वार्ड चुनाव को लोकतंत्र की पहली सीढ़ी माना जाता है। अजमेर नगर निगम के साठ वार्डों के चुनाव 17 अगस्त को होने हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में जिस प्रकार उम्मीदवरों का चयन हुआ, उसे लेकर अब बगावत के हालात हैं। उम्मीदवारों पर पार्टी का सिंबल खरीदने के आरोप लग रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान एक-एक उम्मीदवार जिस प्रकार पानी की तरह पैसा बहा रहा है, उससे सवाल उठता है कि फिर नगर निगम में भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा? शायद ही कोई उम्मीदवार होगा, जिसे मुफ्त में कार्यकर्ता मिले हो। कार्यकर्ता के बजाए अब राजनीतिक दलों में पेड वर्कर हो गए हैं। यदि कोई कार्यकर्ता दिनभर की मजदूरी न भी ले तो दोनों वक्त का खाना, रात का पीना, स्कूटर-कार में पेट्रोल तो डलवाना ही पड़ेगा। इतना ही नहीं किसी वार्ड की कच्ची अथवा पिछड़ी बस्ती में तो अभी से शराब वितरण का काम शुरू हो गया है। बस्ती में भी कई ठेकेदार हो गए हैं, जो हर उम्मीदवार को वोट दिलवाने का वायदा कर रहे हैं। मंदिरों और मस्जिदों में भी रंग रोगन से लेकर मरम्मत तक के कार्य उम्मीदवार से करवाए जा रहे हैं। मतदाता को भी लगता है कि मतदान से पहले तक ही उसकी पूछ हो रही है, इसलिए अभी जितना छीन लिया जाए, उतना कम है। जाति के दाव पर जो निर्दलीय अथवा बागी है, उन्हें मनाने के लिए लाखों रुपए के ऑफर दिए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक भाजपा में मेयर के एक दावेदार उम्मीदवार ने दूसरे दावेदार को पार्षद का चुनाव करवाने के लिए मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार खड़ाकर दिया है। मेयर का दूसरा दावेदार भी किसी भी कीमत पर चुनाव हारना नहीं चाहता है, इसलिए एक निर्दलीय उम्मीदवार को बैठाने के लिए बीस लाख तक का ऑफर दे दिया गया है। अब सवाल उठता है कि जब मतदाता से लेकर जाति के ठेकेदार तक वसूली में लगे हुए है, तब पार्षद से ईमानदारी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? पार्षद बनने के बाद हमारा जन प्रतिनिधि सफाई से लेकर निर्माण कार्यों तक में अपना स्वार्थ देखेगा ही। क्या कोई उम्मीदवार यह कह सकता है कि वह सिर्फ मतदाता के भरोसे चुनाव लड़ रहा है? राजनीति में जो लोग स्वच्छता की बात करते हैं, उन्हें भी पता है कि वे झूठ बोल रहे हैं। वार्ड चुनाव में लाखों रुपया खर्च करने वाला पार्षद बनने पर ईमानदार रह ही नहीं सकता। कुछ धनाढ्य उम्मीदवार भले ही सफाई और निर्माण के कार्यों में स्वार्थ पूरे नहीं करें, लेकिन वे अपने पार्षद के पद के दम पर अपने अवैध निर्माणों को नियमित, भूमि का व्यावसायिक उपयोग आदि कार्य तो करेंगे ही। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की सूची देखी जाए तो पता चलेगा कि जमीनों के कारोबार करने वाले उम्मीदवारों की संख्या सबसे ज्यादा है। कुछ उम्मीदवार को नगर निगम में ही ठेकेदारी का काम करते हैं। अजमेर में इन दिनों चुनाव का जो माहौल बना हुआ है, उससे नागरिकों को ईमानदारी की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। अनेक उम्मीदवारों को तो भू-कारोबारी ही आर्थिक मदद कर रहे हैं। यदि उम्मीदवारों के चुनाव कार्यालयों की ही जांच कर ली जाए तो राजनीति में स्वच्छता की पोल खुल जाएगी। लोकतंत्र की पहली सीढ़ी के चुनाव का यह हाल तो दूसरी और तीसरी सीढ़ी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कोई माने या नहीं, देश में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण चुनाव हैं। आखिर कौन सुधारेगा, इन हालातों को।
(एस.पी. मित्तल)(spmittal.blogspot.in)M-09829071511
Tuesday, 11 August 2015
लोकतंत्र की पहली सीढ़ी के चुनाव में इतना बुरा हाल तो कैसे मिटेगा अजमेर नगर निगम में भ्रष्टाचार
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एक मजबूत राजनीतिक विकल्प ही इस समस्या से उबार सकता है। जैसे आप पार्टी ने दिल्ली की राजनीती को सबक दिया वैसा कुछ यहां भी हो सकता था।
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