Monday, 23 November 2015

आखिर ऐसी छवि क्यों बनी अजमेर के मित्तल अस्पताल की।



हार्ट सर्जरी करवाने के बाद नरेन्द्र पाल सिंह कोचर की मौत होने और वेंटीलेटर पर रखने के मामले में जो पुलिस कार्यवाही हुई, उस संदर्भ में मैंने सोशल मीडिया पर 22 नवम्बर को एक पोस्ट डाली थी। इस पोस्ट में मृतक कोचर के पुत्र के द्वारा पुलिस में जो रिपोर्ट लिखवाई गई थी उसका जिक्र था। रिपोर्ट में अजमेर के पुष्कर रोड स्थित प्राइवेट मित्तल अस्पताल पर गंभीर आरोप लगाए गए। इस खबर के पोस्ट होते ही लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। आमतौर पर अस्पतालों के खिलाफ नाराजगी रहती ही है, लेकिन मित्तल अस्पताल के खिलाफ कुछ ज्यादा ही नकारात्मक भाव लोगों में देखा गया। मेरे कोई 375 वाट्सएप ग्रुप, कोई तीस हजार से भी ज्यादा पाठकों वाला ब्लॉग तथा फेसबुक अकाउंट पर हजारों प्रतिक्रिया मिली। मैं यहां सभी प्रतिक्रियाएं तो नहीं दे सकता, लेकिन दो प्रतिकियाताओं का चयन किया है। इसमें जहां नाराज लोगों की भावनाएं भी हैं, वहीं मित्तल अस्पताल के पक्ष में विचार व्यक्त करने वालो की मंशा है। मेरा मित्तल अस्पताल वालों से कोई दुराग्रह नहीं है। मैंने 22 नवम्बर को भी पूरी निष्पक्षता के साथ खबर को पोस्ट किया और अब 23 नवम्बर को भी कर रहा हंू। नरेन्द्र सिंह कोचर की मौत और वेंटीलेटर पर रखने के प्रकरण में मित्तल अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों का कितना दोष है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अस्पताल के प्रबंधन को इस बात पर तो विचार करना ही चाहिए कि आखिर लोगों के मन में इतना गुस्सा क्यों हैं?
भूल सुधार:
22 नवम्बर को डाली गई पोस्ट में गिरफ्तार होने वाले डॉक्टर का नाम प्रमोद लिखा गया,जबकि गिरफ्तार होने वाले डॉक्टर का नाम प्रदीप पोखरणा है। मित्तल अस्पताल में डॉ. प्रमोद दाधीच श्वास से संबंधित बीमारियों का इलाज करते हैं और नरेन्द्र पाल सिंह की हार्ट सर्जरी के मामले में डॉ. प्रमोद की कोई भूिमका नहीं है। पुलिस ने शांतिभंग के आरोप में डॉ. प्रदीप पोखरणा को गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में डॉ. पोखरणा को भी जमानत पर छोड़ दिया। प्रदीप की जगह प्रमोद के नाम का उल्लेख होने पर मुझे खेद है।
नाराज लोगों की भावना:
अजमेर के पूर्व जिला प्रमुख और हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील एस.के.सक्सेना ने पूरे प्रकरण पर जो भावनाएं व्यक्त की है, उन्हें मैं ज्यों का त्यों प्रदर्शित कर रहा हंू। 
संभवत मित्तल अस्पताल का मूल लक्ष्य एवं धेय मात्र धन कमाना ही रह गया है। स्वर्गीय घीसीबाई चेरीटेबल ट्रस्ट मात्र छलावा है या उक्त ट्रस्ट मात्र रियायती दर पर जमीन प्राप्त करना था या सरकार से मान्यता  या विभिन्न कारपोरेट सेक्टर, निजी या सार्वजनिक, कंपनियों, केंद्र  एवं राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त उनके कर्मचारियों को आकर्षित करना रहा है। सरकारी अस्पतालों में व्याप्त गंदगी, मूलभूत संसाधनों की कमी एवं भारी भीड़ और चिकित्सकों की कत्र्तव्यपरायणता के प्रति  उदासीनता, लापरवाही जनसामान्य को मित्तल अस्पताल  की ओर जाने को बाध्य करते हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अथवा परिजन को अच्छा से अच्छा इलाज उपलब्ध करा कर स्वस्थ देखना चाहता है, चाहे इन संस्थानों में इलाज कराया जाना उसकी माली हैसियत के परे ही क्यों ही न हो। परन्तु एक बार के अनुभव के उपरातं भुगतभोगी फिर दुबारा न तो स्वयं फिर इस अस्पताल को आना पंसद करता है और न ही किसी दूसरे को वहां इलाज हेतु जाने की सलाह देता है। रविवार को अस्पताल प्रबंधन के विरूद्ध पुलिस थाने में दर्ज रिपोर्ट कि हृदय की शल्य चिकित्सा के उपरातं मृत्यु हो जाने के उपरांत भी रोगी को वेंटीलेटर पर रखा जाना कहा गया जब कि रोगी की मौत पहले ही हो चुकी थी तथा परिजनों को तीन दिनों तक इलाजरत रोगी तक नहीं जाने दिया गया। पुलिस ने पहले रिपोर्ट लिखने से मना किया, लेकिन बाद में सिख समाज के सैकड़ों लोगों के एकत्रित होने पर रिपोर्ट लिखने को बाध्य होना पड़ा, जिस पर एक डॉक्टर को गिरफ्तार भी बताया गया तथा एक डाक्टर भागने में सफल रहा। संभवत: रिपोर्ट लिखना या गिरफ्तारी मजबूरी रही हो, क्योंकि आज महारानी वसुन्धरा मुख्यमंत्री अजमेर, पुष्कर यात्रा पर थी अन्यथा पुलिस प्रबंधन के भौतिक प्रभाव में रिपोर्ट लिखने को टाल देती या समाज के दबाव में रिपोर्ट लिखी गई, जिस घटनाक्रम पर प्रभावकारी ब्लॉग अत्यधिक संवेदनशील निष्पक्षता के धनी पत्रकार एस.पी.मित्तल जी सायं ही लिख दिया जि़स को पढ़ कर मुझ को यह लिखने की प्रेरणा जनहित में अनुभव होने पर मैंने अभिव्यक्ति  इस लेख के माध्यम से की है। बिना किसी द्वेष भावना के मैं कहना चाहंूगा कि इस प्रकार की घटनाएं आम होती जा रहीं हैं। अत राजस्थान सरकार व स्थानीय प्रशासन को इस घटना का संज्ञान लिया जाकर न केवल इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति को रोकना चाहिए, बल्कि घटना विस्तृत जांच उच्चस्तरीय रूप से किसी निष्पक्ष तकनीकी सक्षम बोर्ड  या न्यायिक संस्था से जांच कराई जानी चाहिए, क्योंकि जन सामान्य जीवन के साथ रोज-रोज होने वाला नंगा नाच बंद हो । साथ ही जांच की विषय वस्तु यह भी हो कि चेरीटेबल ट्रस्ट के रूप प्राप्त सुविधाओं के अनुरूप सभी उत्तरदायित्व का निर्वहन किया जा रहा या नहीं । यद्यपि भूखंड आंवटन एंव भूमि की प्रकृति भूरूपान्तरण आदि पर भी जांच की जानी चाहिए। प्रबंधन को भी आत्म चिंतन करना चाहिए कि वे स्वयं के उद्देश्य से भटक नहीं गए हैं, अन्यथा दरवेश मा.हर प्रसाद जी  मिश्रा, जिनकी आजमकद तस्वीर वहां विद्यमान है एवं जिन गुरूजी द्वारा उद्घाटन किया गया था उन की रूह को बेचैनी महसूस हो रही होगी। नि:संदेह हर मेडिकल संस्था का अपना अनुशासन होता है, लेकिन रोगी के परिजन को निजी मेडिकल स्टोर से ही मेडीसनस खरीदना आवश्यक करना कहां तक उचित है, जबकि वहां दवाएं बाजार की तुलना में काफी महंगी दी जाती हैं। क्यों रोगी की मृत्यु के उपरांत डेडबॉडी रात को ही पिछले दरवाजे से निकाली जाती है। आईसीयू में रोगी को रखे जाने पर परिजन को अंदर जाने नहीं दिया जाता तथा आईसीयू के चार्जेस के बावजूद भी वेंटीलेटर, डाक्टर व अन्य प्रकार के चार्जेस अलग से लिये जाते हैं। क्या डाक्टर को अधिकाधिक जांचे करवाये जाने या बिना आवश्यकता के आईसीयू में भर्ती करने को प्रेरित नहीं किया जाता, यदि ऐसा है तो आत्म चितंन का गम्भीर विषय है। प्रबन्धन को ज्ञात है कि किसी भी अस्पताल की लाईफ लाइन विशेषज्ञ डॉक्टर होते है, जबकि अधिकांश डाक्टर जवाहर लाल नेहरू अस्पताल से सेवानिवृत्ति प्राप्त है तथा कुछ विशेषण अन्य संस्थानों में अल्पकालीन अवधि तक सेवारत रहे हैं, अतं उन को विशेषज्ञ संबोधित कर या प्रचारित कर आमजन के साथ न्याय किया जा रहा है। हां, एक बात अवश्य है कि विशेषज्ञ डाक्टर का नाम, डीग्रियां व पूर्व अनुभव बोर्डों पर लिखा हुआ है। फिर भी कोई आता है तो प्रबन्धन उत्तरदायी नहीं है। प्रशासन बहुत मेहरबान है, तब ही सार्वजनिक सड़क पर पार्किंग की इजाजत है, जबकि पार्किंग अस्पताल परिसर में ही होनी चाहिए। भवन निर्माण  स्वीकृति  में पार्किंग स्थान अवश्य दिखाया गया होगा, अन्यथा नक्शा पास नहीं किया जा सकता। हां, यदि कोई गरीब का ठेला या झोपड़ी सार्वजनिक रास्ते पर होती तो प्रशासन सक्रियता जरूर दिखाता। चेरीटेबल अस्पताल होने के कारण यह भी जांच का विषय है कि प्रति दिन कितने गरीबों का नि:शुल्क इलाज किया जा रहा है या केवल खानापूर्ति की जा रही है। क्या पैरा मेडिकल स्टाफ नियमानुसार प्रशिक्षित है, क्या निर्माण ने ऐतिहासिक झील आनासागर  के आंव-केचमेंट एरिया में अवरोध किया है जो राजस्थान उच्च न्यायालय  द्वारा अब्दुल रहमान के केस पारित निर्णय के विरुद्ध है, जिसका अनुसरण कर ही राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने रामगढ़ बांध से सम्बन्धित जनहित याचिका में दिल्ली रोड, काकूस-जयपुर स्थित अस्पताल व मेडिकल कालेज के भवन के एक भाग को तोड़ कर पानी के प्राकृतिक बहाव को पूर्ववत बहाल को कहा। सीवरेज  का एसटीपी निर्माण एवं संचालन के उपरांत वातावरण की शुद्धता भी विचारणीय बिन्दू है।
-सत्य किशोर सक्सेना,एडवोकेट,पूर्व जिला प्रमुख,अजमेर मो. 9414003192
समर्थकों का मन:
मेरे फेसबुक अकाउंट पर जो प्रतिक्रियाएं मिली है, उनमें हिमांशु चौधरी भी है। इसमें अस्पताल प्रबंधन का पक्ष रखन के साथ-साथ आलोचकों को भी जवाब दिया गया है। मैं पत्रकारिता का ईमानदारी के साथ धर्म निभाते हुए हिमांशु चौधरी की प्रतिक्रिया को भी यहां प्रदर्शित कर रहा हंू। इसमें मेरी भी आलोचना की गई है। 
S.p. Mittal Ji
well done!
Wese aapne apne Constitutional Right Article 19(1) ka bilkul sahi fayeda uthaya hai... Parr aapki kuchh ˜æéçÅUØæ´ mai thik karna chahta hoon.... 
* आप आरोप लगा सकते हैए फैसला सुनाने का हक़ आपको किसने दिया।
* मेरी जानकारी के मुताबिक यह वही मित्तल अस्पताल है जहां आपके परिजन भी इलाज करवाते हैं।
* आलोचना कीजिये पर औपचारिकता और अनुसाशन से।
* यह अभी साबित नहीं हुआ की मित्तल अस्पताल दोषी है या यह सिख परिवार तो कृपया Constructive Criticism  का इस्तेमाल कीजिये।
मेरी सभी आलोचकों को चेतावनी
* अगर इतना ही बुरा है मित्तल अस्पताल तो आप लोग क्यों जाते हैं, वहां इलाज करवाने।
अस्पताल बंद करो, करवाई करो, ये करो, वो करो, यह सब कहना आपके अधिकार में नहीं।
और हां जब जिंदगी और मौत से झूझते मरीजों को मित्तल अस्पताल वाले बचाते है, तब कहाँ जाता है आपका Journalism, S.P. Mittal ji? 
मैं कोई मित्तल अस्पताल के प्रशासन से नहीं हूँए पर एक जागरूक नागरिक हूँ जिसने इस अस्पताल को सैकड़ो जिंदगियां बचाते देखा।
किसी की इज्जत से खेलने से पहले अपने गिरेबान में जरूर झांके।
-हिमांशु चौधरी

(एस.पी. मित्तल)
(spmittal.blogspot.in)M-09829071511

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