब एक माह लगातार चारदीवारी का निर्माण होता रहा। तब प्रशासन ने निर्माण को रोकने पर कोई कार्यवाही नहीं की, जब चारदीवारी पूरी बन गई तब आधी रात को चारदीवारी को तोड़ने का काम किया। यदि निर्माण के समय ही काम को रुकवा दिया जाता तो इतना बड़ा विवाद नहीं होता। 

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अभिनेता अक्षय कुमार की तर्ज पर अब कमल हसन ने भी राहुल गांधी का इंटरव्यू लिया।कमल हसन को भी अपने देश में असहिष्णुता नजर आती है।मरघट मंदिर में हनुमान जी की पूजा अर्चना कर राहुल ने फिर शुरू की यात्रा।

मई 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो इंटरव्यू लिया, उसकी देशभर में चर्चा हुई थी। हालांकि यह इंटरव्यू के बजाए दोनों के बीच सामान्य बातचीत ही थी, लेकिन फिर चुनाव के दौरान इस बातचीत को लेकर विवाद भी हुआ। कुछ उसी तर्ज पर अभिनेता कमल हसन ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से बातचीत की है। इस इंटरव्यू नुमा बातचीत का वीडियो दो जनवरी को खुद राहुल गांधी ने सोलश मीडिया पर पोस्ट किया है। इस वीडियो में कमल हसन का कहना है कि राहुल गांधी आंसुओं और खून से भरी राह पर चल रहे हैं। हसन ने राहुल की भारत जोड़ो यात्रा की भी प्रशंसा की। बातचीत में राहुल ने कहा कि चीन ने हमारी 2 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया है और मोदी सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। अभिनेता कमल हसन और राजनेता राहुल गांधी एक दूसरे के विचारों से सहमत दिखे। राहुल गांधी को भी देश में नफरत और डर का माहौल नजर आता है और कमल हसन को भी देश में असहिष्णुता दिखती है। दोनों को अपने देश का माहौल अच्छा नहीं लगता है। यह बात अलग है कि देशवासियों ने ही फिल्में देखकर कमल हसन को सुपरस्टार बनाया। यदि देशवासी फिल्म नहीं देखते तो कमल हसन को इतनी प्रसिद्धी भी नहीं मिली।
 
यात्रा फिर से शुरू:
3 जनवरी को राहुल गांधी ने दिल्ली से अपनी भारत जोड़ो यात्रा शुरू कर दी है। 24 दिसंबर से 2 जनवरी तक यात्रा को विश्राम दिया गया था। दूसरे चरण की यात्रा शुरू करने से पहले राहुल गांधी ने दिल्ली कर मरघट मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा के समक्ष पूजा अर्चना की। मंदिर प्रबंधन की ओर से राहुल को केसरिया दुपट्टा ओढ़ने तथा शक्ति की प्रतीक गदा भेंट की। दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में भी राहुल सफेद रंग की आधी बांह वाली टीशर्ट में ही नजर आए। हालांकि उनके साथ चल रहे नेताओं ने गर्म कपड़े पहन रखे थे, लेकिन राहुल ने अभी भी गर्म कपड़े नहीं पहने हैं। राहुल गांधी ने कहा है कि उन्हें सर्दी से डर नहीं लगता है। राहुल अपने इस कथन  पर अभी तक कायम है। हालांकि यात्रा जब उत्तर प्रदेश से पंजाब और जम्मू कश्मीर जाएगी, तब सर्दी का प्रकोप और बढ़ जाएगा। राहुल की यात्रा 3 जनवरी को ही उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में प्रवेश कर जाएगी। 80 लोकसभा सीट वाले यूपी में राहुल की यात्रा तीन दिन रहेगी। यूपी में बहन प्रियंका गांधी भी साथ रहेंगी। प्रियंका यूपी की प्रभारी और कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। 

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