राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी के आदेश पर अमल होता है तो अब जैन समाज में मृत्यु का महोत्सव नहीं मन पाएगा। न्यायाधीश अम्बवानी ने 10 अगस्त को अपने महत्त्वपूर्ण फैसले में जैन समाज में होने वाली संथारा प्रथा पर रोक लगा दी है। फैसले में कहा गया है कि भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों में किसी भी व्यक्ति को मृत्यु की इजाजत नहीं दी जा सकती है। किसी भी व्यक्ति को बीमारी अथवा स्वैच्छा से मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। न्यायाधीश अम्बवानी के आदेश पर संथारा प्रथा पर रोक लगती है अथवा नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि जैन समाज में संथारा प्रथा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। परंपराओं के अनुसार इस प्रथा को मृत्यु के महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कई बार तो यह स्थिति किसी भी चमत्कार से कम नहीं होती। जिस मरीज को बड़े से बड़ा चिकित्सक दो-तीन दिन का मेहमान बताता है, उसी मरीज को जैन समाज के किसी मंदिर अथवा नसिया में लाकर दो-तीन दिन नहीं बल्कि महीनों तक जिंदा रख लिया जाता है, जो मरीज अस्पताल में वेंटिलेटर पर रहकर अंतिम सांसें गिन रहा होता है, वह मंदिर अथवा नसिया में आकर जमीन पर बिछी चटाई पर कई दिनों तक जिन्दा रह जाता है। ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं, जब संथारा के दौरान मरीज सभी रोगों से मुक्त भी हो जाता है। जैन समाज में मान्यता है कि जैन मुनि और साध्वी बड़े ही वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीके से मरीज का इलाज करते हैं, पहले चरण में संथारा ग्रहण करने वाले व्यक्ति का भोजन बंद किया जाता है और फिर उसके शरीर की सभी इंद्रियों पर नियंत्रण करने की ताकत दे दी जाती है। उसकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल कर दी जाती है कि वह चाहता है वो होता है। इस अवधि के दौरान ही व्यक्ति के सभी रिश्तेदारों को मंदिर अथवा नसिया में बुला लिया जाता है, जबकि व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीख लेता है तो महोत्सव मनाया जाता है। महोत्सव के दौरान स्वादिष्ट व्यंजन खाएं और खिलाए जाते हैं। चमत्कार तो तब होता है जब संथारा लेने वाला व्यक्ति सिर्फ सांस लेकर ही जिंदा रहता है। यानि उसका पानी भी बंद कर दिया जाता है। इस चमत्कारी परिस्थितियों में जब किसी महिला-पुरुष का निधन होता है तो यह किसी महोत्सव से कम नहीं होता है। संथारा के विशेषज्ञ माने जाने वाले जैन संतों का कहना है कि यह जबरन मृत्यु नहीं है, बल्कि मृत्यु पर विजय प्राप्त करना है। देखना है कि राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले को जैन समाज किस नजरिए से ग्रहण करता है। न्यायाधीश अंबवानी ने संथारा प्रथा पर रोक का फैसला एक जनहित याचिका पर दिया है। मानवाधिकारों से जुड़ी संस्था की याचिका में कहा गया है कि जैन समाज की प्रथा जबरन मृत्यु की पंरपरा है। उससे आम नागरिकों के अधिकारों का हनन होता है।
(एस.पी. मित्तल)(spmittal.blogspot.in)M-09829071511
Monday, 10 August 2015
तो अब मृत्यु का महोत्सव नहीं मनेगा जैन समाज में
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