Thursday, 1 October 2026
पायलट स्मित ने पूरी दुनिया में भारत की सनातन संस्कृति का डंका बजाया।
ओमानी को-पायलट का कृत्य इजरालय और ईरान युद्ध से जुड़ा है।
कट्टरपंथता के आगे निर्दोष लोगों का जीवन कोई मायने नहीं रखता।
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30 सितंबर को दुबई से इजरायल जा रहे हवाई जहाज के भारतीय पायलट स्मित मछार ने अपने को-पायलट (इस्लामिक देश ओमान का नागरिक) से चाकू के वाहन सहने के बाद भी 180 लोगों को सुरक्षित पहुंचाया। यदि स्मित मछार बहादुरी और समझदारी न दिखाते तो जहाज को को-पायलट इजरायल में क्रेश करवा देता। इस जहाज में इजरायल के 150 नागरिक सवार थे। पूरी दुनिया में इस्लाम और ईसाई धर्मो के लोगों का बोलबाला है। चीन, जापान जैसे कुछ देश बौद्ध धर्म को मानते हैं। सनातन धर्म को मानने वाले सिर्फ भारत में ही है, लेकिन पायलट स्मित मछार ने 30 सितंबर को जो बहादुरी व समझदारी दिखाई उससे भारत की सनातन संस्कृति का डंका पूरी दुनिया में बजा है। स्मित मछार ने एक बार फिर साबित किया है सनातन धर्म को मानने वाला व्यक्ति कभी भी धोखेबाज नहीं हो सकता। भले ही वह इस्लामिक देश दुबई का जहाज उड़ा रहा हो। सनातन संस्कृति को मानने वाले व्यक्ति दुनिया में जहां भ है, वहां उनकी विश्वसनीयता है और अब स्मित मछार ने उस विश्वसनीयता को और बढ़ा दिया है। निसन्देह इस घटना से भारत का सनातन संस्कृति का मान बढ़ा है। इसके साथ ही एक बार फिर यह प्रदर्शित हुआ है कि कट्टरपंथता के सामने निर्दोष लोगों का जीवन कोई मायने नहीं रखता है। इस्लामिक देश ओमान के को-पायलट को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जिस विमान को वह ब्रेश कराना चाहता है, उसमें निर्दोश लोग सवार है। यदि सनातन धर्म के अनुयायी स्मित मछार बहादुरी और समझदारी नहीं दिखाते तो 30 सितंबर को 180 लोग मौत के शिकार हो जाते। यही वजह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आदि ने स्मित मछार की जमकर प्रशंसा की है। इजरायल तो स्मित मछार को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मनित करेगा।
युद्ध से जुड़े है तार:
दुबई से इजरायल जहां रहे विमान में जो हादसा हुआ उसके तार इजरायल और ईरान के युद्ध से जुड़े हैं। ईरान ने अपने नियंत्रण वाले समुद्र के होर्मूज मार्ग में टोल वसूली की जो योजना बनाई, उसमें ओमान भी शामिल है। इजरायल के साथ युद्ध में ओमान, ईरान का मददगार है। अब तक की जांच में सामने आया है कि ओमान का को-पायलट विमान को क्रेश करवाकर इजरायल से बदला लेना चाहता था। यही वजह है कि इजरायल ने साऊदी अरब से मांग की है कि ओमान के को-पायलट को उन्हें सौंपा जाए। मालूम हो कि जब पायलट स्मित मछार पर हमला हुाअ, तब विमान की इमरजेंसी लैंडिंग सऊदी अरब में ही करवाई गई थी। यानी इस समय ओमानी को-पायलट सऊदी अरब के कब्जे में है। देखना होगा कि सऊदी अरब कब तक ओमानी पायलट को इजरायल को सौंपता है।
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अब जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जज संदीप मेहता पर गंभीर आरोप लगाए।
सवाल-जनता के विश्वास का क्या होगा?
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लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह उम्मीद होती है कि न्यायालयों में ईमानदारी के साथ फैसले होते हैं, लेकिन आम लोगों का यह विश्वास अब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज ही तार तार कर रहे हैं। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के जज संदीप मेहता ने राजस्थान के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा पर जो आरोप लगाए, उनका जवाब एक अक्टूबर को जस्टिस शर्मा ने दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद शर्मा ने मीडिया से संवाद करते हुए कहा कि संदीप मेहता के विरुद्ध भी गंभीर आरोपों से जुड़ी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी, लेकिन इसके बाद भी मेहता को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि संदीप मेहता का उद्देश्य मुझे मुख्य न्यायाधीश बनने से रोकना था। संदीप मेहता अपने उद्देश्य में सफल भी रहे। मेहता ने मुझ पर जो आरोप लगाए वे मान हानिकारक है। इसलिए मैंने देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत से अनुमति मांगी है कि मुझे संदीप मेहता के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर करने दिया जाए। संदीप मेहता और संजीव प्रकाश शमा्र ने एक-दूसरे पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उसके मद्देनजर सवाल उठता है कि आखिर आम लोगों के विश्वास का क्या होगा? यदि संदीप मेहता और संजीव प्रकाश शर्मा के आरोपों को सही माना जाए तो प्रदर्शित होता है कि देश की अदालतों में न्याय नहीं होता। बल्कि धनाढ्य और प्रभावशाली लोग अपने पक्ष में फैसला करवा लेते हैं। मेहता और शर्मा कोई मुंसिफ अदालत के जज नहीं है बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज हैं। यदि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इतनी गड़बडिय़ां हैं तो फिर जिला अदालतों के हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है। कोई माने या नही,ं लेकिन मेहता और शर्मा के आरोपों से देश की न्याय प्रणाली की छवि धूमिल हुई है। संदीप मेहता के आरोपों के बाद शर्मा मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सके, लेकिन अब देखना होगा कि शर्मा के आरोपों से मेहता को सुप्रीम कोर्ट में कितना नुकसान होता है। मेहता के आरोपों के बाद शर्मा ने राजस्थान के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहते हुए स्वयं को न्यायिक कार्यों से अलग कर लिया था। क्या अब संदीप मेहता सुप्रीम कोर्ट में स्वयं को न्यायिक कार्य से अलग करेंगे? यह सही है कि किसी भी जज को आसानी से हटाया नहीं जा सकता। सवाल उठता है कि क्या आरोपों के चलते संदीप मेहता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देंगे?
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सचिन पायलट की रिपोर्ट पर राजा वडिंग की पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से छुट्टी।
राजस्थान और पंजाब की राजनीति के तार जुड़े हुए हैं।
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कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाब के प्रभारी सचिन पायलट की रिपोर्ट के बाद राजा वडिंग को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं और कांग्रेस का प्रयास है कि पंजाब में सरकार बनाई जाए। मौजूदा समय में भगवत मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार है। राजा वडिंग को कुछ माह पहले ही पंजाब का अध्यक्ष बनाया गया था। तब से ही पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा विरोध कर रहे थे, लेकिन तब के प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने राजा वडिंग को हटाने से साफ इंकार कर दिया था। लेकिन भूपेश बघेल के स्थान पर सचिन पायलट के प्रभारी बनने के बाद चन्नी और रंधावा के समर्थकों ने राजा वडिंग को हटाने की मांग तेज कर दी। माना जा रहा है कि पायलट की रिपोर्ट के आधार पर ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और राहुल गांधी ने राजा वडिंग को हटाने का फैसला किया। असल में पंजाब की राजनीति के तार राजस्थान से जुड़े हुए हैं। लम्बे समय तक राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट पंजाब के प्रभारी हैं तो पंजाब के वरिष्ठ सांसद रंधवा राजस्थान के। राजा वडिंग के अध्यक्ष पद से हटने के बाद रंधावा और उनके समर्थक खुश हैं। अब देखना होगा कि रंधावा राजस्थान में सचिन पायलट के समर्थकों को खुश होने का कब अवसर देते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान में भाजपा के अध्यक्ष रहे सतीश पूनिया मौजूदा समय में भाजपा के पंजाब में प्रभारी है। राजस्थान भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे गुलाबचंद कटारिया पहले से ही पंजाब के राज्यपाल हैं।
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गांधी जयंती को प्रार्थना सभाओं तक सीमित न रखा जाए। गांधी को स्मारक से संस्कार तक ले जाने की आवश्यकता।
एमडीएस के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल का दो टूक कथन।
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2 अक्टूबर को गांधी जयंती के उपलक्ष में अजमेर स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्व विद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने एक लेख के जरिए अपने विचार व्यक्त किए हैं। प्रो. अग्रवाल का यह लेख ज्यों का त्यों यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। देश में गांधीजी की स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। विद्यालयों में प्रार्थना सभाएँ होती हैं, सरकारी और सामाजिक संस्थाओं में कार्यक्रम आयोजित होते हैं, गांधीजी की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण होता है और उनके सत्य, अहिंसा, स्वदेशी तथा सादगी के विचारों को दोहराया जाता है। लेकिन हर वर्ष गांधी जयंती पर एक प्रश्न और अधिक गंभीर होकर हमारे सामने खड़ा होता है—क्या गांधीजी हमारे लिए केवल एक स्मृति हैं, एक प्रतिमा हैं, एक तस्वीर हैं, अथवा वे हमारे जीवन-व्यवहार का हिस्सा भी हैं? यदि गांधीजी केवल चौराहों पर खड़ी प्रतिमाओं, दीवारों पर टंगे चित्रों और वर्ष में एक दिन होने वाले समारोहों तक सीमित रह गए हैं, तो हमें उनके स्मरण के तरीके पर पुनर्विचार करना होगा। आज आवश्यकता गांधीजी को स्मारक से संस्कार तक, चित्र से चरित्र तक और समारोह से व्यवहार तक ले जाने की है।
गांधीजी की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उन्होंने कोई ऐसा जीवन जिया जिसमें मनुष्य की सामान्य कमजोरियों के लिए कोई स्थान ही न हो। उनकी असाधारणता इस बात में थी कि उन्होंने अपनी कमजोरियों को छिपाने के बजाय उन्हें पहचानने, स्वीकार करने और उनसे ऊपर उठने का निरंतर प्रयास किया। उन्होंने अपने जीवन को सत्य के प्रयोगों के रूप में देखा। यही कारण है कि गांधीजी का जीवन किसी तैयार उपदेश की तरह नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-परीक्षण की यात्रा की तरह दिखाई देता है। आज जब हम दूसरों की गलतियों को पहचानने में अत्यंत तत्पर हैं, लेकिन अपने भीतर झाँकने से बचते हैं, गांधीजी का यह पक्ष विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। गांधी हमें यह सिखाते हैं कि दुनिया को बदलने की पहली शर्त स्वयं को बदलने का साहस है। इसलिए गांधीजी की सच्ची शुरुआत प्रतिमा के सामने नहीं, अपने अंतर्मन के सामने खड़े होने से होती है।
गांधीजी के लिए सत्य केवल झूठ न बोलने का नैतिक उपदेश नहीं था। सत्य उनके लिए जीवन की कसौटी था। आज यह विचार नए संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सूचना की गति अभूतपूर्व है। एक संदेश, एक तस्वीर या एक वीडियो कुछ ही क्षणों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। लेकिन सूचना की गति बढ़ने के साथ सत्य की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। आज गांधीजी के सत्य को यदि हम डिजिटल युग में समझना चाहें तो उसका एक अर्थ यह भी होगा कि बिना सत्यापन के किसी सूचना को आगे न बढ़ाया जाए, किसी व्यक्ति के बारे में अपुष्ट आरोप को तथ्य न माना जाए और केवल इसलिए किसी बात को सत्य न स्वीकार किया जाए कि वह हमारी पसंद या पूर्वधारणा के अनुकूल है। आज का सत्याग्रह केवल सड़क पर किया जाने वाला प्रतिरोध नहीं; वह अपने हाथ से असत्य को आगे न बढ़ाने का संकल्प भी हो सकता है।
गांधीजी की अहिंसा को भी नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुँचाना नहीं है। हमारी भाषा, हमारा व्यवहार और हमारी डिजिटल अभिव्यक्ति भी किसी को चोट पहुँचा सकती है। आज सार्वजनिक संवाद में तीखी भाषा, व्यक्तिगत आक्षेप और असहमति को शत्रुता में बदल देने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसे समय में गांधीजी की अहिंसा हमें एक कठिन लेकिन आवश्यक संस्कार देती है—विचारों में दृढ़ रहिए, लेकिन व्यवहार में मर्यादा बनाए रखिए। असहमति रखिए, लेकिन व्यक्ति का अपमान किए बिना। विरोध कीजिए, लेकिन घृणा को अपना आधार मत बनाइए। गांधीजी की अहिंसा निष्क्रियता नहीं थी; वह अन्याय के सामने खड़े होने का आत्मबल थी। इसलिए आज उनकी अहिंसा को विचार की अहिंसा, वाणी की अहिंसा और डिजिटल व्यवहार की अहिंसा तक विस्तार देना होगा।
गांधीजी के स्वराज को भी केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के अर्थ में समझना उनके विचारों को सीमित करना होगा। उनके लिए स्वराज का एक गहरा अर्थ आत्म-शासन था। आज हम स्वतंत्र हैं, लेकिन क्या हम अपनी इच्छाओं के स्वामी हैं? क्या हमारा समय हमारे नियंत्रण में है या हमारा मोबाइल हमारे समय को नियंत्रित करता है? क्या हम अपनी आवश्यकताओं का विवेकपूर्ण निर्धारण करते हैं या बाजार हमारी इच्छाएँ निर्धारित करता है? क्या हम अपने क्रोध को नियंत्रित करते हैं या क्रोध हमारे निर्णयों को? गांधीजी का स्वराज हमें याद दिलाता है कि बाहरी स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब व्यक्ति के भीतर भी आत्म-अनुशासन हो। देश पर शासन करने से पहले स्वयं पर शासन करना सीखना होगा। यही गांधीजी के स्वराज की आज के मनुष्य के लिए सबसे आधुनिक व्याख्या हो सकती है।
गांधीजी की सादगी को भी केवल उनकी धोती, चप्पल या सीमित व्यक्तिगत आवश्यकताओं से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी सादगी का मूल प्रश्न था—मनुष्य को वास्तव में कितना चाहिए? आज का बाजार हमारी आवश्यकताओं से कहीं अधिक हमारी इच्छाओं का निर्माण करता है। अधिक खरीदना, अधिक जमा करना और अधिक उपभोग करना सफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे समय में गांधीजी का सीमित उपभोग हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है—क्या हर इच्छा आवश्यकता है? यही प्रश्न आज पर्यावरण के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रकृति के संसाधन सीमित हैं, जबकि मनुष्य की इच्छाएँ लगातार बढ़ रही हैं। इसलिए गांधीजी की सादगी अब केवल व्यक्तिगत नैतिकता का विषय नहीं रही; वह पर्यावरणीय जिम्मेदारी का भी प्रश्न बन चुकी है। आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को ध्यान में रखकर वर्तमान का उपभोग करना गांधीजी की सोच को आज के पर्यावरणीय विमर्श से जोड़ता है।
गांधीजी के जीवन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष श्रम की गरिमा था। चरखा उनके लिए केवल सूत कातने का साधन नहीं था; वह आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और श्रम-सम्मान का प्रतीक था। गांधीजी ने समाज के सामने यह प्रश्न रखा कि हम काम को छोटा क्यों मानते हैं और काम करने वाले व्यक्ति को भी उसके काम के आधार पर छोटा-बड़ा क्यों समझते हैं। आज जब हम आत्मनिर्भर भारत, कौशल विकास और रोजगार की बात करते हैं, तब श्रम के प्रति सम्मान की गांधीवादी दृष्टि फिर महत्वपूर्ण हो जाती है। किसान, कारीगर, सफाईकर्मी, निर्माण श्रमिक, तकनीशियन या किसी कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी—हर श्रम समाज की संरचना में योगदान देता है। जिस समाज में श्रम का सम्मान होता है, वहाँ मनुष्य की गरिमा भी मजबूत होती है। गांधीजी को संस्कार बनाना है तो श्रम के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना भी आवश्यक है।
शिक्षा के क्षेत्र में गांधीजी की प्रासंगिकता और भी गहरी है। आज हमारे पास ज्ञान के अभूतपूर्व साधन हैं। डिजिटल तकनीक, ऑनलाइन शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विशाल डिजिटल पुस्तकालयों ने ज्ञान तक पहुँच आसान बना दी है। लेकिन ज्ञान की उपलब्धता और विवेक की उपलब्धता एक ही बात नहीं है। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल यह नहीं हो सकता कि विद्यार्थी अधिक से अधिक सूचनाएँ याद कर ले या रोजगार के लिए आवश्यक कौशल प्राप्त कर ले। प्रश्न यह भी है कि वह कितना संवेदनशील, कितना जिम्मेदार और कितना नैतिक नागरिक बनता है। यदि शिक्षा हमें प्रतियोगिता तो सिखाती है लेकिन सहयोग नहीं, बोलना सिखाती है लेकिन सुनना नहीं, सफलता सिखाती है लेकिन उत्तरदायित्व नहीं, तो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष अधूरा रह जाता है। गांधीजी की शिक्षा-दृष्टि हमें ज्ञान के साथ चरित्र, कौशल के साथ संवेदना और बुद्धि के साथ विवेक को जोड़ने की प्रेरणा देती है।
गांधीजी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद आज के युवाओं के सामने दिखाई देती है। युवा परिवर्तन चाहता है और यह समाज के लिए आशा का संकेत है। लेकिन गांधीजी का जीवन युवाओं से एक कठिन प्रश्न भी पूछता है—जिस परिवर्तन की अपेक्षा आप दुनिया से करते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से कब होगी? हम व्यवस्था में ईमानदारी चाहते हैं, लेकिन क्या अपने व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी के लिए उतने ही कठोर हैं? हम स्वच्छ समाज चाहते हैं, लेकिन क्या अपने व्यवहार में स्वच्छता का अनुशासन रखते हैं? हम डिजिटल दुनिया में शालीनता चाहते हैं, लेकिन क्या हमारी अपनी भाषा शालीन है? हम सामाजिक सद्भाव चाहते हैं, लेकिन क्या हम अपने से भिन्न विचार रखने वाले व्यक्ति को सम्मान दे सकते हैं? गांधीजी का संदेश यही है कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा किसी बड़े मंच से नहीं होती; वह एक छोटे व्यक्तिगत निर्णय से भी शुरू हो सकती है।
लोकतांत्रिक समाज में गांधीजी की एक और बड़ी प्रासंगिकता असहमति के संस्कार में है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक जैसा सोचें। लोकतंत्र का अर्थ यह है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग एक साथ रह सकें। असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक और आवश्यक विशेषता है, लेकिन असहमति को वैमनस्य में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। गांधीजी के जीवन से यह सीख मिलती है कि व्यक्ति से असहमति हो सकती है, विचार का विरोध किया जा सकता है, लेकिन संवाद का दरवाजा बंद करना आवश्यक नहीं है। आज जब सार्वजनिक संवाद में तीखापन बढ़ रहा है, तब गांधीजी की संयमित असहमति और संवाद की संस्कृति को पुनः समझने की आवश्यकता है। विचारों में दृढ़ता और व्यवहार में गरिमा—यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कार की पहचान है।
पर्यावरण के प्रश्न पर भी गांधीजी का जीवन आज हमारे सामने नए अर्थों में उपस्थित होता है। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव हमें विकास की अपनी परिभाषा पर विचार करने के लिए बाध्य कर रहा है। क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक संसाधन-खपत है? या विकास का अर्थ ऐसा जीवन भी है जिसमें आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधन सुरक्षित रहें? गांधीजी के संयम, स्थानीयता, आत्मनिर्भरता और सीमित उपभोग के विचार आज पर्यावरणीय जिम्मेदारी के संदर्भ में नए अर्थ ग्रहण करते हैं। गांधीजी ने हमें यह सोचने की दिशा दी थी कि मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति और उसकी असीमित इच्छाओं की पूर्ति एक ही बात नहीं है।
यही वह बिंदु है जहाँ गांधीजी को स्मारक से संस्कार तक ले जाने का वास्तविक अर्थ सामने आता है। किसी चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित करना सम्मान है, लेकिन किसी कमजोर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करना उससे बड़ा गांधीवादी संस्कार है। उनके चित्र पर पुष्प चढ़ाना श्रद्धा है, लेकिन सत्य बोलने के कठिन अवसर पर सत्य के साथ खड़ा होना उससे बड़ी श्रद्धांजलि है। गांधीजी पर भाषण देना अच्छी बात है, लेकिन असहमति के क्षण में संयमित भाषा का प्रयोग करना उनके विचार को जीना है। स्वच्छता अभियान चलाना उपयोगी है, लेकिन स्वच्छता को अपनी दैनिक आदत बनाना गांधीजी के संदेश को व्यवहार में उतारना है।
इसलिए गांधीजी का सबसे बड़ा स्मारक किसी पत्थर या धातु से निर्मित प्रतिमा नहीं हो सकता। उनका वास्तविक स्मारक हमारा चरित्र हो सकता है। एक ईमानदार कर्मचारी, एक संवेदनशील शिक्षक, एक जिम्मेदार विद्यार्थी, एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी, एक श्रम का सम्मान करने वाला नागरिक और एक ऐसा व्यक्ति जो असहमति के बावजूद दूसरे के सम्मान को बनाए रखता है—ये सभी गांधीजी के जीवित स्मारक हैं। पत्थर की प्रतिमा वर्षों तक खड़ी रह सकती है, लेकिन संस्कार पीढ़ियों तक चलते हैं।
गांधी जयंती को इसलिए केवल एक दिन के समारोह से आगे ले जाने की आवश्यकता है। विद्यालयों में गांधीजी पर भाषण हों, लेकिन साथ ही सत्य, श्रम और स्वच्छता के छोटे-छोटे अनुभव विद्यार्थियों के जीवन का हिस्सा बनें। विश्वविद्यालयों में गांधीजी पर संगोष्ठियाँ हों, लेकिन उनके विचारों को नैतिक नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण और लोकतांत्रिक संवाद से जोड़ा जाए। कार्यालयों में पुष्पांजलि हो, लेकिन उसके साथ पारदर्शिता और कर्तव्यनिष्ठा का संकल्प भी हो। समाज में गांधीजी की तस्वीरें हों, लेकिन उससे अधिक उनके मूल्यों की उपस्थिति दिखाई दे।
गांधीजी को अतीत में बंद कर देना उनके साथ न्याय नहीं होगा। उनका सत्य आज डिजिटल सूचना की दुनिया में हमारी कसौटी बन सकता है। उनकी अहिंसा आज हमारे संवाद की भाषा बन सकती है। उनका स्वराज आज आत्म-अनुशासन का आधार बन सकता है। उनकी सादगी आज पर्यावरणीय जिम्मेदारी का मार्ग दिखा सकती है। उनका श्रम-सम्मान आज आत्मनिर्भरता और सामाजिक गरिमा का आधार बन सकता है। और उनका आत्म-परीक्षण आज व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन की नैतिकता को मजबूत कर सकता है।
इसलिए गांधीजी की प्रासंगिकता को केवल इस प्रश्न से नहीं मापा जाना चाहिए कि आज कितने लोग उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं या कितनी जगहों पर उनकी प्रतिमाएँ लगी हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि उनके विचार हमारे निर्णयों, हमारी भाषा, हमारी जीवनशैली और हमारे सामाजिक व्यवहार को कितना प्रभावित करते हैं। गांधीजी को जीवित रखने के लिए उनकी प्रतिमाओं की संख्या बढ़ाने से अधिक आवश्यक है कि उनके मूल्यों को जीने वाले मनुष्यों की संख्या बढ़े।
2 अक्टूबर को यदि हम प्रतिमा पर फूल चढ़ाकर लौट आए और अगले दिन हमारा व्यवहार पहले जैसा हो गया, तो हमारा स्मरण अधूरा है। लेकिन यदि गांधी जयंती के बाद हम एक असत्य बोलने से रुकें, एक अपुष्ट सूचना आगे बढ़ाने से बचें, किसी श्रमिक का सम्मान करें, किसी असहमत व्यक्ति की बात धैर्य से सुनें, अपनी अनावश्यक इच्छाओं पर संयम रखें और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाएँ, तो गांधीजी हमारे जीवन में सचमुच एक कदम आगे आ गए हैं।
गांधीजी को स्मारक से संस्कार तक ले जाना किसी सरकार, संस्था या संगठन का अकेला दायित्व नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत यात्रा है। गांधीजी की सबसे बड़ी प्रतिमा किसी चौराहे पर नहीं, हमारे चरित्र में होनी चाहिए। उनका सबसे बड़ा स्मारक किसी भवन में नहीं, हमारे व्यवहार में होना चाहिए। उनकी सबसे सच्ची श्रद्धांजलि माल्यार्पण में नहीं, उस क्षण होगी जब जीवन हमारे सामने आसान रास्ता और सही रास्ता दोनों रखे और हम सही रास्ते को चुनने का साहस करें।
क्योंकि गांधीजी को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है; यह अपने वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य को अधिक मानवीय बनाने का संकल्प है। आज आवश्यकता है कि गांधीजी चित्र से चरित्र तक, प्रतिमा से प्रेरणा तक, स्मारक से संस्कार तक और 2 अक्टूबर से पूरे वर्ष के आचरण तक पहुँचें।
यही गांधीजी की सच्ची प्रासंगिकता है। यही गांधी जयंती का वास्तविक संदेश है। और शायद यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है—गांधी को केवल पत्थर में सुरक्षित न रखें, उन्हें अपने विचारों, निर्णयों और आचरण में जीवित रखें। गांधीजी की सच्ची विजय तब होगी, जब उनका नाम केवल हमारे समारोहों में नहीं, बल्कि हमारे सत्य, संयम, सेवा और साहस में दिखाई देगा; जब उनकी स्मृति हमारे शब्दों से आगे बढ़कर हमारे निर्णयों की दिशा बनेगी; और जब प्रत्येक नागरिक अपने आचरण से यह प्रमाणित करेगा कि गांधी किसी बीते युग के महापुरुष नहीं, बल्कि बेहतर भारत के निर्माण की जीवित प्रेरणा हैं
S.P.MITTAL BLOGGER ( 02-10-2026)
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